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Sanjay Nirupam: 'न राहुल ने जवाब दिया, न सोनिया ने वक्त', संजय निरुपम बोले- खरगे और वेणुगोपाल का 'वन वे मामला'

आशीष तिवारी
Updated Thu, 11 Apr 2024 06:01 PM IST

सार

कांग्रेस के बागी नेता संजय निरुपम ने अमर उजाला के साथ बातचीत में बताया कि, दक्षिण भारत की एक लॉबी हावी हो गई है कांग्रेस संगठन पर। पांच पावर केंद्र बन गए हैं कांग्रेस के भीतर। आप कुछ बोलेंगे तो बताया जाएगा आप ज्ञान दे रहे हैं।
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अमर उजाला से बोले संजय निरुपम। - फोटो : अमर उजाला


सवाल: संजय जी, यह बताइए पहले पार्टी ने आपको निकाला या आपने उनके निकाले जाने से पहले पार्टी छोड़ दी। 

जवाब: अब मैं उसे विवाद में नहीं जाना चाहता हूं कि किसने पहल की। कांग्रेस को लगता है कि उन्होंने मुझको निकाल कर कोई बड़ी उपलब्धि हासिल की है। तो उनको यह उपलब्धि मुबारक। 


सवाल: वैसे मामला क्या था। आप तो पार्टी के भरोसेमंद सिपाही हुआ करते थे। पार्टी बड़ा भरोसा करती थी आप पर। फिर अचानक आपने  विरोध का बिगुल बजा दिया। कहानी क्या थी।

जवाब: विरोध की बातें कहा आईं। अरे, मैं तो पार्टी बचाना चाहता था। मैं तो पार्टी के हित की बात कर रहा था। लेकिन पार्टी के भीतर कुछ इतने अहंकारी लोग बैठे हैं कि पूछो मत। उनको आप कुछ सलाह नहीं दे सकते हैं। अगर आपने सलाह दी तो मानो आपका पत्ता कटना तय।


सवाल: तो आपको लगता है कि आपने पार्टी को कुछ सलाह दी और आपका इसलिए पत्ता कट गया। कुछ और बात भी रही होगी। कहा तो यह जा रहा है कि आप शिवसेना के साथ कांग्रेस के गठबंधन को पसंद नहीं कर रहे थे। क्या सच है यह? 

जवाब: देखिए मैंने सीट शेयरिंग और गठबंधन के मामले पर 17 फरवरी को राहुल गांधी को एक संदेश भेजा था। आप पार्टी की डांवाडोल स्थिति का अंदाजा इसी से लगाइए कि मेरे 17 फरवरी के मैसेज का जवाब अब तक नहीं आया। क्या मतलब निकला जाए इसका। मैं पार्टी का वफादार सिपाही था। दिन रात मेहनत करके मैंने मुंबई और प्रदेश में पार्टी को एक ऊंचाई दी थी। अगर मैं शिवसेना के साथ गठबंधन और सीट शेयरिंग पर बात कह रहा था तो पार्टी को सुनना चाहिए था।


सवाल: लेकिन संजय जी, आप तो शिवसेना में बहुत लंबे वक्त तक रहे हैं। जब आप वहां पर सांसद थे तो शिवसेना बहुत अच्छी थी। अब जब कांग्रेस उनके साथ गठबंधन कर रही थी तो आपको किस बात की दिक्कत हो रही थी। मामला तो शायद इसी पर बिगड़ा।
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जवाब: मैं शिवसेना में रहा हूं ना। मुझसे ज्यादा बेहतर शिवसेना को और कौन समझ सकता होगा। मैं कांग्रेस पार्टी को बचाना चाहता था। मैं चाहता था कि जो भी समझौते हो वह पार्टी के आत्म सम्मान की कीमत पर न हों। लेकिन मेरी बात तो किसी ने सुनी ही नहीं। क्योंकि कांग्रेस में किसी तरीके की बात कहने का मतलब " पावर सेंटर" को ज्ञान देना माना जाता है। अब फिर वहां पांच पावर सेंटर हैं। 


सवाल: चलिए मान लेते हैं कि जैसा आप कह रहे हैं राहुल गांधी ने आपको जवाब नहीं दिया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर महासचिव और प्रियंका गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक आप अपनी बात पहुंचा सकते थे। उनसे भी आपने संपर्क किया क्या?

जवाब: अब आप मेरी बात ध्यान से सुनिए। सोनिया जी अब किसी से नहीं मिलती। ऐसा नहीं कि मैंने प्रयास नहीं किया। कई बार प्रयास किया लेकिन वक्त नहीं मिला। रही बात प्रियंका गांधी की तो हम लोगों के बीच में कोई भी संवाद नहीं होता है। अब बचे राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे। तो वहां मामला वनवे ट्रैफिक जैसा है। वह सिर्फ सुनते हैं लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिलता है। केसी वेणुगोपाल हिंदी भाषा और मराठियों की बोली को न तो ढंग से बोल पाते हैं ना समझ पाते हैं। और अंग्रेजी भी ऐसी बोलते हैं जिनका एक्सेंट मध्य भारत से ऊपर के राज्यों वाले लोगों को समझ नहीं आता। तो ऐसे में क्या किया जाता है।


सवाल: आपने तो कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं पर हमला बोल दिया। लेकिन यही नेता और संगठन तो आपको लेकर कभी आगे बढ़े होंगे। तब सब ठीक था। और अब अचानक गड़बड़ हो गया। दिल्ली के गलियारों में कहां जा रहा है गठबंधन में आपको चुनाव लड़ने के लिए सीट नहीं मिल रही थी। इसलिए संजय निरुपम भड़क गए। बात यही है क्या।

जवाब: देखिए चुनाव लड़ना तो मेरा लक्ष्य है। और मैं चुनाव लड़ूंगा भी। रही बात कांग्रेस पर और उनके नेताओं पर हमलावर होने की। तो यह हमला नहीं है। दरअसल पार्टी और संगठन पूरी तरह से बिखर गया है। हाई कमान के पास जो लोग बैठे हैं उनके अपने-अपने एजेंडे हैं। दक्षिण भारत की लॉबी कांग्रेस हाई कमान के इर्द-गिर्द कुंडली मारे बैठी है। अब इसमें जो सहज है वो चल रहा है। जो अपनी बात रख रहा है वह विरोधी कहलाया जा रहा है।



सवाल: आप कह रहे चुनाव लड़ना तो आपका लक्ष्य है। आप लड़ेंगे ही चुनाव। तो लगे हांथ यह भी बता दीजिए की पार्टी कौन सी होगी। 

जवाब: वक्त आने पर सब पता चल जाएगा। बातचीत चल रही है। हमारे यहां चुनाव थोड़ा लेट है। इसलिए अभी कुछ वक्त है। गठबंधन में सीटों की हिस्सेदारी का मामला चल रहा है। वैसे मैं बता दूं 2016 में भारतीय जनता पार्टी ने मुझे अपने साथ जोड़कर राज्यसभा भेजने की बात कही थी।


सवाल: तो क्या आपका इशारा भारतीय जनता पार्टी की ओर है। आठ साल पहले भाजपा की ओर से आए ऑफर को आप अब भुनाना चाह रहे हैं। 

जवाब: मैं किसी भी राजनीतिक दल को लेकर तब तक घोषणा नहीं कर सकता जब तक की आगे की बात पूरी ना हो जाए। बस चुनाव लड़ना है। जनता की सेवा की है। राजनीतिक दल से ही चुनाव लड़ूंगा। 


सवाल: अच्छा यह बताइए,।आपने तो कल एक ट्वीट किया कांग्रेस की सीटों को लेकर। 2014 में कितनी सीटें थीं। 2019 में कितनी बची। आपने तो 2024 की भी भविष्यवाणी कर दी। कहा शून्य सीटें मिलेंगी।आपने कौन सी गणित लगाई इसमें। 

जवाब: सुनिए पहले, 2014 में मोदी लहर में जब हम हारे तो हमने उसको एक हादसा मान लिया था। 2019 में जब हम एक पर सिमट गए। अरे पार्टी को आत्म मंथन करना है चाहिए था इस चुनाव की हार के लिए। लेकिन पार्टी ने तो कुछ किया ही नहीं।


सवाल: संजय जी, जिस दौर में कांग्रेस के गिरते ग्राफ और हार की बात आप महाराष्ट्र में कर रहे हैं। उस दौर में आपके ऊपर कांग्रेस पार्टी ने बड़ी जिम्मेदारियां दे रखी थी। पार्टी की ऐसी बदहाल दशा में आप कैसे किसी बड़ी जिम्मेदारी से बच सकते हैं। जिम्मेदार तो आप भी हुए।

जवाब: मैं 2014 में एमपी था। 2015 में मुझे मुंबई का अध्यक्ष बनाया गया। मैं पार्टी का इकलौता अध्यक्ष होने के नाते मोदी लहर में 2014 के सियासी हादसे से निपटते हुए संगठन को मजबूत करता रहा। लेकिन आप बताइए, जब मुझे 2019 में लोकसभा का टिकट दिया गया तो अध्यक्ष पद से हटा दिया। ऐसा सिर्फ कांग्रेस में ही हो सकता है। मैंने संगठनात्मक स्तर पर मजबूती से काम किया लेकिन पार्टी ने उसको संभाला ही नहीं।


सवाल: ऐसा लग रहा है कि संजय निरुपम के अंदर का पत्रकार जाग गया है। धड़ाधड़ कांग्रेस पार्टी के ऊपर हमलावर हुए जा रहे हैं और बड़े-बड़े नेताओं को घेर रहे हैं। आपको लगता नहीं है पार्टी से कुछ बात करके वहीं बने रहने में भी कुछ विकल्प खुले रहते।

जवाब: पत्रकार तो हूं ही मैं। मैं सच बोलता हूं। रही बात पार्टी में बात करके कुछ विकल्प खुले रखने की। तो अपने आत्म सम्मान से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं है। जिस पार्टी में एक मजबूत कार्यकर्ता और नेता की बात ना सुनी जाए वहां विकल्प तलाशने का क्या मतलब।


सवाल: एक अंतिम सवाल। आपने कल ट्वीट किया था चुनाव परिणाम के बाद विदेश जाने की तैयारी शुरू होगी। सीधे नाम लेकर क्यों नहीं बोलते हैं कुछ। किसकी ओर इशारा है। 

जवाब: यह किसी एक की ओर इशारा नहीं है जो नाम लिया जाए। आप चुनाव परिणाम के बाद देखिएगा। कौन-कौन विदेश जाता है। तब आप और हम में से कोई भी एक दूसरे को फोन करके इस बात की पुष्टि कर लेगा कि कौन कहां गया है।
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