पंजाब, सांबा और हीरानगर के रास्ते घुसपैठ
सैन्य सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस इलाके में आतंकवादियों की अनुमानित तादाद 50-55 के आसपास है। जिनमें से ज्यादातर पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के हैं। उन्होंने संदेह जताया है कि ये सभी आतंकी पंजाब, सांबा और हीरानगर के रास्ते घुसपैठ करके कठुआ पहुंचे हैं। वहीं, उनका इरादा कठुआ से मछेडी और बानी के रास्ते बसंतगढ़ फिर ठाठरी से कश्मीर पहुंचने का है। सूत्रों ने बताया कि जम्मू का इलाका नदियों से घिरा हुआ है। पाकिस्तान सीमा पर कई नाले हैं, जो मानसून के दौरान उफान पर रहते हैं। उस दौरान की डिफेंस लाइन यहां कमजोर हो जाती है, और एक गैप बन जाता है। जिससे आतंकियों के लिए घुसपैठ करना आसान हो जाता है। इसके अलावा, जम्मू डिविजन में पहाड़ी इलाके होने से उनके लिए छिपने की काफी जगह है। वहीं घने जंगल होने से यहां ड्रोन ऑपरेशन में दिक्कत आती है, जिससे उन्हें ट्रैक करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।
हथियार के साथ नहीं करते घुसपैठ!
सैन्य सूत्रों का कहना है कि इस बार आतंकियों ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है, जिसके चलते उन्हें ट्रैक करने में दिक्कत हो रही है। ये आतंकवादी अमेरिकी एम-4 राइफलों, नाइट विजन साइट्स और टेलीस्कोपिक लेंसों और अल्ट्रा सेट जैसे चीनी एन्क्रिप्टेड रेडियो सेटों से लैस हैं। सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान ड्रोन के जरिए ड्रग्स और हथियार भेज रहा है। बीएसएफ ने कठुआ में ड्रोन से गिराई गईं एम-4 कार्बाइन समेत हथियार पकड़े थे, लेकिन एजेंसियां इस बड़ी साजिश को समझने में विफल रहीं। सभी आतंकवादी हथियार, गोला-बारूद और अन्य युद्ध सामग्री के साथ घुसपैठ नहीं करते हैं। हथियार ड्रोन से पहुंचते हैं। जम्मू पहुंचने के बाद इन्हें हथियार सौंप दिये जाते हैं। ये हथियार पंजाब सीमा में ड्रोन से गिराए जा रहे हैं। सैन्य सूत्रों ने बताया कि हथियार गिराने के लिए मैदानी इलाकों का इस्तेमाल किया जाता है, अगर जम्मू के पहाड़ी इलाकों में गिराएंगे, तो उनके खाई में गिरने का खतरा रहता है। इसके लिए वे मैदानी इलाकों को चुनते हैं और पंजाब की सीमा जम्मू से सटी है, इसका वे फायदा उठाते हैं।
रैकी और रिसर्च करने के बाद करते हैं हमला
सूत्रों का कहना है कि पहले आतंकी 15-20 के गुटों में घुसपैठ करते थे, लेकिन अब 3-5 के छोटे-छोटे गुटों में सीमा पार कर रहे हैं, ताकि सुरक्षाबलों की नजरों से बच सकें। पहले आतंकियों से पेट्रोलिंग के दौरान मुठभेड़ होती थी, या वे सीधे ही हमला करते थे। लेकिन अब वे पहले रिसर्च या रैकी कर रहे हैं। इलाके और सुरक्षा बलों की तैनाती के पैटर्न को समझ रहे हैं। उनकी हरकतों पर नजर रखते हैं। एंबुश अटैक की जगह चुनते हैं और उसके बाद भागने और छुपने का रास्ता उन्हें अच्छे से पता होता है। आतंकी हमला करने के बाद आंखों से ओझल हो जाना, ये उनकी नई रणनीति है। इसके लिए घने जगलों और पहाड़ी इलाकों का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। सूत्रों ने कहा कि ऐसा लगता है कि आतंकवादी शुरुआत में अपना समय पहाड़ों और घने जंगलों में बिताते हैं और सुरक्षा बलों की तैनाती वाली जगहों के नक्शे बनाते हैं।
वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर करते हैं शेयर
हाइब्रिड वारफेयर के तहत आतंकवादी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। पहले आतंकवादी घात लगा कर हमला करते थे और भाग जाते थे। लेकिन अब वे बॉडी कैमरा और गोप्रो के साथ आ रहे हैं। हमला करने के बाद वे वीडियो बनाते हैं। कठुआ में हुए हमले में उन्होंने वेस्टर्न कमांड के तहत आने वाली 9वीं कोर के दो वाहनों के एक सेना काफिले को निशाना बनाया था, सूत्रों ने बताया कि आतंकवादियों की दो टीमें थीं। डोडा अटैक में आतंकियों के पास इतना वक्त था कि उन्होंने पहले वीडियो बनाया और फिर सोशल मीडिया पर जारी कर दिया। इससे पहले भी 04 मई, 2024 को पुंछ में जब एयरफोर्स के वाहनों के काफिले पर आतंकी हमला किया था, जिसमें 5 जवान घायल हो गए थे। आतंकियों ने उस हमले की भी फोटो जारी की थीं। हमलों के बाद पाक स्थित आतंकी संगठनों के मुखौटे संगठनों ने तुरंत सोशल मीडिया पर अपना स्टेटमेंट भी जारी कर दिया था।
टेलिस्कोप लेंस से करते हैं शार्प शूटिंग
कठुआ में हुए हमले में उन्होंने वेस्टर्न कमांड के तहत आने वाली 9वीं कोर के दो वाहनों के एक सेना काफिले को निशाना बनाया था, सूत्रों ने बताया कि आतंकवादियों की दो टीमें थीं। आतंकियों की एक टीम ने सामने वाले वाहन पर करीब 100 मीटर की दूरी से गोली चलाई, जबकि दूसरी टीम ने दूसरे ट्रक पर करीब 200 मीटर की दूरी से गोली चलाई। उन्होंने ड्राइवर के बगल में बैठे जवान को एम-4 कार्बाइन से सिर में गोली मारकर घायल कर दिया। सूत्रों का कहना है कि इस बार आतंकियों की नई रणनीति है कि उनका ट्रिगर पर कंट्रोल पर है। वे शार्पशूटर हैं और गोलियां बेवजह बरबाद नहीं करते। वे टेलिस्कोप लेंस का इस्तेमाल करते हैं। एक मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने नाइट विजन से लैस M-4 कार्बाइन के हेड पर एक पावर बैंक लगा था, जिसे टेप से जोड़ा गया था, ताकि जरूरत पड़ने पर उसे लगातार चार्ज किया जा सके। नाइट विजन से आतंकी अंधेरे में भी सटीक निशाना लगा रहे हैं। इस तरह की कार्बाइन अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में इस्तेमाल करते थे।
फिदायीन नहीं, लंबे समय तक लड़ने का है प्लान
हाल ही में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के कोटली इलाके की कुछ खुफिया तस्वीरें सामने आई हैं। इनमें साफ दिखाई दे रहा है कि पाकिस्तानी सेना पठानी सूट पहने आतंकवादियों को अग्रिम चौकियों तक ले जा रही है और उन्हें घुसपैठ करवा रही है। आतंकवादी हथियारों से लैस हैं और तस्वीरों में पाकिस्तानी एसएसजी कमांडो को आतंकवादियों को घुसपैठ कराते देखा जा सकता है। सूत्रों का कहना है कि न आतंकियों को पाकिस्तान की स्पेशल सर्विस ग्रुप ट्रेनिंग दे रही है। घुसपैठियों में एसएसजी के रिटायर्ड आतंकी भी शामिल हो सकते हैं। राजौरी-पुंछ क्षेत्र में लगभग 20-25 आतंकवादी सक्रिय हैं, जबकि डोडा-भद्रवाह क्षेत्र में लगभग 15-20 आतंकवादी सक्रिय हैं। सूत्र बताते हैं कि आतंकवादी जिस तरह से लंबे समय तक मोर्चा ले रहे हैं, उससे लगता है कि सभी आतंकवादी अच्छी तरह से प्रशिक्षित हैं और उन्हें लड़ाई का अनुभव है। उनका सोचना है कि आतंकवादियों ने अफगानिस्तान में अनुभव प्राप्त किया होगा, जहां जैश-ए-मोहम्मद के कैडर तालिबान के साथ लड़े थे। सूत्रों का कहना है कि ये आतंकवादी फिदायीन (मृत्यु मिशन पर) नहीं हैं, बल्कि वे लंबे समय तक रुकने के लिए तैयार होकर आए हैं।
रणनीतिक तरीके से हटते हैं पीछे
सैन्य सूत्रों का कहना है कि आतंकियों को इलाके और तैनाती के पैटर्न की अच्छी समझ है। वे फर्जी खुफिया अलर्ट जारी करते हैं और वहां तैनात यूनिट को अपने जाल में फंसाते हैं, फिर घात लगाकर हमला करते हैं। इसके बाद से रणनीतिक तरीके से पीछे हटते हैं और दूसरी यूनिट को निशाना बनाते हैं। आतंकवादी अभी तक 16 आरआर (राष्ट्रीय राइफल्स) पर दो बार हमला कर चुके हैं, उसके बाद वे 9 पैरा स्पेशल फोर्स को निशाना बना चुके हैं। इसके अलावा 11 राज राइफल्स, 49 आरआर, 63 आरआर, 48 आरआर, 34 आरआर, 19 आरआर, 22 गढ़वाल राइफ़ल्स, 4 आरआर, 10 आरआर को निशाना बना चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि वे यूनिट की कमजोरी पर निगाह रखते हैं, उस पर ट्रैक रखते हैं और यहां तक कि हमले का वक्त और समय भी वे खुद तय कर रहे हैं।
इस बार कम्युनिकेशन नेटवर्क को तोड़ नहीं पा रहीं सुरक्षा एजेंसियां
सूत्रों ने बताया कि आतंकी इस बार आम वॉकी टॉकी या सेलफोन का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। बल्कि वे कम्युनिकेशन के लिए चीन के बने अल्ट्रासेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो इन्क्रिप्टेड है और उसका तोड़ अभी सिक्योरिटी एजेंसियों के पास नहीं है। इसकी खूबी यह है कि कम्युनिकेशन सिस्टम ऑन होने पर न कोई सिग्नलों का पता चलता है, बल्कि लोकेशन भी पता नहीं चलती। पहले सिक्योरिटी एजेंसियां आतंकवादियों के कम्युनिकेशन को डीकोड कर उनके मंसूबों का पता लगा लेती थीं। लेकिन अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। सैन्य सूत्रों ने बताया कि अल्ट्रासेट सैटेलाइट से कनेक्टेड है। इससे मैसेजिंग भी की जा सकती है। हर सेट का अलग कोड होता है। अगर आतंकियों के दो ग्रुप हैं और दोनों के पास इस तरह के सेट हैं तब भी एक ग्रुप दूसरे ग्रुप से कॉन्टैक्ट नहीं कर सकता। बिना कोड के अल्ट्रासेट सिस्टम बेकार है। वहीं आतंकी एक और तरीका कम्यूनिकेशन के लिए यूज कर रहे हैं। वे अपने आकाओं से कॉन्टैक्ट के लिए जहां अल्ट्रासेट का यूज करते हैं, तो वहीं वे पनाहगारों के मोबाइल सेट का इस्तेमाल करते हैं और दूसरे ओजीडब्ल्यू से संपर्क साधते हैं। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियां हर मोबाइल को ट्रैक पर नहीं रख सकती, जिसका आतंकी फायदा उठाते हैं। सूत्रों का कहना है कि आतंकवादी सैमसंग फोन और आईकॉम रेडियो सेट के माध्यम से वाई एसएमएस का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। सूत्रों ने यह भी बताया कि पीओके में एक ऐसा नेटवर्क है, जो इन आतंकियों की मदद करता है। जम्मू-कश्मीर सीमा पर कई ऐसे लोग हैं, जिनकी पीओके में रिश्तेदारियां हैं। वे लोग आतंकियों के लिए ओजीडब्ल्यू का नेटवर्क तैयार करते हैं।
नेविगेशन के लिए अल्पाइन नेविगेशन एप का इस्तेमाल
आतंकवादी हमले के बाद भागने के लिए अल्पाइन नेविगेशन एप का इस्तेमाल कर रहे हैं। जांच में शामिल सैन्य सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है। यह ऑपलाइन नेविगेशन एप है। आतंकवादी भागने के लिए और अपने ठिकाने पर सुरक्षित पहुंचने के लिए इसका यूज कर रहे हैं। गोरिल्ला युद्ध में प्रशिक्षित आतंकवादी एजेंसियों की ट्रैकिंग से बचने के लिए इस ऑफलाइन एप का यूज कर रहे हैं। यह इस्तेमाल के बाद अपना कोई डिजिटल निशान नहीं छोड़ती है। पिछले चार वर्षों में, ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें एजेंसियों ने अल्पाइन एप और आतंकवादियों ने कम्यूनिकेशन के लिए ऑफलाइन मैसेंजर एप का इस्तेमाल किया।
नार्को टेरेरिज्म से मिल रहा पैसा
सैन्य सूत्रों ने बताया कि जितने भी आतंकवादी मुठभेड़ में मारे गए हैं, उनके पास से काफी रकम बरामद हुई है। पहले जब विदेशी आतंकवादी (एफटी) सीमापार से घुसपैठ करते थे, तो उन्हें केवल जिंदा रहने लायक ही पैसा मिलता था। पंजाब बॉर्डर पर ड्रोन से आ रही ड्रग्स की खेप नार्को टेरेरिज्म का ही हिस्सा है। ड्रग्स की यह साजिश सीमा पार पाकिस्तान में बैठे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन के साथ खालिस्तानी आतंकी संगठनों के गुर्गे अंजाम दे रहे हैं। ड्रग्स का यह पैसा आतंकियों को पहुंचाया जाता है, जहां वे इसे ओजीडब्ल्यू को देने के लिए इस्तेमाल करते हैं। नार्को टेरेरिज्म सीधे-सीधे जम्मू-कश्मीर में पनप रहे आतंकवाद से जुड़ा है। कठुआ एनकाउंटर में मुठभेड़ में मारे गए आतंकी के पास से बड़ी मात्रा में नकदी मिली थी। 19 जून को रियासी हमले के बाद एक ओजीडब्ल्यू हकीमदीन ने पुलिस पूछताछ में बताया था कि तीनों आतंकवादियों ने उसके घर में शरण ली थी और बदले में उसे 6,000 रुपये दिए थे। वह उनके गाइड के रूप में काम करता था और उसने उन्हें जंगलों के रास्ते हमले की जगह तक पहुंचाने में आतंकियों की मदद की थी। वहीं एक ओजीडब्ल्यू ने तो आतंकियों के लिए पहाड़ में एक छुपने का ठिकाना बनाया था, जिसके लिए उसे एक लाख रुपये आतंकियों ने दिए थे।