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लद्दाख: चीन से 27 बार की डब्ल्यूएमसीसी बैठक और 12 दौर की सैन्य कमांडर स्तर पर वार्ता के बाद भी भारत के हाथ खाली

Fri, 02 Jul 2021 09:12 PM IST
गौरव पाण्डेय शशिधर पाठक, नई दिल्ली

सार

  • भारत चीन से पिछले 14 महीने से उसके सैनिकों को पीछे ले जाने का कर रहा है आग्रह
  • कैलाश रेंज की चोटियों से सैनिकों को बुलाने के बाद से भारत की नहीं सुन रहा है चीन
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भारत चीन गतिरोध - फोटो : iStock
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विस्तार
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लद्दाख में भारत और चीन के बीच में जारी तनातनी पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची के पास बोलने के लिए कुछ नया नहीं है। अरिंदम भी पूर्ववर्ती अनुराग श्रीवास्तव की ही भाषा बोलने के लिए मजबूर हैं। शुक्रवार को अरिंदम ने बताया कि 25 जून को भारत-चीन के वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोआर्डिनेशन (डब्ल्यूएमसीसी) की 27वीं बैठक हुई थी। इस बैठक में दोनों देशों ने बातचीत और सौहार्द के जरिए मुद्दे को सुलझाने तथा सीमा पर शांति और स्थायित्व बनाए रखने पर जोर दिया है। बैठक में तय हुआ है कि स्थानीय कमांडर इसके लिए शीघ्र चर्चा करेंगे। अभी 12वें दौर की इस चर्चा की तारीख तय नहीं हुई है।

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पिछले साल अप्रैल 2020 में चीन की सेना भारतीय सैन्य बलों के कब्जे और पैट्रोलिंग वाले क्षेत्र में दाखिल हो गई थी। चीनी सैनिकों ने हॉटस्प्रिंग, गोगरा पोस्ट, फिंगर एरिया, पैंगॉन्ग त्सो झील क्षेत्र में अपनी संरचनाएं खड़ी कर ली थीं। इसे विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) अजीत डोभाल ने लगातार सीमा पर चीन का एक तरफा अवधारणा बदलने का प्रयास बताया है। 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, जयशंकर, एनएसए डोभाल ने लगातार सीमा पर शांति और स्थायित्व की स्थापना के उद्देश्य से अपने समकक्षों से दोनों देशों के बीच में बनी सहमतियों, अंतरराष्ट्रीय समझौते का पालन करने की अपील की है, लेकिन स्थिति में कोई संतोषजनक सुधार नहीं है। हालात की गंभीरता को देखते हुए भारत ने भी लद्दाख से लगती सीमा के निकट अपनी सैन्य तैनाती बढ़ाने का निर्णय लिया है।

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कैलाश रेंज की चोटियों से सैनिकों को बुलाने के बाद चीन हमारी नहीं सुन रहा

रक्षा और विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि फिलहाल मामला पेचीदा हो गया है। रंजीत कुमार कहते हैं कि भारतीय सैनिकों ने पिछले साल कैलाश रेंज की चोटियों को कब्जे में ले लिया था। भारतीय सैनिकों की यह मौजूदगी चीन के लिए परेशानी बढ़ा रही थी। अब हमने वहां से सैनिकों को वापस बुला लिया है तो चीन को अपने सैनिकों को पीछे ले जाने की कोई जल्दी नहीं दिखाई दे रही है। 

पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह के अनुसार चीन जिस तरह से ढिठाई दिखा रहा है, उससे साफ लग रहा है कि वह लंबी योजना और रणनीतिक तैयारी के साथ आया है। एक पूर्व राजनयिक का कहना है कि अब पूंछ हमारी दबी है। इसलिए चीन को कोई जल्दी नहीं है। वह नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि यदि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने होते तो यह मामला हल हो जाता। 

उन्होंने कहा, लेकिन ट्रंप हार गए और मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन अपने देश की नीतियों को पुराने ढर्रे की तरफ ले जा रहे हैं। इसलिए चीन अभी अकड़ दिखा रहा है। विदेश सेवा के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि अभी तो देश कोरोना से निपट रहा है। लग रहा है कि अगले कुछ महीने ऐसे ही चलेंगे। कोरोना संक्रमण से मुक्ति का कोई रास्ता मिलने के बाद ऐसे मामलों को जोर देकर निपटाने की स्थिति बनेगी।
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क्या है भारत की रणनीति?

पिछले साल भारत को लद्दाख क्षेत्र में कड़ाके की ठंड का मौसम आने तक मुद्दे के निपटारे की जल्दी थी, लेकिन इस दौर को सैनिकों के हौसले ने आसानी से पार कर लिया। सूत्र बताते हैं कि अब भारत भी चीन के सामने किसी तरह की नरमी के मूड में नहीं है। लद्दाख के सीमावर्ती क्षेत्र में चीन की सैन्य तैनाती को देखते हुए भारत ने भी अपने सैन्य बलों की तैनाती कर रखी है। रक्षा मंत्री, सीडीएस जनरल बिपिन रावत, सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे लगातार हालात पर नजर बनाए हैं। 

सेना मुख्यालय और विदेश मंत्रालय सूत्र का कहना है कि भारत की तैयारी किसी भी स्थिति और चुनौती से निपटने की है। हालांकि दोनों देशों के बीच में डब्ल्यूएमसीसी प्रभावी तरीके से अपना काम कर रहा है और स्थानीय स्तर पर सैन्य कमांडरों की चर्चा चल रही है। इसलिए स्थिति वेट एंड वॉच की ही है। विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि चीन को अपने सैन्य बल अप्रैल 2020 से पहले की तैनाती वाले स्थान और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के क्षेत्र में ले जाने होंगे।
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