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कश्मीर, हैदराबाद की तरह भोपाल रियासत भी भारत में विलय के पक्ष में नहीं थी, जानिए इसका इतिहास

Wed, 24 Jun 2020 03:51 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय साल 1949 में हुआ था - फोटो : राजभवन, मध्य प्रदेश
देश के आजाद होने के बाद सन् 1947 में 26 अगस्त को भोपाल रियासत ने भारत में शामिल होने का एलान किया था लेकिन भोपाल रियासत ने अपने यहां दो साल भारत का तिरंगा नहीं लहराया बल्कि अपना अलग झंडा लहराता रहा। हालांकि एक सैद्धान्तिक सहमति के बावजूद भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय साल 1949 को हुआ था। 

भारत को आजादी मिलने के समय भोपाल की नवाबी रियासत का इतिहास कुछ सवा दो सौ साल का था। भोपाल रियासत को मोहम्मद खान ने बसाया था और हमीदुल्लाह खान इस रियासत के आखिरी नवाब साबित हुए। माउंटबेटन और भारतीय नेताओं के बीत हुए करार के बाद भारत विभाजन और आजादी एक साथ मिल रही थी।

उस समय भारत में स्थित कई रियासतों को यह विकल्प दिया गया था कि वो भारत और पाकिस्तान में से किसी एक देश को चुनें और विलय करें। ऐसा कहा जाता है कि एक जन आंदोलन जिसमें कई लोगों का खून बहा था, उसके बाद ही भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय हुआ था। आइए जानते हैं कि इस विलय में कितनी परेशानियां सामने आईं थीं...
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भोपाल की अधूरी ताजुल मस्जिद - फोटो : राजभवन, मध्य प्रदेश
भोपाल के नवाब का समर्थन मुस्लिम लीग को
साल 1926 में भोपाल के नवाब बने हमीदुल्लाह खान मुस्लिम लीग के सक्रिया सदस्य थे और 1930-32 में हुए गोलमेज सम्मेलन में खास प्रतिनिधि भी चुने गए थे। पूरे जग में मोहम्मद अली जिन्ना और हमीदुल्लाह खान की दोस्ती और वफादारी के किस्से गूंजते थे। 

बावजूद इसके साल 1947 में जब भारत और पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने की बात आई तो हमीदुल्लाह ने कश्मीर, हैदराबाद, सिक्किम जैसी रियासतों की तरह खुद के लिए अपनी एक स्वायत्त रियासत की दलील दी और दोनों विकल्पों में विलय करने के लिए मना कर दिया। 
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भोपाल रियासत का एक शाही महल - फोटो : राजभवन, मध्य प्रदेश
माउंटबेटन ने भोपाल रियासत की अपील की खारिज
भोपाल के स्वतंत्र रियासत बने रहने की हमीदुल्लाह की अपील को माउंटबेटन ने खारिज किया और लिखा था कि दो देशों के बीच में एक छोटी सी रियासत कैसे स्वतंत्र स्टेट बनकर रह सकती है। क्योंकि आजादी का दिन पास आ रहा था, इसलिए रियासतों के नवाबों के लिए किसी एक विकल्प के साथ जाना मजबूरी हो गया था। 

जब भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह ने जाना कि उनके दोस्त और कुछ रियासतें भारत में शामिल हो रही हैं तो साल 1947 में उन्होंने भी भारत में शामिल होने में अपनी सहमति दर्ज कर दी। हालांकि कुछ समय तक हमीदुल्लाह इसी कोशिश में लगे रहे कि भोपाल रियासत एक स्वतंत्र रियासत बनकर उभरे। 

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भोपाल का जुमेराती गेट - फोटो : राजभवन, मध्य प्रदेश
विलय के लिए आंदोलन की शुरुआत
हमीदुल्लाह ने भारत सरकार के साथ वार्तालाप के दौरान भोपाल के एक स्वतंत्र राज्य घोषित करने की वकालत की। वास्तव में मसला यह था कि भोपाल एक मुस्लिम नवाबी स्टेट था लेकिन वहां आबादी हिंदू बहुल थी। जब नवाब के अलग रहने की इच्छा सामने आई तो दिसंबर 1948 में भोपाल में एक जनआंदोलन शुरू हुआ।  

जब नवाब हज के लिए गए हुए थे तो शंकरदयाल शर्मा, भाई रतन कुमार गुप्ता जैसे नेताओं के नेतृत्व में भोपाल के भारत में विलय के लिए 'विलीनीकरण आंदोलन' शुरू हुआ। जैसे-जैसे आंदोलन ने जोर पकड़ा तो वैसे ही नवाबी व्यवस्था ने इसे कुचलने की कोशिश भी की, जिसमें कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए और शर्मा जैसे कुछ नेताओं को कई महीनों के लिए जेल में रहना पड़ा।
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वीपी मेनन से मुलाकात - फोटो : राजभवन, मध्य प्रदेश
आंदोलन के बाद वल्लभभाई पटेल का हस्तक्षेप
भोपाल में आंदोलन इतना तेज भड़का कि नवाबी पुलिस ने आंदोलनकारियों पर गोलियां चलवा दीं और इसमें कई आंदोलनकारी शहीद हो गए। तब सरदार पटेल ने अपने दूत वीपी मेनन को स्थिति को काबू में करने के लिए कहा था। मेनन ने भोपाल के नवाब पर दबाव बनाया और साथ में एक करार किया। जिसके बाद एक जून 1949 तक भोपाल भारत में शामिल हुआ। अब पहली बार भोपाल में औपचारिक रूप से तिरंगा लहराया और नवाबी झंडा उतारा गया। 

भोपाल में पहले कमिश्नरी व्यवस्था लागू हुई
साल 1949 में भोपाल के भारत में विलय होने के बाद भारत के राष्ट्रपति  ने वहां सबसे पहले मुख्य कमिश्नर की नियुक्ति की और शासन संभालने का आदेश दिया। सिंध क्षेत्र से आने वाले शरणार्थियों के लिए भोपाल के पश्चिम के उपनगर बैरागढ़ में रिहाइश की व्यवस्था की गई। साल 1952 में यहां पहली बार चुनाव हुए और तब शंकरदयाल शर्मा पहले मुख्यमंत्री बने। 
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भोपाल की बेगम की पहली कार - फोटो : राजभवन, मध्य प्रदेश
भोपाल का नवाब खानदान
भोपाल के भारत में विलय होने के बाद नवाब हमीदुल्लाह ने अपनी बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान को नवाब की पदवी देनी चाही लेकिन आबिदा ने पाकिस्तान में बसने का फैसला किया। इसके बाद आबिदा वहां विदेश मंत्रालय और विभाग में ऊंचे पद पर भी रहीं। आबिदा के पाकिस्तान जाने के बाद भारत ने उन्हें निष्कासित माना, जिसके बाद नवाब की छोटी बेटी साजिदा सुल्तान ने गद्दी संभाली। 

साल 1971 में देश की तमाम रियासतों का तब खात्मा हो गया जब भारत सरकार ने प्रिवी पर्स की विशेष व्यवस्था खत्म कर दी। गौरतलब है कि मशहूर क्रिकेटर मंसूर अली खान उर्फ नवाब पटौदी इन्हीं साजिदा सुल्तान के बेटे थे और बाद में उन्हें ही भोपाल के नवाब के तौर पर मान्यता मिली थी।
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