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दावा: केरल के पूर्व वित्त मंत्री ने कहा- माइक्रो फाइनेंस संस्थानों से कर्ज लेकर जाल में फंस रही हैं महिलाएं

Mon, 20 Dec 2021 01:39 AM IST
Jeet Kumar पीटीआई, भुवनेश्वर

सार

सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) प्रोसेसिंग शुल्क के अलावा महिला स्वयं समूहों से 24 फीसदी ब्याज लेते हैं। जिसके परिणामस्वरूप वे ऋण चुकाने में असमर्थ होते हैं और महिला समूह भुगतान करने के लिए एक कर्ज अपने ऊपर कर लेते हैं।
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सांकेतिक तस्वीर.... - फोटो : pixabay
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विस्तार
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केरल के पूर्व वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि देश भर में कई महिलाएं आर्थिक सशक्तिकरण प्राप्त करने के बजाय विभिन्न माइक्रो फाइनेंस संस्थानों (एमएफआई) से ऋण लेकर इसके जाल में फंस रही हैं। इस बात पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के प्रोफेसर आर राम कुमार ने भी समर्थन किया। इन्होंने भी इस बात को दोहराया।

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दोनों ने यह बात ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक एसोसिएशन (एआईडीडब्ल्यूए) की ओडिशा इकाई द्वारा आयोजित चौथे सुशीला गोपाल मेमोरियल लेक्चरर के मौके पर कही। दोनों वक्ताओं ने आरोप लगाया कि महिला स्वयं सहायता समूहों को दिए गए ऋण पर माइक्रो फाइनेंस संस्थान11.25 प्रतिशत से अधिक ब्याज लेते हैं।

आगे कहा कि कभी-कभी, माइक्रो फाइनेंस संस्थानों की ब्याज दर लगभग 60 फीसदी और मामलों में 100 फीसदी से अधिक भी होती है। एमएफआई प्रोसेसिंग शुल्क के अलावा महिला स्वयं समूहों से 24 फीसदी ब्याज लेते हैं। जिसके परिणामस्वरूप वे ऋण चुकाने में असमर्थ होते हैं और महिला समूह भुगतान करने के लिए एक कर्ज अपने ऊपर कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं और इसे दूर करने में असमर्थ होते हैं, आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की बात तो छोड़ ही दो।
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महिला स्वयं सहायता समूहों का अत्यधिक शोषण किया जा रहा
एआईडीडब्ल्यूए के राष्ट्रीय सचिव तापसी प्रहराज ने आरोप लगाया कि एमएफआई द्वारा महिला स्वयं सहायता समूहों का अत्यधिक शोषण किया जा रहा है और यह संभव है क्योंकि बैंक महिला समूहों को सीधे ऋण देने में संकोच करते हैं। उन्होंने कहा कि बैंकों को एमएफआई को उलझाने के बजाय सीधे महिला समूहों को कर्ज देना चाहिए।

कार्यक्रम में मौजूद सभी वक्ताओं ने अपनी बात रखते हुए कहा कि कोरोना महामारी के कारण नौकरियों, रोजगार और कमाई के साधनों की कमी के कारण महिलाओं की आर्थिक स्थिति और भी बदतर हो गई है। सरकारों द्वारा जो भी प्रावधान किए गए हैं, वे ज्यादातर एमएफआई को लाभान्वित करते हैं, न कि महिलाओं को। इसे लेकर भी सरकार को देखना चाहिए जिससे ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को फायदा हो।

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