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केरल हाईकोर्ट ने खींची लकीर: 'अपरिहार्य विवशता से उभरी लाचारी को सेक्स की सहमति नहीं मान सकते', दुष्कर्मी की अपील पर फैसले में कही बड़ी बात

Sat, 20 Nov 2021 06:41 PM IST
सुरेंद्र जोशी पीटीआई, कोच्चि,

सार

पीठ ने आदेश में कहा 'सिर्फ इसलिए कि पीड़िता आरोपी से प्यार करती थी, यह नहीं माना जा सकता कि उसने यौन संबंध बनाने की सहमति दे दी थी।' कोर्ट ने कहा कि सहमति व समर्पण में गहरा अंतर होता है। हर सहमति में समर्पण है, लेकिन हर समर्पण में सहमति नहीं होती है। 
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सांकेतिक फोटो - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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केरल हाईकोर्ट की कोच्चि पीठ ने दुष्कर्म के एक आरोपी की अपील पर फैसले में विवशता, लाचारी, सहमति जैसे शब्दों का गहराई से अर्थ स्पष्ट किया। हाईकोर्ट ने कहा, 'अपरिहार्य विवशता के कारण पैदा हुई लाचारी को सहमति कतई नहीं जाना जा सकता।'  

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जस्टिस आर. नारायण पिशारदी ने अपने आदेश में कहा 'सिर्फ इसलिए कि पीड़िता आरोपी से प्यार करती थी, यह नहीं माना जा सकता कि उसने यौन संबंध बनाने की सहमति दे दी थी।' कोर्ट ने कहा कि सहमति व समर्पण में गहरा अंतर होता है। हर सहमति में समर्पण है, लेकिन हर समर्पण में सहमति नहीं होती है। 

केरल हाईकोर्ट ने 31 अक्तूबर को दिए आदेश में कहा, 'अटल विवशता की स्थिति में पैदा हुई लाचारी को कानून की नजर में सहमति नहीं माना जा सकता है। सिर्फ इस कारण से कि पीड़िता आरोपी से प्यार करती थी, यह नहीं माना जा सकता कि उसने सेक्स के लिए सहमति दी थी।' 
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26 साल के आरोपी श्याम सिवान की अपील पर फैसल के दौरान कोर्ट ने यह बातें कहीं। आरोपी को निचली कोर्ट ने भादंवि की धारा 376 के तहत दुष्कर्म का दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी श्याम सिवान 2013 में एक लड़की, जिससे वह प्यार करता था को लेकर मैसुरू गया था और वहां उसकी सहमति के बगैर उससे सेक्स किया था। इतना ही नहीं आरोपी ने पीड़िता के सोने के आभूषण बेच दिए और उसे गोवा लेकर गया। वहां भी उसके साथ दुष्कर्म किया। 

हाईकोर्ट ने कहा कि 'पीड़िता के सबूत दर्शाते हैं कि आरोपी ने उसे धमकी दी थी कि यदि वह उसके साथ नहीं चली तो वह उसके घर के सामने खुदकुशी कर लेगा'। कोर्ट ने कहा कि यह मान भी लें कि पीड़िता ने आरोपी द्वारा पूर्व में उसके साथ किए गए कृत्यों का विरोध नहीं किया तो भी यह नहीं माना जा सकता कि सेक्स के लिए उसकी सहमति थी। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के बयान से स्पष्ट है कि उसके समक्ष ऐसी अपरिहार्य परिस्थिति पैदा हो गई थी, जिसमें उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। 

केरल हाईकोर्ट ने हालांकि आरोपी को पोक्सो एक्ट के तहत सुनाई गई सजा खारिज कर दी, क्योंकि पीड़िता की उम्र साबित नहीं हो सकी कि अपराध के वक्त वह नाबालिग थी। इसके साथ ही कोर्ट ने साफतौर पर कहा कि आरोपी का कृत्य भादंवि की धारा 366 और 376 (अपहरण व दुष्कर्म)के तहत दंडनीय है। 

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