राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ द्वारा राज्यसभा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कसीदे पढ़े जाने पर सियासी विवाद गहरा गया है। राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने धनखड़ पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उच्च सदन के सभापति का बयान परंपरा के बिल्कुल उलट है। इस तरह की राय एक सदस्य रख सकता है, मगर सभापति नहीं।
दरअसल, सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने बुधवार को सदन में कहा था कि राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) के प्रमुख के चयन के लिए सरकार ने आरएसएस की संबंद्धता होना अनिवार्य किया था। इस पर उपराष्ट्रपति धनखड़ बीच में टोकते हुए बोले थे कि आरएसएस ऐसा संगठन है, जिसके पास इस राष्ट्र की विकास यात्रा में भाग लेने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। इसमें शामिल लोग निस्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। आरएसएस राष्ट्रीय कल्याण और संस्कृति के लिए योगदान दे रहा है। हर किसी को ऐसे संगठन पर गर्व करना चाहिए।
इस पर नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सपा सांसद के पक्ष में कहा था, 'यदि कोई सदस्य नियम के तहत बोल रहा है और नियम का उल्लंघन नहीं कर रहा है तो उसे बोलने देना चाहिए। सुमन ने जो कहा वह सही था और धनखड़ जो कर रहे थे वह सही नहीं है।'
इस पर उपराष्ट्रपति ने कहा था, 'मैं मानता हूं कि सदस्य नियम का उल्लंघन नहीं कर रहे थे। मगर वह भारत के संविधान को कुचल रहे थे। मैं किसी भी सदस्य को ऐसे संगठन को निशाना बनाने की अनुमति नहीं दूंगा जो राष्ट्र की सेवा कर रहा है। यह संविधान का उल्लंघन है। सांसद सुमन का बयान मौलिक अधिकार और संविधान के खिलाफ है। राष्ट्रीय विकास में योगदान करने का आरएसएस को पूरा अधिकार है। आरएसएस वैश्विक थिंक टैंक है।'
इसके बाद उन्होंने अगला सवाल उठाने को कहा, लेकिन फिर आरएसएस के मुद्दे पर बोलने लगे थे। धनखड़ ने कहा था कि उन्होंने देखा है कि लोग बंटवारे की गतिविधियों में संलग्न हैं। यह देश के विकास को धीमा करने के लिए एक भयावह तंत्र है। देश के भीतर और बाहर हमारी संवैधानिक संस्थाओं को कलंकित करने, धूमिल करने और अपमानित करने के जो प्रयास किए जा रहे हैं, उनकी सभी को निंदा करनी चाहिए। अगर हम ऐसा करने में विफल रहते हैं तो हमारी चुप्पी आने वाले वर्षों तक हमारे कानों में गूंजती रहेगी।
उपराष्ट्रपति ने कहा था, 'मैंने सोच-समझकर, संवैधानिक सार, संवैधानिक भावना, सदन के नियमों को ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाया है कि ऐसी कोई भी टिप्पणी न केवल संविधान के लिए अपमानजनक है, बल्कि राष्ट्र के विकास के लिए भी गलत है।'