बॉम्बे हाईकोर्ट ने नए आईटी नियमों पर रोक लगाने की मांग करने वाली दो याचिकाओं पर केंद्र सरकार से सवाल पूछा है कि इन नियमों पर रोक क्यों न लगाई जाए। अदालत ने केंद्र के इसका जवाब 12 अगस्त तक दाखिल करने को कहा है।याचिकाओं में कहा गया है कि नए नियमों में नागरिकों, पत्रकारों, डिजिटल समाचार पोर्टलों द्वारा ऑनलाइन प्रकाशित की जाने वाली सामग्री पर कई पाबंदियां लगाई गई हैं
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से इस सवाल पर जवाब मांगा कि नए सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों को लागू करने पर अंतरिम रोक क्यों नहीं लगाई जानी चाहिए। अदालत ने केंद्र से यह सवाल इन नियमों पर रोक लगाने की मांग करने वाली दो याचिकाओं के आधार पर पूछा। मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायाधीश जीएस कुलकर्णी की पीठ ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए 12 अगस्त तक का समय दिया है।
विज्ञापन
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने अदालत से अनुरोध किया कि अंतिम सुनवाई के बिना नियमों पर रोक न लगाई जाए। उन्होंने कहा, 'अंतरिम रोक लगाने की बजाय मामले की अंतिम सुनवाई की जा सकती है।' अदालत ने केंद्र सरकार को हलफनामा दायर करने का निर्देश देते हुए मामले की सुनवाई स्थगित कर दी। अब इस मामले में आगे की सुनवाई 13 अगस्त को सुनवाई होगी।
बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट में दो याचिकाकर्ताओं ने नए आईटी कानूनों को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि नए नियमों में नागरिकों, पत्रकारों, डिजिटल समाचार पोर्टलों की ओर से ऑनलाइन प्रकाशित की जाने वाली सामग्री पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं। याचिकाओं में कहा गया है कि नई सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमावली 2021 'अभिव्यक्ति की आजादी पर सेंसर' जैसी है और अस्पष्ट, दमनकारी व कठोर है।
विज्ञापन
समाचार पोर्टल द लीफलेट और पत्रकार निखिल वागले ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में दायर याचिका में कहा है कि आईटी नियमों का प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी पर घातक असर पड़ेगा। द लीफलेट के अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने अदालत से नए नियमों के कार्यान्वयन पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। पिछली सुनवाई में खंबाटा ने दलील दी थी कि ऐसा पहली बार हो रहा है कि सामग्री पर खुलकर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा था कि ये नियम आईटी कानून के मापदंडों से परे जाते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जवाबदेही और शिकायत निवारण का भी प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया था कि सामग्री को विनियमित करने और जवाबदेही की मांग का आधार उन मापदंडों पर आधारित है जो अस्पष्ट हैं और मौजूदा आईटी अधिनियम के प्रावधानों और अनुच्छेद 19 के तहत बोलने की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से कहीं परे हैं।