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लखीमपुर खीरी हिंसा: क्या बिगड़ सकता है भाजपा का सियासी गणित, केंद्रीय नेतृत्व के सामने रास्ता क्या?

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Mon, 04 Oct 2021 03:04 PM IST

सार

पिछले 10 महीने से चल रहे किसान आंदोलन के बीच लखीमपुर खीरी कांड ने सूबे की योगी सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी है। जहां प्रदेश सरकार अपनी उपलब्धियों के बल पर इस चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही थी, ठीक चुनाव से कुछ महीने पहले इस कांड ने भाजपा को नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करने के लिए मजूबर कर दिया है।
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पीएम मोदी, अमित शाह, सीएम योगी और जेपी नड्डा - फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी कांड में चार किसानों और एक पत्रकार समेत नौ लोगों की मौत के बाद प्रदेश की सियासत में नया बवाल मच गया है। इस सियासी बवाल के बीच किसान आंदोलन को लेकर पहले ही विपक्ष के निशाने पर आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार के खिलाफ प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, संजय सिंह से लेकर तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने आक्रमक रुख अपना लिया है।

रविवार को इस घटना के बाद से ही यहां सियासत तेज है और कई नेताओं को यहां पहुंचने से रोक दिया गया है। दरअसल लखीमपुर खीरी प्रदेश की सियासत का नया अखाड़ा बन गया है जहां हर सियासी पार्टी किसान आंदोलन के जरिए अपनी रणनीति को धार देने में लग गई है। ऐसे में क्या अगले चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर लखीमपुर खीरी की घटना योगी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाली है।


भाजपा की मुश्किलें बढ़ीं
किसान आंदोलन को लेकर पहले से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की भाजपा के प्रति नाराजगी देखने को मिल रही थी। माना जा रहा है कि इस घटना के बाद से भाजपा के लिए मुश्किल और बढ़ गई है। चार महीने बाद प्रदेश में चुनाव होने है, एक तरफ पीएम नरेंद्र मोदी और सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार की उपलब्धियों को लेकर चुनाव में उतरने की तैयारी में लगे हैं। दूसरी तरफ इस घटना के लिए कथित तौर पर सीधे-सीधे केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा उर्फ मोनू मिश्रा को जिम्मेदार ठहराने से भाजपा विपक्ष के निशाने पर आ गई है।



राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की घटनाओं से कोई भी सत्ता में रहते हुए बचना चाहती है, लेकिन सत्ताधारी पार्टी का सीधे तौर पर नाम आ रहा है।  ऐसे में इस घटना से भाजपा का पूरा सियासी गणित गड़बड़ होने की आशंका है। कहा जा रहा है कि महज यूपी ही नहीं बल्कि उत्तराखंड और पंजाब विधानसभा चुनाव पर भी इसका असर पड़ने की संभावना है।

 
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पीएम मोदी, अमित शाह, सीएम योगी और जेपी नड्डा - फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी कांड में चार किसानों और एक पत्रकार समेत नौ लोगों की मौत के बाद प्रदेश की सियासत में नया बवाल मच गया है। इस सियासी बवाल के बीच किसान आंदोलन को लेकर पहले ही विपक्ष के निशाने पर आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार के खिलाफ प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, संजय सिंह से लेकर तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने आक्रमक रुख अपना लिया है।

रविवार को इस घटना के बाद से ही यहां सियासत तेज है और कई नेताओं को यहां पहुंचने से रोक दिया गया है। दरअसल लखीमपुर खीरी प्रदेश की सियासत का नया अखाड़ा बन गया है जहां हर सियासी पार्टी किसान आंदोलन के जरिए अपनी रणनीति को धार देने में लग गई है। ऐसे में क्या अगले चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर लखीमपुर खीरी की घटना योगी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाली है।

भाजपा की मुश्किलें बढ़ीं
किसान आंदोलन को लेकर पहले से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की भाजपा के प्रति नाराजगी देखने को मिल रही थी। माना जा रहा है कि इस घटना के बाद से भाजपा के लिए मुश्किल और बढ़ गई है। चार महीने बाद प्रदेश में चुनाव होने है, एक तरफ पीएम नरेंद्र मोदी और सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार की उपलब्धियों को लेकर चुनाव में उतरने की तैयारी में लगे हैं। दूसरी तरफ इस घटना के लिए कथित तौर पर सीधे-सीधे केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा उर्फ मोनू मिश्रा को जिम्मेदार ठहराने से भाजपा विपक्ष के निशाने पर आ गई है।



राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की घटनाओं से कोई भी सत्ता में रहते हुए बचना चाहती है, लेकिन सत्ताधारी पार्टी का सीधे तौर पर नाम आ रहा है।  ऐसे में इस घटना से भाजपा का पूरा सियासी गणित गड़बड़ होने की आशंका है। कहा जा रहा है कि महज यूपी ही नहीं बल्कि उत्तराखंड और पंजाब विधानसभा चुनाव पर भी इसका असर पड़ने की संभावना है।

 

लखीमपुर खीरी के लिए रवाना होने से पहले पुलिस अधिकारियों से बात करते हुए भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत - फोटो : अमर उजाला
सरकार का रवैया दंभ भरा
उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहराई से समझने वाले बीबीसी के पूर्व पत्रकार और वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रामदत्त त्रिपाठी  कहते हैं कि यह मामला केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह मसला केंद्रीय नेतृत्व का  है। पिछले 10 महीने से किसान आंदोलन चल रहा है, लेकिन सरकार इस आंदोलन को लेकर दंभ भरा व्यवहार कर रही है। जिस कृषि कानून को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं वह सामान्य प्रक्रिया से नहीं बना। बल्कि इसे तुरत-फुरत में बनाया गया है।

वे कहते हैं कि इस कानून को बनाने से पहले किसी स्टेक होल्डर से बात नहीं की गई, संसद की सेलेक्ट कमेटी में यह बिल नहीं भेजा गया, बस सरकार ने अध्यादेश जारी कर इसे लागू कर दिया। जाहिर है इससे किसानों में नाराजगी होगी, लेकिन केंद्र सरकार ने इस मामले में जिस तरह का अड़ियल रवैया अपनाया हुआ है इससे किसानों में जबरदस्त रोष है और यह बढ़ता ही जा रहा है। जिसका नुकसान भाजपा को चुनावों में उठाना पड़ सकता है।

किसान आंदोलन पूरे सूबे में फैलने की आशंका 
समझा जा रहा है कि किसान आंदोलन का असर अभी तक केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित था, लेकिन लखीमपुर खीरी की घटना के बाद यह आंदोलन पूरे सूबे में फैल सकता है। किसान नेता राकेश टिकैत कुछ हद तक पश्चिमी यूपी में किसान संगठनों को लामबंद करने में कामयाब हुए थे लेकिन पूरे प्रदेश में यह आंदोलन नहीं फैला सके थे। लेकन अब किसान नेता अपनी रणनीति नए सिरे से बनाने में लग गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक किसान मोर्चा अब पूरे प्रदेश में आंदोलन को फैलाने और भाजपा नेताओं और जनप्रतिनिधियों को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। कहा जा रहा है कि लखीमपुर खीरी की घटना को लेकर सिर्फ यूपी ही नहीं बल्कि पंजाब और हरियाणा के किसानों में भी नाराजगी देखी जा रही है और बड़ी संख्या में किसान पंजाब और हरियाणा से लखीमपुर खीरी पहुंचने की कोशिश में है। वहीं कुछ किसान नेताओं ने चुनाव तक यूपी में ही डेरा डालने का मन बना लिया है। 
 

लखीमपुर खीरी प्रकरण, कलेक्ट्रेट का घेराव, किसान आंदोलन - फोटो : अमर उजाला
लखीमपुर खीरी वो इलाका है जहां किसान गन्ना सबसे ज्यादा उगाते हैं। यहां कई शुगर मीलें है और यहां के किसान पहले से कृषि कानून और गन्ना की कीमतें नहीं बढ़ाए जाने से नाराज थे। रामदत्त त्रिपाठी के मुताबिक कई सालों से गन्ना की कीमत नहीं बढ़ी थी, अब जाकर 25 रुपये बढ़ाए गए थे। ऐसे में लखीमपुर खीरी कांड किसानों का गुस्सा और बढ़ा सकती है क्योंकि यूपी चुनाव में गन्ना किसान प्रदेश की राजनीति पर बहुत असर डालते हैं। कल की घटना को लेकर पूरा विपक्ष और किसान नेता जिस तरह से सरकार पर आक्रमक है उससे भाजपा को यह सोचना होगा कि वह चुनाव में कैसे इसका मुकाबला करेगी। 

भाजपा को कितना नुकसान, विपक्ष को कितना फायदा कहना मुश्किल
लंबे समय तक कृषि मामलों पर लिखने वाली वरिष्ठ पत्रकार गार्गी परसाईं मानती हैं कि आंदोलन कर रहे किसानों ने पहले ही यह घोषणा की है कि वे भाजपा के खिलाफ खड़े होंगे। पहले ही किसान आंदोलन बहुत बढ़ चुका है और जैसे-जैसे चुनाव आएगा वे इसे फैलाएंगे। अभी उन्होंने हाल ही में मुजफ्फरनगर महापंचायत की थी, उसके बाद उन्होंने हाल में ही भारत बंद किया, हरियाणा में एक आंदोलन किया, इस तरह किसान बार-बार नेताओं का ध्यानाकर्षण कर रहे हैं। 

परसाईं मानती हैं कि इस वक्त यह कहना मुश्किल है कि लखीमपुर खीरी की घटना से भाजपा को कितना नुकसान होगा और विपक्षी पार्टियों को कितना फायदा होगा। क्योंकि इस घटना के बाद भाजपा भी अपनी रणनीति बनाएगी और दूसरी तरफ देखें तो विपक्ष एकजुट नहीं है। विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी को तो पहले अपना ही घर ठीक करने की जरूरत है। वहीं यह भी देखना होगा कि किसान आंदोलन में शामिल किसानों का भाजपा विरोधी जो रूख है उसको वे वोट में कितना तब्दील कर सकेंगे। वैसे कृषि कानून को लेकर अभी तक तो सरकार के रूख में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है। 



 

सीतापुर के सिधौली में रोकीं गईं प्रियंका गांधी - फोटो : अमर उजाला
कांग्रेस ने अपने नेताओं को उतार दिया
अपनी खोई पुरानी सियासी जमीन हासिल करने के लिए कांग्रेस शुरू से किसान आंदोलन का समर्थन कर रही है। लखीमपुर खीरी कांड के बाद किसानों का समर्थन करने के लिए कांग्रेस के कई नेता मैदान में उतार दिए गए। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी जहां रात में ही लखीमपुर खीरी पहुंचने की कोशिश में थीं। वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी घटनास्थल पर पहुंचने के प्रयास में थे। 

हालांकि प्रशासन और पुलिस ने प्रियंका गांधी को लखीमपुर जाने से रोका दिया उन्हें सीतापुर में हिरासत में रखा गया। वहीं कांग्रेस के दोनों मुख्यमंत्रियों को भी लखनऊ आने की इजाजत नहीं मिली। लेकिन पार्टी ने अब पूरे प्रदेश में किसान आंदोलन को लेकर अपनी गतिविधियां तेज करने का कार्यक्रम बना लिया है। पार्टी पूरे प्रदेश में जगह-जगह किसान नेताओं से बात करके मोदी और योगी सरकार की नीतियों के खिलाफ आक्रमक रवैया अपनाएगी। 

दूसरी विपक्षी पार्टियां भी मैदान में
वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी के नेता सतीश मिश्रा, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह समेत विपक्षी पार्टियों के नेता भी लखीमपुर खीरी कांड को लेकर सरकार के खिलाफ उतर आए हैं।  आम आदमी पार्टी राज्यसभा सांसद और यूपी मामलों के प्रभारी संजय सिंह ने अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में कहा कि लखीमपुर खीरी घटना सत्ता के अहंकार और अपराधीकरण का उदाहरण है। 10 महीने से किसान आंदोलन चल रहा है लेकिन न जाने सरकार में ऐसी क्या जिद है कि कानून वापस नहीं ले रही है। भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। 
 

केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र - फोटो : अमर उजाला
केंद्रीय नेतृत्व के सामने रास्ता क्या?
लखीमपुर खीरी कांड ने पूरे भाजपा नेतृत्व को हैरानी और परेशानी में डाल दिया है। चुनाव की तैयारी में जुटे नेतृत्व के सामने यह एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। क्योंकि इस कांड ने किसान आंदोलन को लेकर पहले ही केंद्र सरकार को निशाने पर लेने वाले विपक्ष को एक नया मुद्दा थमा दिया है। पार्टी को डर है कि इससे भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया जा सकता है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व यूपी को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाने में जुटा है। इसलिए योगी सरकार ने किसान नेताओं के साथ समझौता करते हुए मामले की न्यायिक जांच कराने का आदेश दिया है। साथ ही आशीष मिश्रा के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है। 

सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से इस पूरे मामले में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे का नाम सामने आ रहा है और लगातार गृह राज्य मंत्री के इस्तीफे की मांग हो रही है, ऐसे में हो सकता है केंद्रीय नेतृत्व अजय मिश्रा को इस्तीफा देने को कह सकती है। जिससे चुनाव के समय लखीमपुर कांड की गूंज को कुछ हद तक कम किया जा सके। 

रामदत्त त्रिपाठी मानते हैं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ने जिस तरह से किसानों को चुनौती दी, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जिस तरह का बयान दे रहे हैं वह किसानों के गुस्सा को भड़काने का और काम कर रही है। यदि यह मामला नहीं सुलझता है तो पांच राज्यों में कानून-व्यवस्था की समस्या भी पैदा हो सकती है। वे मानते हैं कि पीएम मोदी को बिना देर किए अब किसानों से बात करनी चाहिए। 
 
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