सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि एक आरोपी की महज परीक्षण शिनाख्त परेड (टिप) में पहचान होना ही दोषसिद्धि का वास्तविक आधार तब तक नहीं बन सकता, जब तक अन्य तथ्य और हालात उसकी पहचान की पुष्टि न कर दें।
शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) में 28 अगस्त, 1992 को हुई एक डकैती के दो आरोपियों को इस आधार पर रिहा करते समय की कि उनकी पहचान कराने के लिए एक के बाद एक कई बार टिप आयोजित की गई। शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोपी की पहचान हासिल करने में सफल होने तक लगातार परीक्षण पहचान परेड नहीं करा सकता।
जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की पीठ ने कहा, मामले के तथ्यों और हालातों को ध्यान में रखकर हम याचिकाकर्ताओं की सजा को बरकरार रखने में सक्षम नहीं हैं। याचिका स्वीकार की जाती है और यािचकाकर्ता यदि किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें छोड़ने का आदेश दिया जाता है।
पीठ ने कहा, साक्ष्य अधिनियम की धारा 9 के तहत परीक्षण पहचान परेड एक आपराधिक अभियोजन में वास्तविक साक्ष्य नहीं है, बल्कि केवल पुष्टि साक्ष्य है।
जांच के स्तर पर परीक्षण पहचान परेड के आयोजन का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि जांच एजेंसी ऐसे मामले में प्रथम दृष्टया सही दिशा में चल रही है, जहां आरोपी अज्ञात हो सकता है या उसकी झलक भर देखी गई हो।
परीक्षण पहचान परेड में पहचान मात्र दोष सिद्धि के लिए तब तक मूल आधार नहीं बन सकती, जब तक कि अन्य तथ्य और परिस्थितियां पहचान की पुष्टि नहीं करती हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच का एक हिस्सा होने के नाते अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि परीक्षण पहचान परेड को कानून के अनुसार आयोजित किया गया था।