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क्या चीन को सुरक्षा परिषद में मिली स्थायी सीट भारत की देन है?

Shilpa Thakur
Updated Thu, 14 Mar 2019 02:40 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर

चीन ने एक बार फिर आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के भारत के प्रयास को विफल कर दिया है। इस पर राहुल गांधी ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "कमजोर मोदी शी (चीन के राष्ट्रपति) से डर गए हैं। जब चीन भारत के खिलाफ काम करता है तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता।"

राहुल के ट्वीट पर भारतीय जनता पार्टी ने ट्वीट किया। और चीन की स्थायी सदस्यता के लिए देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया। तो क्या सच में चीन को मिली स्थायी सदस्यता की सीट भारत की देन है? 



राहुल गांधी के ट्वीट पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश मुश्किल में होता है तो राहुल गांधी को खुशी क्यों होती है? रविशंकर प्रसाद ने कहा, 'चीन की बात राहुल करेंगे तो बात दूर तलक जाएगी।'

प्रसाद ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में नौ जनवरी 2004 की 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट की कॉपी दिखाते हुए कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद की सीट लेने से इंकार कर दिया था और इसे चीन को दिलवा दिया था। इस रिपोर्ट में कांग्रेस नेता और संयुक्त राष्ट्र में अवर महासचिव रहे शशि थरूर की किताब 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ इंडिया' का हवाला दिया गया है।

इस किताब में शशि थरूर ने लिखा है कि 1953 के आसपास भारत को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था लेकिन उन्होंने यह मौका चीन को दे दिया। थरूर ने लिखा है कि भारतीय राजनयिकों ने वो फाइल देखी थी जिस पर नेहरू के इंकार का जिक्र था। थरूर के अनुसार नेहरू ने यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी।

दरअसल, रविशंकर प्रसाद यह कहना चाह रहे थे कि आज अगर चीन यूएन की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य है तो नेहरू के कारण और उसी का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है।
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चीन को संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सीट मिलने की ये कहानी 1950 के दशक से शुरू होती है। तब 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र बना, जबकि चीन इससे कुछ महीने पहले 21 सितंबर 1949 को जनवादी चीन बना। भारत चाहता था कि चीन संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बने।

भारत पाकिस्तान को इस्लामिक देश के तौर पर और चीन को कम्युनिस्ट देश के तौर पर मान्यता देने वाला प्रथम देश (पहला गैर कम्युनिस्ट देश) था। उस वक्त सुरक्षा परिषद की चार सीटों पर अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस काबिज थे। जबकि पांचवीं सीट खाली थी।

यह भी पढ़ें- चीन ने चौथी बार बचाया आतंकी मसूद अजहर को, जानिए क्या है वीटो और इसकी ताकत

पश्चिमी देश चाहते थे कि ये सीट भारत को मिले। वह नहीं चाहते थे कि ये सीट चीन को मिले। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर चीन को स्थायी सदस्यता दे दी जाती तो परिषद में दो कम्युनिस्ट देश हो जाते। लेकिन नेहरू ने चीन की वकालत की थी। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि तब तक भारत के चीन के साथ रिश्ते अच्छे थे।

ताइवान को मिली थी चीन की सीट

ये वो समय था जब च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच गृहयुद्ध चल रहा था। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस कम्युनिस्टों से घृणा करते थे। चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गई। लेकिन गृहयुद्ध में चीनी कम्युनिस्टों की जीत हुई।

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प्रतीकात्मक तस्वीर
चीन ने एक बार फिर आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के भारत के प्रयास को विफल कर दिया है। इस पर राहुल गांधी ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "कमजोर मोदी शी (चीन के राष्ट्रपति) से डर गए हैं। जब चीन भारत के खिलाफ काम करता है तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता।"

राहुल के ट्वीट पर भारतीय जनता पार्टी ने ट्वीट किया। और चीन की स्थायी सदस्यता के लिए देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया। तो क्या सच में चीन को मिली स्थायी सदस्यता की सीट भारत की देन है? 

राहुल गांधी के ट्वीट पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश मुश्किल में होता है तो राहुल गांधी को खुशी क्यों होती है? रविशंकर प्रसाद ने कहा, 'चीन की बात राहुल करेंगे तो बात दूर तलक जाएगी।'

प्रसाद ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में नौ जनवरी 2004 की 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट की कॉपी दिखाते हुए कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद की सीट लेने से इंकार कर दिया था और इसे चीन को दिलवा दिया था। इस रिपोर्ट में कांग्रेस नेता और संयुक्त राष्ट्र में अवर महासचिव रहे शशि थरूर की किताब 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ इंडिया' का हवाला दिया गया है।

इस किताब में शशि थरूर ने लिखा है कि 1953 के आसपास भारत को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था लेकिन उन्होंने यह मौका चीन को दे दिया। थरूर ने लिखा है कि भारतीय राजनयिकों ने वो फाइल देखी थी जिस पर नेहरू के इंकार का जिक्र था। थरूर के अनुसार नेहरू ने यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी।

दरअसल, रविशंकर प्रसाद यह कहना चाह रहे थे कि आज अगर चीन यूएन की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य है तो नेहरू के कारण और उसी का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है।

चीन को संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सीट मिलने की ये कहानी 1950 के दशक से शुरू होती है। तब 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र बना, जबकि चीन इससे कुछ महीने पहले 21 सितंबर 1949 को जनवादी चीन बना। भारत चाहता था कि चीन संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बने।

भारत पाकिस्तान को इस्लामिक देश के तौर पर और चीन को कम्युनिस्ट देश के तौर पर मान्यता देने वाला प्रथम देश (पहला गैर कम्युनिस्ट देश) था। उस वक्त सुरक्षा परिषद की चार सीटों पर अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस काबिज थे। जबकि पांचवीं सीट खाली थी।

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पश्चिमी देश चाहते थे कि ये सीट भारत को मिले। वह नहीं चाहते थे कि ये सीट चीन को मिले। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर चीन को स्थायी सदस्यता दे दी जाती तो परिषद में दो कम्युनिस्ट देश हो जाते। लेकिन नेहरू ने चीन की वकालत की थी। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि तब तक भारत के चीन के साथ रिश्ते अच्छे थे।

ताइवान को मिली थी चीन की सीट

ये वो समय था जब च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच गृहयुद्ध चल रहा था। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस कम्युनिस्टों से घृणा करते थे। चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गई। लेकिन गृहयुद्ध में चीनी कम्युनिस्टों की जीत हुई।

संसद में नेहरू ने प्रस्ताव मिलने की बातों को किया था खारिज

पं. जवाहर लाल नेहरू - फोटो : फाइल फोटो
हालांकि कई लोग मानते हैं कि जो इस बात को लेकर नेहरू की आलोचना करते हैं वो कई अन्य तथ्यों की उपेक्षा करते हैं। संयुक्त राष्ट्र 1945 में बना था और इससे जुड़े संगठन तब आकार ही ले रहे थे।1945 में सुरक्षा परिषद के जब सदस्य बनाए गए तब भारत आजाद भी नहीं हुआ था। 27 सितंबर, 1955 को नेहरू ने संसद में स्पष्ट रूप से इस बात को खारिज कर दिया था कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का कोई अनौपचारिक प्रस्ताव मिला था।

27 सितंबर, 1955 को डॉ. जेएन पारेख के सवालों के जवाब में नेहरू ने संसद में कहा था, 'यूएन में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने के लिए औपचारिक या अनौपचारिक रूप से कोई प्रस्ताव नहीं मिला था। कुछ संदिग्ध संदर्भों का हवाला दिया जा रहा है जिसमें कोई सच्चाई नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के तहत किया गया था और इसमें कुछ खास देशों को स्थायी सदस्यता मिली थी। चार्टर में बिना संशोधन के कोई बदलाव या कोई नया सदस्य नहीं बन सकता है। ऐसे में कोई सवाल ही नहीं उठता है कि भारत को सीट दी गई और भारत ने लेने से इंकार कर दिया। हमारी घोषित नीति है कि संयुक्त राष्ट्र में सदस्य बनने के लिए जो भी देश योग्य हैं उन सबको शामिल किया जाए।'

नेहरू चीन की सुरक्षा परिषद में सदस्यता के हिमायती थे : एजी नूरानी

वहीं, वर्ष 2002 में फ्रंटलाइन पत्रिका में 'नेहरूवादी दृष्टिकोण' पर अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ एजी नूरानी द्वारा लिखे एक लेख में अमेरिका और रूस द्वारा भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सदस्यता का मौका दिए जाने को लेकर नेहरू द्वारा 1955 में लिखे एक लेख का उल्लेख किया गया है। 

इस लेख में नेहरू ने लिखा था, 'अनौपचारिक रूप से अमेरिका द्वारा यह सुझाव दिया गया है कि चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता देनी चाहिए लेकिन सुरक्षा परिषद में नहीं और भारत को सुरक्षा परिषद में स्थान देना चाहिए। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि इसका मतलब चीन के साथ संबंध खराब करना है। और चीन जैसे महान देश को सुरक्षा परिषद में शामिल न करना बहुत अनुपयुक्त होगा। इसलिए, हमने उन लोगों को स्पष्ट कर दिया है जिनका कहना था कि हम इस सुझाव से सहमत नहीं हो सकते। हमने थोड़ा और आगे बढ़ते हुए यह कहा है कि इस स्थिति में सुरक्षा परिषद में शामिल होने की इच्छा नहीं रखते हैं, भले ही एक महान देश होने के नाते उसे वहां होना चाहिए। पहला कदम चीन को उसके उचित स्थान पर पहुंचने के लिए उठाया जाना चाहिए, उसके बाद भारत के सवाल पर अलग से विचार किया जा सकता है।'

अंतरराष्ट्रीय तनाव को कम करने के लिए भारत ने चीन का पक्ष लिया!

भारत-चीन - फोटो : फाइल फोटो
आधुनिक भारतीय इतिहास और राजनीति के प्रमुख विद्वान एजी नूरानी का कहना है कि ऐसे बहुत से कारण थे कि भारत चीन को स्थायी सदस्यता दिलाना चाहता था। शीत युद्ध की शुरुआत में भारत किसी से रिश्ते नहीं बिगाड़ना चाहता था

भारत अंतरराष्ट्रीय तनावों को कम के लिए भी पीआरसी (पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना)  को सीट का समर्थन कर रहा था। ऐसा इसलिए भी क्योंकि इस समय शीत युद्ध शुरू हो गया था और अंतरराष्ट्रीय तनाव भी बढ़ गया था।

सुरक्षा परिषद में चीन को सीट देकर पीआरसी को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एकीकृत करना वास्तव में नेहरू की विदेश नीति का एक केंद्रीय स्तंभ था। नेहरू चाहते थे कि यूएन के चार्टर में किसी भी बदलाव और अन्य सदस्य को जोड़ने से पहले इसमें चीन को जोड़ा जाए। भारत भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक सीट चाहता था लेकिन चीन की सीट के बदले सीट लेना भारत को कतई मंजूर नहीं था।

बीजिंग में भारत के राजदूत ने झोउ एनलाई को ये जानकारी दी थी कि उनका मानना है कि ब्रिटेन और मिस्र पीआरसी को चीन की सुरक्षा परिषद की सीट का समर्थन देंगे, जिससे उसे बहुमत मिलेगा। नेहरू की विदेश नीति के केंद्र में चीन था। वह नहीं चाहते थे कि चीन की जगह भारत ले। अमेरिका के प्रस्ताव के लिए इनकार करना भारत का उसके साथ कठिन संबंधों को भी दर्शाता है।
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