मोदी सरकार द्वारा जोर-शोर से शुरू किए गया सिंगल यूज प्लास्टिक बैन अभियान ठंडा पड़ता हुआ नजर आ रहा है। केंद्र सरकार इस मामले में कदम उठाने के लिए चर्चा जरुर कर रही है,लेकिन अभी तक कोई ठोस रुपरेखा बनकर तैयार नहीं हुई है। केंद्र सरकार ने तय किया है कि 2022 तक सिंगल यूज प्लास्टिक को खत्म करेंगे, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं।
भेड़ा ने बताया कि, देश में अभी फिलहाल 50 हजार से अधिक प्लास्टिक मैन्युफैक्चरिंग औद्योगिक इकाईयां हैं। इस उद्योग में 40 से 50 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है। इंडस्ट्री चैंबर एसोचैम और ईवाय नामक संस्था की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 90 लाख टन प्लास्टिक का उपयोग होता है, जिसे इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है। जिसमें गुटखे और शैंपू के पाउच, पन्नी, छोटी बोतलें, स्ट्रॉ, गिलास और कटलरी के कई छोटे सामान शामिल हैं और ये वह प्लास्टिक है जिसका दोबारा इस्तेमाल नहीं होता और यही प्लास्टिक प्रदूषण का बड़ा कारण है।
रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते ई-कॉमर्स और संगठित रिटेल उद्योग के कारण लगातार प्लास्टिक की मांग बढ़ रही है। भारत में रोजाना 25 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा निकल रहा है। इसमें से 94 फीसदी हिस्सा इस तरह के प्लास्टिक का होता है जो आसानी से री-साइकिल हो सकता है। लेकिन 40 फीसदी नालियों को जाम करता है। वहीं नदियों को प्रदूषित करता है।
रिपोर्ट के अनुसार, एफएमसीजी सेक्टर प्लास्टिक उपयोग बढ़ाने वाला क्षेत्र निकलकर सामने आया है। वित्त वर्ष 2019-20 भारत में पैकेजिंग इंडस्ट्री के 5.15 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। देश में सबसे ज्यादा 35 फीसदी पैकेजिंग, इसके बाद निर्माण और बिल्डिंग के क्षेत्र में 23, ट्रांसपोर्ट में 8, इलेक्ट्रॉनिक्स में 8, कृषि में 7 और अन्य क्षेत्रों में 19 फीसदी प्लास्टिक का उपयोग होता है।