असम देश का पहला ऐसा राज्य बन सकता है जिसके पास अपनी जनसंख्या नीति हो। इस जनसंख्या नीति पर एक आम राय बनाने के लिए असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से बातचीत कर उन्हें भी इसके साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। सरमा की इन कोशिशों के बीच, सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति पर सुनवाई के दौरान अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह राज्यों को अपनी जनसंख्या नीति स्पष्ट करने का निर्देश दे। इससे बिना राष्ट्रीय जनसंख्या कानून बने भी एक जनसंख्या नीति की तरफ आगे बढ़ा जा सकता है। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने अमर उजाला से कहा कि देश में बेरोजगारी, अपराध, ट्रैफिक, प्रदूषण, उचित रहन-सहन, खान-पान और स्वास्थ्य की समस्याएं लगातार गंभीर होती जा रही हैं। इन पर लगाम लगाने के लिए एक राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की आवश्यकता है। लेकिन अभी तक केंद्र सरकार ने इस पर अपनी कोई नीति नहीं बनाई है। लेकिन चूंकि जनसंख्या का विषय समवर्ती सूची में रखा गया है, राज्य भी इस पर अपनी नीति बना सकते हैं।
केंद्र ने किया था इनकार
वकील अश्विनी उपाध्याय ने 2018 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की मांग करते हुए यह विषय दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष उठाया था। इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय ने 10 जनवरी 2020 को सुनवाई की और केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया था कि वह राष्ट्रीय जनसंख्या नीति पर अपनी राय स्पष्ट करे। 12 दिसंबर 2020 को केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया था कि देश को इस तरह के कानून की कोई आवश्यकता नहीं है और वह ऐसा कोई कानून नहीं बनाने जा रही है।
राजनीतिक मुद्दा बन सकता है
भाजपा के कई नेता समय-समय पर इस मुद्दे पर बयानबाजी करते रहे हैं। इसे हमेशा एक वर्ग विशेष से जोड़कर देखा जाता रहा है। लेकिन सामाजिक-राजनीतिक परिणामों का आकलन कर कोई भी दल एक समग्र राष्ट्रीय जनसंख्या नीति लाने से बचता रहा है।
कई राज्य केवल दो बच्चे की नीति को बढ़ावा देने के लिए अपने-अपने यहां राजनीतिक उपाय करते रहे हैं। जैसे दो बच्चों से अधिक होने पर उनके चुनाव न लड़ने के उपाय किए जाते रहे हैं, लेकिन पाया गया है कि ये उपाय अब तक बहुत कारगर साबित नहीं हुए हैं। ऐसे में अब इस मुद्दे का समाधान अदालत के जरिए निकालने की कोशिश हो रही है।