सत्ता संग्राम में यूपी का है बड़ा महत्व
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यूपी ने इंदिरा को जमीन दिखाई
राममनोहर लोहिया ने कांग्रेस के विकल्प की तलाश शुरू की तो केंद्र यूपी रहा। इंदिरा की अगुवाई में 1971 में कांग्रेस ने 352 सीट जीती, जिसमें यूपी की 73 थीं। आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस की बुरी हार हुई। इंदिरा खुद रायबरेली से हारीं। यूपी की सभी 85 सीट, भारतीय लोकदल ने जीतीं। मोरारजी सरकार ज्यादा चली नहीं। 1980 में यूपी ने कांग्रेस को 51 सीटें दीं और इंदिरा फिर पीएम बनीं। उनकी हत्या के बाद 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने कुल 404 सीटें जीतीं, उसमें यूपी की 83 सीटें थीं।
भाजपा के लिए भाग्योदय भूमि
1984 में दो सीटों पर सिमटी भाजपा को 1989 में 85 सीटें मिलीं, इनमें आठ यूपी से थीं। वीपी सिंह भाजपा की मदद से पीएम बने। इसी दौर में राम मंदिर आंदोलन शुरू हुआ। रथ यात्रा के दौरान आडवाणी गिरफ्तार हुए तो वीपी सिंह सरकार गिर गई। राम लहर में 1991 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 120 सीटें जीतीं जिसमें 51 यूपी की थीं।
केंद्र में पहली बार भाजपा
1996 में यूपी की 52 सीटों की बदौलत 161 सीटें जीतने वाले अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। सरकार 13 दिन में गिर गई तो कांग्रेस के समर्थन से देवगौड़ा, फिर गुजराल पीएम बने। दोनों को सपा का समर्थन रहा। 1998 में 181 सीटें जीतकर अटल दोबारा पीएम बने तो यूपी ने 57 सीटें दीं। 1999 में भाजपा को यूपी से 29 और कुल 182 सीटें मिलीं।
सपा-बसपा भी बने किंगमेकर
2004 में फीलगुड और 'भारत उदय' नारा फेल कर जनता ने भाजपा को 139 पर समेटा तो यूपी में पार्टी को केवल दस सीटें मिलीं। यूपी की आठ सहित देश में 145 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने यूपीए सरकार बनाई तो यूपी से ही सपा के 35 व बसपा के 19 सांसदों ने समर्थन दिया। 2009 में यूपीए की वापसी हुई। कांग्रेस 202 सीटें जीतीं जिसमें 21 यूपी से थीं।
जाहिर है, हर चुनाव में हर पार्टी की जीत का दारोमदार यूपी पर रहता है। 2019 में भाजपा और कांग्रेस के अलावा सपा-बसपा गठबंधन भी प्रदेश में सीटों की इस लड़ाई को बेहद दिलचस्प बना रहा है।