चीन ने एक बार फिर आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के भारत के प्रयास को विफल कर दिया है। इस पर राहुल गांधी ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "कमजोर मोदी शी (चीन के राष्ट्रपति) से डर गए हैं। जब चीन भारत के खिलाफ काम करता है तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता।"
राहुल के ट्वीट पर भारतीय जनता पार्टी ने ट्वीट किया। और चीन की स्थायी सदस्यता के लिए देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया। तो क्या सच में चीन को मिली स्थायी सदस्यता की सीट भारत की देन है?
राहुल गांधी के ट्वीट पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश मुश्किल में होता है तो राहुल गांधी को खुशी क्यों होती है? रविशंकर प्रसाद ने कहा, 'चीन की बात राहुल करेंगे तो बात दूर तलक जाएगी।'
प्रसाद ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में नौ जनवरी 2004 की 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट की कॉपी दिखाते हुए कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद की सीट लेने से इंकार कर दिया था और इसे चीन को दिलवा दिया था। इस रिपोर्ट में कांग्रेस नेता और संयुक्त राष्ट्र में अवर महासचिव रहे शशि थरूर की किताब 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ इंडिया' का हवाला दिया गया है।
इस किताब में शशि थरूर ने लिखा है कि 1953 के आसपास भारत को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था लेकिन उन्होंने यह मौका चीन को दे दिया। थरूर ने लिखा है कि भारतीय राजनयिकों ने वो फाइल देखी थी जिस पर नेहरू के इंकार का जिक्र था। थरूर के अनुसार नेहरू ने यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी।
दरअसल, रविशंकर प्रसाद यह कहना चाह रहे थे कि आज अगर चीन यूएन की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य है तो नेहरू के कारण और उसी का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है।
चीन को संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सीट मिलने की ये कहानी 1950 के दशक से शुरू होती है। तब 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र बना, जबकि चीन इससे कुछ महीने पहले 21 सितंबर 1949 को जनवादी चीन बना। भारत चाहता था कि चीन संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बने।
भारत पाकिस्तान को इस्लामिक देश के तौर पर और चीन को कम्युनिस्ट देश के तौर पर मान्यता देने वाला प्रथम देश (पहला गैर कम्युनिस्ट देश) था। उस वक्त सुरक्षा परिषद की चार सीटों पर अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस काबिज थे। जबकि पांचवीं सीट खाली थी।
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पश्चिमी देश चाहते थे कि ये सीट भारत को मिले। वह नहीं चाहते थे कि ये सीट चीन को मिले। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर चीन को स्थायी सदस्यता दे दी जाती तो परिषद में दो कम्युनिस्ट देश हो जाते। लेकिन नेहरू ने चीन की वकालत की थी। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि तब तक भारत के चीन के साथ रिश्ते अच्छे थे।
ताइवान को मिली थी चीन की सीट
ये वो समय था जब च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच गृहयुद्ध चल रहा था। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस कम्युनिस्टों से घृणा करते थे। चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गई। लेकिन गृहयुद्ध में चीनी कम्युनिस्टों की जीत हुई।