नई किडनी के प्रत्यारोपण के इंतजार में बैठे दुनिया के लाखों लोगों की राह अब आसान हो गई है। वर्तमान में बेमेल दानदाता से प्राप्त किडनी यदि रोगी के ‘इम्यून सिस्टम’ से मेल नहीं खाती है तो प्रत्यारोपण नहीं हो पाता है और कई बार किडनी के अभाव में रोगी की मौत तक हो जाती है। लेकिन अब मेडिकल साइंस में ऐसी प्रक्रिया पर शोध हुआ है जिसमें मिलान न होने के बावजूद शरीर के अंग सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं।
‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में प्रकाशित नई शोध रिपोर्ट के मुताबिक डॉक्टरों ने रोगी के ‘इम्यून सिस्टम’ के भीतर ऐसा बदलाव करने में सफलता पाई है जिसमें रोगी का शरीर किसी भी बेमेल दानदाता की किडनी को ग्रहण करने योग्य हो जाता है। डॉक्टरों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। इस प्रक्रिया को शोधकर्ताओं ने ‘डेसेंसिटिजेशन’ का नाम दिया है। यह प्रक्रिया ‘फेफड़ों’ और ‘लिवर’ के प्रत्यारोपण के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया के मेडिसिन स्कूल में किडनी विशेषज्ञ और अमेरिकी नेशनल किडनी फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. जेफरी बर्नस ने बताया कि इस नई प्रक्रिया के बाद कई रोगियों की जिंदगी बच सकती है। शोध टीम के लीडर और प्रत्यारोपण सर्जन डॉ. डॉरी सेजेव ने भी इसकी तस्दीक की और बताया कि अस्पतालों में किडनी फेल्योर के असंख्य मरीजों की डायलिसिस के दौरान अक्सर मौत तक हो जाती है।