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हाईकोर्ट से पहले भारत में थी ईस्ट इंडिया कंपनी की अदालत

Fri, 11 Mar 2016 06:04 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद

सार

  • दोहरी न्याय प्रणाली से भारतीयों के मुकदमों का फैसला 1834 से 1861 तक होता रहा।
  • कंपनी और ब्रिटिश राजा की अदालत के क्षेत्राधिकार भिन्न हुआ करते थे।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
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विस्तार
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देश में उच्च न्यायालयों के गठन से पूर्व ब्रिटिश सरकार और ईस्ट इंडिया कंपनी की दोहरी न्याय प्रणाली से भारतीयों के मुकदमों का फैसला 1834 से 1861 तक होता रहा। कंपनी और ब्रिटिश राजा की अदालत के क्षेत्राधिकार भिन्न हुआ करते थे।
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1858 में कंपनी शासन का अंत हो गया था। इसके बाद न्यायालयों का भी एकीकरण हुआ और न्याय व्यवस्था पूरी तरह से अंग्रेजी हुकूमत वाली भारत सरकार के हाथों में आ गई।

अंग्रेजी शासन ने पूरे देश के लिए एक आपराधिक दंड संहित, दंड प्रक्रिया संहिता और सिविल प्रक्रिया संहिता लागू की, ताकि न्यायिक प्रक्रिया के निष्पादन में एकरूपता रहे। ब्रिटिश संसद द्वारा 1861 में इंडिया हाईकोर्ट एक्ट पास किया गया।
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एक्ट पारित होने से ब्रिटिश सरकार को सर्वोच्च न्यायालयों और सदर अदालतों को समाप्त करने की शक्ति प्राप्त हो गई। इनके स्थान पर प्रत्येक राज्य के एक लिए एक उच्च न्यायालय का गठन किया गया, जिसे अपने क्षेत्राधिकार वाले राज्य के सभी न्यायालयों पर सर्वोच्चता प्राप्त थी। इस एक्ट से ब्रिटिश सरकार को कहीं पर भी उच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति प्राप्त हो गई।

‘द हाईकोर्ट ज्यूडीकेचर एट इलाहाबाद’

चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय - फोटो : file photo
इसके तहत प्रदेश का पहला उच्च न्यायालय 1866 में आगरा में उत्तर पश्चिम जिलों के लिए स्थापित किया गया। सर वाल्टर मार्गन प्रदेश के पहले मुख्य न्यायाधीश बने। उच्च न्यायालय में उस समय पांच न्यायाधीश नियुक्त किए गए।

हाईकोर्ट के गठन के बाद आगरा प्रांत में पिछले 35 वर्षों से कार्य कर रही सदर दीवानी अदालत और सदर निजामत अदालतों को समाप्त कर हाईकोर्ट में समाहित कर दी गई। हाईकोर्ट को कोर्ट ऑफ रिकार्ड के रूप में मान्यता दी गई और इसे अधीनस्थ अदालतों की अपील और नियंत्रण का अधिकार दे दिया गया।

उत्तर पश्चिम प्रांत के उच्च न्यायालय को 1868 में आगरा से इलाहाबाद स्थानांतरित कर दिया गया। 1919 में इसे ‘द हाईकोर्ट ज्यूडीकेचर एट इलाहाबाद’ का नाम दिया गया। भारत के आजाद होने के बाद चीफ कोर्ट अवध और इलाहाबाद हाईकोर्ट का विलय कर इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट में समाहित कर दिया गया तथा अवध कोर्ट को लखनऊ खंडपीठ का दर्जा दे दिया गया।

हाईकोर्ट के डेढ़ सौवें स्थापना दिवस पर जगमगाएगा शहर

चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय - फोटो : file photo
हाईकोर्ट की स्थापना के डेढ़ सौवें समारोह के मौके पर हाईकोर्ट की इमारत और आसपास का इलाका ही नहीं पूरे शहर का हर प्रमुख हिस्सा जगमगाएगा। ऐतिहासिक महत्व की इमारतों को बिजली की झालरों से सजाया जाएगा।

कार्यक्रम में राष्ट्रपति और देश के मुख्य न्यायाधीश के अलावा सुप्रीमकोर्ट के कई जज, तमाम राज्यों के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, केंद्रीय विधि मंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री सहित देश की कई जानमानी हस्तियां शिरकत करेंगी। इसके लिए खास प्रबंध किए जा रहे हैं।

हाईकोर्ट की बिल्डिंग को सजाने संवारने की कवायद महीनों से चल रही है। न्यायकक्षों की साज सज्जा और उनको आधुनिक रूप देने से लेकर हाईकोर्ट की ऐतिहासिक इमारत की साफ-सफाई कर बिजली की झालरों से बेहतरीन रूप से सजाया गया है।

न्यायमार्ग और कानपुर रोड पर भी हाईकोर्ट के आसपास अतिक्रमण हटाकर सफाई कराई जा चुकी है। डीएम संजय कुमार के अनुसार हाईकोर्ट के कार्यक्रम को देखते हुए ऐतिहासिक इमारतों को सजाने के लिए सभी विभागों को पत्र लिखा गया है।
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13 मार्च को है मुख्य समारोह

अदालत
इनमें राजस्व परिषद, पुलिस मुख्यालय, पत्थर गिरजाघर सहित अन्य प्रमुख चर्चों, शिक्षा निदेशालय, खुसरोबाग, कंपनीबाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, सीएमपी डिग्री कालेज, लोकसेवा आयोग, इलाहाबाद बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद जंक्शन, पब्लिक लाइब्रेरी सहित अन्य प्रमुख इमारतें शामिल हैं।

इसके अलावा सिविल लाइंस और आसपास के सभी प्रमुख चौराहों की बिजली से भव्य सजावट की जाएगी। हाईकोर्ट के आसपास के इलाकों में प्रमुख मार्गों से अतिक्रमण हटाने का कार्य पहले ही किया जा चुका है। अब सड़कों की सफाई तथा सजावट का काम होना है।

मुख्य समारोह 13 मार्च रविवार को होना है। इसके मद्देनजर सभी विभागों को 12 मार्च तक कार्य पूरे करने हैं। हाईकोर्ट में भी बचे हुए कार्यों को युद्धस्तर पर कराया जा रहा है।
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