देखते-देखते खुदीराम क्रांति के रास्ते पर आगे निकल गए। 6 दिसंबर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट की घटना में वह शामिल थे। इस दौरान क्रांतिकारियों के खिलाफ कलकत्ता (अब कोलकाता) में किंग्सफर्ड चीफ प्रेजिडेंसी मजिस्ट्रेट के सख्त और क्रूर रवैये को देखते हुए क्रांतिकारियों ने उसकी हत्या का फैसला किया और इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चंद को चुना गया।
दोनों क्रांतिकारियों ने आठ दिन किंग्सफर्ड की दिनचर्या पर नजर रखी। वह शाम को एक क्लब में जाया करते थे। दोनों ने उसके क्लब से निकलने के समय उसपर हमला करने की योजना के अनुरूप 30 अप्रैल, 1908 को एक बग्घी पर बम फेंका, जिसमें किंग्सफर्ड के होने का अनुमान था, लेकिन उस दिन वह कुछ देर बाद क्लब से निकला और उसके धोखे में बग्घी में सवार दो महिलाओं की मौत हो गई।
हालांकि खुदीराम और प्रफुल्ल चंद को यही लगा कि कि किंग्सफर्ड मारा गया है। दोनों करीब 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। बोस पर पुलिस को शक हो गया और पूसा रोड रेलवे स्टेशन (अब यह स्टेशन खुदीराम बोस के नाम पर है) पर उन्हें घेर लिया गया। खुद को घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने स्वयं को गोली मार ली पर खुदीराम पकड़े गए।
खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला और सिर्फ पांच दिन में मुकदमे का फैसला हो गया। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। इतिहासकारों के अनुसार खुदीराम सबसे कम उम्र में फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतकारी थे।
मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम को फांसी पर लटकाया गया। इस मौके पर वहां मौजूद लोगों का कहना था कि खुदीराम बोस एक शेर की तरह निडर होकर फांसी के तख्ते की ओर बढ़े थे।