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सियासत का सितारा: कमंडल राजनीति का मंडलवादी चेहरा थे कल्याण सिंह

Sun, 22 Aug 2021 02:09 AM IST
Amit Mandal विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली।

सार

कल्याण सिंह अपने कठोर प्रशासन और अक्खड़ स्वभाव के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। उनके कड़क स्वभाव के कई किस्से लखनऊ और उत्तर प्रदेश में पुराने भाजपा नेताओं के पास सुनने को मिल जाएंगे।
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कल्याण सिंह - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कभी भाजपा और संघ परिवार में हिंदुत्व का सबसे बड़ा चेहरा रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को राजनीति की सीढ़िया चढ़ने के लिए पार्टी के भीतर बाहर बहुत जूझना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी आज जिस सोशल इंजीनियरिंग के लिए जानी जाती है, उसके प्रतिपादक भले ही पार्टी महासचिव के.एन.गोविंदाचार्य माने जाते हों, लेकिन उसके व्यवहारिक जनक कल्याण सिंह ही थे। दिलचस्प संयोग है कि कल्याण सिंह अकेले ऐसे नेता थे जो कमंडल की राजनीति से निकल कर न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में भाजपा की मंडलवादी पहचान बने। एक तरह से कल्याण सिंह कमंडल राजनीति का मंडलवादी चेहरा थे।

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1991 में जब उत्तर प्रदेश में भाजपा को बहुमत मिल गया और मुख्यमंत्री बनाए जाने का सवाल आया तो कई नाम सामने आए। पार्टी और संघ का एक प्रभावशाली धड़ा किसी सवर्ण खासकर किसी ब्राह्ण को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था, लेकिन मंडल की राजनीति अपने चरम पर थी और भाजपा कमंडल थाम कर आगे बढ़ रही थी। ऐसे में गोविंदाचार्य की सलाह पर लाल कृष्ण आडवाणी ने कल्याण सिंह का नाम आगे किया और एक भाजपा शासित राज्य में पहली बार किसी पिछड़े वर्ग के नेता को मुख्यमंत्री बनाया गया।तब तक भाजपा सवर्णों (ब्राह्मण बनियों) की पार्टी की पहचान से ऊपर नहीं उठ पाई थी। लेकिन कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा पर पिछड़ा विरोधी होने का आरोप कमजोर पड़ गया और उत्तर प्रदेश में गैर यादव पिछड़ों के एक बड़े हिस्से में भाजपा ने सेंध लगानी शुरु कर दी। जिसकी चरम परिणिति 2017 के विधानसभा चुनावों में हुई जब भाजपा का मत प्रतिशत 17 फीसदी से ब़ढ़कर 39 फीसदी पहुंच गया और उसे अपने सहयोगियों के साथ 325 सीटें हासिल हुईं।

2013 में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया और अमित शाह को गुजरात से दिल्ली लाकर उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बना कर भाजपा के लिए सबसे ज्यादा चुनौती पूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई, तब शाह ने सबसे ज्यादा सलाह मशविरा अगर किसी भाजपा नेता से किया तो वह कल्याण सिंह थे। कल्याण सिंह से ही अमित शाह ने उत्तर प्रदेश की सामाजिक जटिलताओं, जातीय गणित और क्षेत्रीय विविधताओं और विशेषताओं को समझा।एक एक विधानसभा सीट पर बात की और अपनी रणनीति बनाकर उसे अंजाम दिया।नतीजा सबके सामने था।केंद्र में भाजपा सरकार बनते ही कल्याण सिंह को ससम्मान हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया और बाद में उन्हें राजस्थान भेजा गया।
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कल्याण सिंह अपने कठोर प्रशासन और अक्खड़ स्वभाव के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। उनके कड़क स्वभाव के कई किस्से लखनऊ और उत्तर प्रदेश में पुराने भाजपा नेताओं के पास सुनने को मिल जाएंगे। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा तब का है जब कल्याण सिंह जनता पार्टी सरकार में उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री थे। स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद उन्होंने पूरे प्रदेश में सरकारी डाक्टरों के तबादले कर दिए।इससे पूरे स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। सिफारिशों का तांता लग गया लेकिन कल्याण सिंह ने एक भी सिफारिश मानने से इनकार कर दिया। लखनऊ के एक वरिष्ठ सरकारी डाक्टर भाजपा के शिखर नेता अटल बिहारी वाजपेयी जो उन दिनों विदेश मंत्री थे, के बेहद करीबी थे।उन्होंने वाजपेयी से गुहार लगाई।

वाजपेयी ने उन्हें आश्वासन दिया कि लखनऊ आकर कल्याण सिंह से बात करेंगे। वाजपेयी लखनऊ आए और कल्याण सिंह उनके स्वागत के लिए हवाई अड्डे पहुंचे। उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे भाजपा के एक पुराने नेता ने मुझे लखनऊ में बताया था कि जैसे ही वाजपेयी विमान से उतरे और अपने स्वागत के लिए खड़े नेताओं और अधिकारियों की तरफ बढ़ चले।जैसे ही वाजपेयी कल्याण सिंह के नज़दीक पहुंचे कल्याण ने उनका स्वागत करते हुए बेबाकी से कहा अटल जी आपका हर आदेश मानूंगा लेकिन किसी डाक्टर का तबादला रोकने या बदलने की सिफारिश मत कीजिएगा। वाजपेयी ने अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ उन्हें देखा और हंसते हुए आगे बढ़ गए।

भाजपा की राजनीति में कल्याण सिंह को लाल कृष्ण आडवाणी के बेहद करीबी माना जाता था।अपने पहले कार्यकाल में कल्याण सिंह अपराध मुक्त उत्तर प्रदेश के अपने नारे, नकल अध्यादेश जैसे कड़े फैसलों के लिए जाने गए। हालांकि उनकी सरकार छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरने के बाद चली गई, लेकिन उस घटना से कल्याण सिंह पूरे देश में भाजपा और संघ के हिंदुत्व का सबसे बड़ा चेहरा बन गए। एक बार तो उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की बात भी चली, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनके टकराव ने उनकी राजनीति की दिशा बदल दी।

भाजपा छोड़कर उन्होंने अलग पार्टी बनाई। मुलायम सिंह यादव से दोस्ती की और उत्तर प्रदेश से भाजपा का सफाया हो गया।2004 में प्रमोद महाजन उन्हें चुनाव से पहले भाजपा में लेकर आए और 2007 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा भी घोषित किया। लेकिन पार्टी हार गई।2009 में कल्याण की फिर भाजपा नेतृत्व से बिगड़ गई और वह ऐन चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव के साथ चले गए। नतीजा भाजपा लोकसभा चुनावों में दहाई का अंक भी नहीं छू सकी।लेकिन बाद में उन्हें मनाकर फिर भाजपा में ले आया गया।

जिस तरह इन दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर विपक्ष ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगा रहा है,उसी तरह जब कल्याण सिंह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे, तो भाजपा के ही सवर्ण नेता उन पर सवर्ण विरोधी होने का आरोप लगाते हुए अक्सर केंद्रीय नेतृत्व के पास उनकी शिकायत लेकर आया करते थे।इसी दबाव में कल्याण की नाराजगी की परवाह न करके उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर राम प्रकाश गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन कल्याण की नाराजगी की भाजपा को भारी कीमत चुकानी पड़ी थी, जिसकी भरपाई 2014 और 2017 में हो पाई। 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चौधरी चरण सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह ऐसे नेता थे जिन्हें उत्तर प्रदेश के एक एक जिले और एक-एक विधानसभा या लोकसभा सीट का पूरा जातीय गणित, सियासी समीकरण, प्रभावशाली नेताओं के पूरे ब्यौरे की जानकारी रहती थी।अब पार्टियां जो काम सर्वे एजेंसियों और कंप्यूटर डेटा की मदद से करती हैं, कल्याण सिंह जैसे नेता वो काम अपनी उंगलियों पर करते थे।कल्याण सिंह के निधन से उस श्रेणी और कद के नेताओं की एक और कड़ी टूट गई। 

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