रक्षा और विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि फिलहाल मामला पेचीदा हो गया है। रंजीत कुमार कहते हैं कि भारतीय सैनिकों ने पिछले साल कैलाश रेंज की चोटियों को कब्जे में ले लिया था। भारतीय सैनिकों की यह मौजूदगी चीन के लिए परेशानी बढ़ा रही थी। अब हमने वहां से सैनिकों को वापस बुला लिया है तो चीन को अपने सैनिकों को पीछे ले जाने की कोई जल्दी नहीं दिखाई दे रही है।
पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह के अनुसार चीन जिस तरह से ढिठाई दिखा रहा है, उससे साफ लग रहा है कि वह लंबी योजना और रणनीतिक तैयारी के साथ आया है। एक पूर्व राजनयिक का कहना है कि अब पूंछ हमारी दबी है। इसलिए चीन को कोई जल्दी नहीं है। वह नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि यदि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने होते तो यह मामला हल हो जाता।
उन्होंने कहा, लेकिन ट्रंप हार गए और मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन अपने देश की नीतियों को पुराने ढर्रे की तरफ ले जा रहे हैं। इसलिए चीन अभी अकड़ दिखा रहा है। विदेश सेवा के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि अभी तो देश कोरोना से निपट रहा है। लग रहा है कि अगले कुछ महीने ऐसे ही चलेंगे। कोरोना संक्रमण से मुक्ति का कोई रास्ता मिलने के बाद ऐसे मामलों को जोर देकर निपटाने की स्थिति बनेगी।
पिछले साल भारत को लद्दाख क्षेत्र में कड़ाके की ठंड का मौसम आने तक मुद्दे के निपटारे की जल्दी थी, लेकिन इस दौर को सैनिकों के हौसले ने आसानी से पार कर लिया। सूत्र बताते हैं कि अब भारत भी चीन के सामने किसी तरह की नरमी के मूड में नहीं है। लद्दाख के सीमावर्ती क्षेत्र में चीन की सैन्य तैनाती को देखते हुए भारत ने भी अपने सैन्य बलों की तैनाती कर रखी है। रक्षा मंत्री, सीडीएस जनरल बिपिन रावत, सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे लगातार हालात पर नजर बनाए हैं।
सेना मुख्यालय और विदेश मंत्रालय सूत्र का कहना है कि भारत की तैयारी किसी भी स्थिति और चुनौती से निपटने की है। हालांकि दोनों देशों के बीच में डब्ल्यूएमसीसी प्रभावी तरीके से अपना काम कर रहा है और स्थानीय स्तर पर सैन्य कमांडरों की चर्चा चल रही है। इसलिए स्थिति वेट एंड वॉच की ही है। विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि चीन को अपने सैन्य बल अप्रैल 2020 से पहले की तैनाती वाले स्थान और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के क्षेत्र में ले जाने होंगे।