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Farm Laws: पानी और आरोपों की बौछार सहते हुए एक साल तक आंदोलन कैसे कामयाबी से चलाते रहे किसान, जानिए वो पांच कारण

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Fri, 19 Nov 2021 05:43 PM IST

सार

जब किसानों ने पिछले साल नवंबर में दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर मार्च किया तो केंद्र सरकार समेत कई लोगों ने सोचा कि किसान अपना विरोध दर्ज कराकर वापस लौट आएंगे, लेकिन उन्होंने कड़ाके की सर्दी और भीषण गर्मी का सामना करते हुए आंदोलन वाले स्थानों पर एक छोटा शहर ही बसा लिया।
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किसान आंदोलन (फाइल फोटो) कृषि कानून बिल - फोटो : amar ujala
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा की तो किसानों में खुशी की लहर दौड़ गई। हालांकि किसान नेता राकेश टिकैत ने अभी आंदोलन को बनाए रखने की बात कही है।  पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर किसान पिछले साल 26 नवंबर से दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं।

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन पहले पंजाब में शुरू हुआ, लेकिन धीरे-धीरे हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में फैल गया। लेकिन इसने देश का ध्यान तभी खींचा जब किसानों ने पिछले साल 26 नवंबर को दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर मार्च किया और यहां डेरा डालकर बैठ गए। इसे स्वतंत्र भारत का सबसे लंबा कृषि आंदोलन कहा जा रहा है।  हैरत की बात रही आंदोलन में भाग लेने वाली यूनियनों और विचारधाराओं की बहुलता रही, आपस में उनकी मामूली उठापटक भी चलती रही, बावजूद इसके यह आंदोलन नहीं रूका। जबकि आंदोलनकारियों पर पानी और आरोपों की भी बौछार हुई।  


एक नजर उन पांच वजहों पर डालिए जो प्रदर्शनकारियों को अपने इरादों से डिगा नहीं सके 

एकता:
किसान संघों के नेता इस आंदोलन में अपने दृष्टिकोण को लेकर बहुत साफ थे और वे रणनीति से आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने आंदोलन में बहुत जल्दी एक साथ काम करने का फैसला किया। आंदोलन को लंबे समय तक कवर करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक वे एकजुट थे इसलिए उनके विरोध को नजरअंदाज करना असंभव हो गया। पंजाब में किसानों ने विरोध शुरू किया और बाद में इसे राष्ट्रीय राजधानी में ले जाने का फैसला किया। संयुक्त किसान मोर्चा की छत्रछाया में नेताओं ने एक समूह की तरह काम किया।

वे पहले दिन से ही लंबी लड़ाई के लिए तैयार थे। ट्रैक्टर ट्रॉलियां बिस्तर और भोजन से लदी हुई थीं। जब वे दिल्ली आए तो उन्होंने देश भर का ध्यान अपनी ओर खींचा। सरकार के साथ कई दौर की वार्ताएं हुईं पर बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची तो गतिरोध जारी रहा। इसके साथ ही संघ के नेताओं ने अपना विरोध प्रदर्शन भी जीवित बनाए रखा। हालांकि गणतंत्र दिवस की हिंसा ने इस आंदोलन को एक बड़ा झटका दिया। इससे लोगों ने कयास लगाया कि यूनियन में विभिन्न विचारधारा के लोग है लिहाजा यह आंदोलन किसी भी समय खत्म हो सकता है। किसी को भी उनके इतने दिनों तक एक साथ रहने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन वे संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले एकजुट रहे और अपने मतभेदों को आंदोलन में बाधा नहीं बनने दिया।
 
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किसान आंदोलन (फाइल फोटो) कृषि कानून बिल - फोटो : amar ujala
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा की तो किसानों में खुशी की लहर दौड़ गई। हालांकि किसान नेता राकेश टिकैत ने अभी आंदोलन को बनाए रखने की बात कही है।  पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर किसान पिछले साल 26 नवंबर से दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं।

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन पहले पंजाब में शुरू हुआ, लेकिन धीरे-धीरे हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में फैल गया। लेकिन इसने देश का ध्यान तभी खींचा जब किसानों ने पिछले साल 26 नवंबर को दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर मार्च किया और यहां डेरा डालकर बैठ गए। इसे स्वतंत्र भारत का सबसे लंबा कृषि आंदोलन कहा जा रहा है।  हैरत की बात रही आंदोलन में भाग लेने वाली यूनियनों और विचारधाराओं की बहुलता रही, आपस में उनकी मामूली उठापटक भी चलती रही, बावजूद इसके यह आंदोलन नहीं रूका। जबकि आंदोलनकारियों पर पानी और आरोपों की भी बौछार हुई।  

एक नजर उन पांच वजहों पर डालिए जो प्रदर्शनकारियों को अपने इरादों से डिगा नहीं सके 

एकता:
किसान संघों के नेता इस आंदोलन में अपने दृष्टिकोण को लेकर बहुत साफ थे और वे रणनीति से आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने आंदोलन में बहुत जल्दी एक साथ काम करने का फैसला किया। आंदोलन को लंबे समय तक कवर करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक वे एकजुट थे इसलिए उनके विरोध को नजरअंदाज करना असंभव हो गया। पंजाब में किसानों ने विरोध शुरू किया और बाद में इसे राष्ट्रीय राजधानी में ले जाने का फैसला किया। संयुक्त किसान मोर्चा की छत्रछाया में नेताओं ने एक समूह की तरह काम किया।

वे पहले दिन से ही लंबी लड़ाई के लिए तैयार थे। ट्रैक्टर ट्रॉलियां बिस्तर और भोजन से लदी हुई थीं। जब वे दिल्ली आए तो उन्होंने देश भर का ध्यान अपनी ओर खींचा। सरकार के साथ कई दौर की वार्ताएं हुईं पर बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची तो गतिरोध जारी रहा। इसके साथ ही संघ के नेताओं ने अपना विरोध प्रदर्शन भी जीवित बनाए रखा। हालांकि गणतंत्र दिवस की हिंसा ने इस आंदोलन को एक बड़ा झटका दिया। इससे लोगों ने कयास लगाया कि यूनियन में विभिन्न विचारधारा के लोग है लिहाजा यह आंदोलन किसी भी समय खत्म हो सकता है। किसी को भी उनके इतने दिनों तक एक साथ रहने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन वे संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले एकजुट रहे और अपने मतभेदों को आंदोलन में बाधा नहीं बनने दिया।
 

किसान आंदोलन (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
लंबे समय तक कृषि मामलों पर लिखने वाली वरिष्ठ पत्रकार गार्गी परसाईं कहती हैं इस आंदोलन की सफलता के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि तीनों विवादस्पद कृषि कानूनों की वजह से एकदम से किसानों के सामने उनकी आजीविका का सवाल आ गया था। सरकारें कभी किसानों की नहीं सुनती थीं, ऐसा नहीं है कि अभी नहीं सुनती पहले भी नहीं सुनती थी। देखा जाए तो कई सालों से किसान अपनी बात कहना चाह रहे थे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। न्यूनतम समर्थन मूल्य पूरा नहीं मिल रहा था, खेती-किसानी के लिए जरूरी चीजें बहुत महंगी हो गई थीं, कई किसानों ने आत्महत्या कर ली थी। लेकिन जब ऑर्डिनेंस से तीन कानून बनाए गए तो उनके सब्र का बांध टूट गया। हैरानी की बात है कि कानून बनाने से पहले उनसे बातचीत नहीं की गई इसलिए किसान एकजुट हो गए।

संसाधन: 
दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन को लंबे समय तक जारी रखने के लिए संसाधनों की जरूरत थी। इस जरूरत को भांपते हुए पिछले साल ही यूनियनों ने गांवों से मासिक सहयोग राशि शुरू कर दी थी। जम्हूरी किसान सभा के महासचिव रतन सिंह अजनाला ने मीडिया को बताया कि ग्रामीण अपनी जोत के आधार पर एक निश्चित राशि का योगदान आंदोलन में करने लगे। यूपी, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान समेत अलग-अलग राज्यों से किसानों ने सहयोग राशि भेजनी शुरू की।

किसान मजदूर संघर्ष समिति ने रबी और खरीफ की फसल के बाद पंजाब के किसानों से साल में दो बार सहयोग राशि ली। जब से विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ है, तब से गायकों, कलाकारों और एनआरआई ने भी आंदोलन के लिए धन भेजकर सहयोग किया। इन्हीं सहयोग राशियों का इस्तेमाल टेंट, शौचालय, जेनसेट और बोरवेल खोदने में किया गया। जिससे प्रदर्शनकारियों के लिए वहां अधिक समय बिताना आसान हो गया। इलेक्ट्रीशियन, मैकेनिक और प्लंबर जैसे कुशल कर्मचारी ने इन धरनास्थलों पर शेड बनाने, पंखे लगाने और ट्रैक्टरों की मरम्मत करने के लिए मुफ्त सेवाएं दीं। 

 

किसान आंदोलन (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
संपन्न किसानों ने धरना स्थलों पर कूलर, पंखे और गैस वगैरह का इंतजाम कराया। किसानों के घरवाले और गांववाले धरनास्थल पर राशन, सब्जी और दूध भेजने लगे। इसमें नौजवानों की ड्यूटी लगाई जो, गांवों से खाने-पीने का जरूरी सामान धरना-स्थल पर पहुंचाने लगे। इसके अलावा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी), दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीजीएमसी) और कुछ अन्य गैर सरकारी संगठनों ने धरनास्थलों पर लंगर लगाया जिससे आंदोलनकारियों को भूखे नहीं रहना पड़े। 

लोगों का सहयोग:
कोई भी आंदोलन लोगों के सहयोग के बिना नहीं चल सकता। इस आंदोलन को भी देश-विदेश से लोगों का जबरदस्त सहयोग और समर्थन मिला। किसान अपने आप धरनास्थलों पर पहुंचने लगे। हालांकि इस आंदोलन के पीछे भीड़ इकट्ठी करने के लिए एक संगठित व्यवस्था काम कर रही थी। गांव-गांव में लोगों को संदेश पहुंचाया जा रहा था। कृषि आंदोलन में अच्छी संख्या में भीड़ जुट सके इसके लिए पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में गांवों, ब्लॉकों और जिलों के स्तर पर समितियों का गठन किया गया। रोस्टर के हिसाब से धरनास्थल पर रुकने के लिए किसानों की ड्यूटी लगाई गई।

यह सुनिश्चित किया गया कि किसी भी हाल में धरना स्थल खाली न हों। आंदोलन में सिर्फ किसान ही नहीं जुटे बल्कि यूनियनों ने खेती से जुड़े लगभग सभी लोगों जैसे ट्रक ड्राइवरों और ईंट भट्ठा श्रमिकों से लेकर कमीशन एजेंटों तक को आंदोलन में शामिल किया। हालांकि बीते कुछ समय से आंदोलन स्थल पर किसानों की संख्या कम देखी जा रही थी। इसकी एक बड़ी वजह यह बताया गया कि ज्यादतर किसान रबी की फसल की बुआई के लिए अपने खेतों पर हैं। 

 

किसान आंदोलन में महिलाएं भी हुई थीं शामिल (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
महिलाएं:
जैसे किसी पुरुष की सफलता के पीछे एक महिला का हाथ माना जाता है, उसी तरह इस आंदोलन मे जुटे पुरुष किसानों के पीछे उनकी मांओ, पत्नियों, बहनों और बेटियों का सहयोग था। बडी संख्या में महिलाएं ट्रैक्टर चलाकर धरना स्थल पर अपने घर के पुरुषों के प्रोत्साहन के लिए दिल्ली की सीमाओं पर आईं और धरने में शामिल हुईं। महिला किसानों के कई गुट 'महिला किसान संसद'  में शामिल हुईं। ऐसी कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि जब पुरुष आंदोलन स्थल पर थे तब खेती का काम महिलाओं ने अपने जिम्मे लिया। घर, परिवार के साथ खेती का काम करते हुए वे आंदोलन में भी सहयोग दे रही थीं। 

वरिष्ठ पत्रकार गार्गी परसाईं कहती हैं आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक रहा, इसलिए यह लंबा खींचा और सबसे बड़ी बात महिलाओं ने उनका साथ दिया। वे भी इस आंदोलन में सामने आईं और आंदोलनकारियों को मजबूती मिली। 

सोशल मीडिया 
इस आंदोलन को फैलाने में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही। एक किसान नेता बताते हैं किसानों को तीनों कानूनों की जानकारी सबसे पहले किसी सरकारी एजेंसी से नहीं बल्कि सोशल मीडिया से ही मिली थी जिसमें कुछ इस तरह लिखा था कि यदि तीनों कानून लागू होते हैं, तो किसान से उनकी जमीन लूटकर कॉर्पोरेट दिग्गजों को दे दिया जाएगा। तब किसान संगठनों ने कानून के जानकारों से इस कानून के संदर्भ को समझा और आंदोलन का फैसला किया।

लोगों को आंदोलन से जोड़े रखने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए। फेसबुक और यूट्यूब पर वीडियो डाले गए। नेताओं के भाषण सोशल मीडिया पर लाइव दिखाए गए। 26 जनवरी की हिंसा के बाद जब यूपी पुलिस गाजीपुर साइट को खाली करने के प्रयास कर रही थी, और बीकेयू नेता महेंद्र सिंह टिकैत की घेराबंदी होने लगी थी तो ये समूह रातों-रात हजारों लोगों को जुटाने में कामयाब रहे।

गायकों और कलाकारों ने भी युवाओं को आकर्षित कर विरोध प्रदर्शन को कायम रखने में अहम भूमिका निभाई। परंपरागत रूप से ऐसी रैलियों में अक्सर बुजुर्गों और मध्यम आयु वर्ग के लोगों को ही देखा जाता है लेकिन यह पहली बार जब इस आंदोलन के प्रति पढ़े-लिखे और नौकरीपेशा युवा भी शामिल हुए। दिलजीत दोसांझ और दीप सिद्धू से लेकर कंवर ग्रेवाल तक कई पंजाबी गायकों और कलाकारों ने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया। आंदोलन को बॉलीवुड का भी साथ मिला।  


 
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