अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी.श्रीकुमार ने बताया, सरकार के के निर्णय के खिलाफ कर्मचारी संगठन कोर्ट में जा रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों का समर्थन लिया जा रहा है। सीपीआई, कांग्रेस पार्टी, डीएमके और एनसीपी सहित दूसरे राजनीतिक दलों से बातचीत हो रही है। जल्द ही राहुल गांधी और शरद पवार इस मामले में बयान जारी कर सकते हैं। सरकार को इन कारखानों की अहमियत मालूम है, लेकिन इसके बावजूद वह इन्हें निजी हाथों में सौंपना चाहती है।
इसलिए इनका सरकारी बने रहना जरूरी
बकौल श्रीकुमार, 41 आयुध कारखानों का सरकारी क्षेत्र में रहना इसलिए जरुरी है, क्योंकि ये देश की रक्षा से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने इस बाबत दो तीन उदाहरण बताए हैं। श्रीकुमार ने कहा, भारत पाकिस्तान की लड़ाई में पेट्रोल सप्लाई की जिम्मेदारी प्राइवेट कंपनियों के हाथों में थी। बर्मा शेल के अलावा एक अन्य मल्टी नेशनल कंपनी थी। इन्होंने पाकिस्तान को पेट्रोल की सप्लाई तो की, मगर भारत के लिए परेशानी खड़ी कर दी। उस वक्त केंद्र सरकार की नींद टूटी थी। उसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बनाई गईं।
कारगिल की लड़ाई में माइनस 47 डिग्री तापमान में पहने जाने वाले स्नो सूट की सप्लाई का जब एक प्राइवेट कंपनी को टेंडर मिला तो मालूम चला कि सूट बनाने का काम पाकिस्तान की कंपनी के पास चला गया है। इसके बाद यह ऑर्डर तय समय पर पूरा नहीं हो सका। पाकिस्तान के साथ लड़ाई चल रही थी। उस वक्त आयुध कारखानों ने ही वह ऑर्डर पूरा किया था।
केंद्र सरकार लंबे समय से इन कारखानों पर नजर रखे हुए थी। इस मामले में सलाह देने के लिए केपीएमजी को सलाहकार भी नियुक्त कर दिया गया। कारखानों के पास 62 हजार एकड़ जमीन है। इसका बाजार मूल्य दो लाख करोड़ रुपये है, जबकि सरकार के सलाहकार ने इसका दाम 72 हजार करोड़ रुपये लगाया था।
केंद्र की मंशा है कि इन कारखानों की जमीन को उद्योगपतियों के हवाले कर दिया जाए। 26 जुलाई से होने वाली हड़ताल में 71 हजार कर्मचारी शामिल होंगे। कारखानों के अलावा ट्रेनिंग सेंटर, अस्पताल और स्कूल भी इस हड़ताल में शामिल रहेंगे। गत वर्ष कारखाना कर्मचारी संगठनों ने केंद्र सरकार के समक्ष अपना विरोध दर्ज करा दिया था।
इन कारखानों को निगम न बनाने की एवज में डिफेंस सेक्रेटरी को कई तरह के प्रपोजल दिए गए थे, लेकिन सरकार को कोई पसंद नहीं आया। वजह, केंद्र सरकार इन कारखानों को निजी हाथों में देने का मन बना चुकी है। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि इस बाबत लंबी लड़ाई लड़ी जाएगी।