राजीव गांधी की हत्या के बाद पैदा हुई परिस्थितियों ने पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' के नाम से किताब लिखने वाले उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू अपनी किताब '1991 हाउ पीवी नरसिम्हा राव मेड हिस्ट्री' में लिखते हैं, 'नरसिम्हा राव, देश के पहले एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर थे।
राव, कांग्रेस की बांह पकड़कर सियासत की सीढ़ियां चढ़ते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे, बाद में कुर्सी की वजह से ही उनके और कांग्रेस के रिश्तों में इस कदर खटास आई कि दिल्ली में निधन के बाद उनके शव का अंतिम संस्कार करीब 1500 किलोमीटर दूर करना पड़ा।राव के शव को ले जा रही तोप गाड़ी 24 अकबर रोड यानी सोनिया गांधी के आवास से सटे कांग्रेस मुख्यालय के पास रोक दी गई, लेकिन पार्टी मुख्यालय का गेट बंद रहा। वहां कांग्रेस के तमाम नेता मौजूद थे, लेकिन सब चुप्पी साधे रहे। जयराम रमेश कहते हैं कि, 'कांग्रेस के 99.99 फीसदी लोगों का मानना है कि बाबरी मस्जिद के गिरने के पीछे कहीं न कहीं राव की मिलीभगत थी।
तो पूर्व प्रधानमंत्री इसलिए रोल मॉडल नहीं बन पाए
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार का कहना है कि आज राजनीति, जाति-व्यक्ति-परिवार के बीच फंसी है। गुलजारी लाल नंदा, शास्त्री, देसाई, वीपी सिंह, चंद्रशेखर आदि लोगों ने एक विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम किया था। ये जाति और परिवार को बहुत पीछे छोड़कर चलने वालों में थे। वीपी सिंह ने बुनियादी बदलाव का जो साहसिक कदम उठाया, वह अपने आप में अभूतपूर्व था।
चंद्रशेखर ने राष्ट्रीयता को बचाए रखने के लिए सिखों और मुस्लिमों के हित की सोची तो वे विरोधियों के निशाने पर आ गए। इन प्रधानमंत्रियों ने कभी अपनी जाति या धर्म की लॉबी नहीं बनाई। अपने समुदायों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ खास नहीं किया, जैसा कि आज हर नेता करने के लिए लालायित रहता है।
आनंद कुमार के मुताबिक, ये नेता देश हित की सोचते थे और व्यक्तिवाद से कोसों दूर रहे।इस वजह से इनकी अपनी जाति वाले और यहाँ तक की खुद की पार्टी, इन्हें किसी तरह से रोल मॉडल नहीं मानती।मौजूदा राजनीति, जाति, व्यक्ति और परिवार के चारों तरफ घूम रही है।परिवार की जगह पहले दल होता था, अब वह भी खत्म हो चुका है।नतीजा, इन प्रधानमंत्रियों का नाम चुनाव से बाहर है।