भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एस सोमनाथ एक ऐसा नाम हैं, जिनका नाम आज दुनियाभर में जाना जाता है। उन्होंने चंद्रमा पर फतह हासिल करने में देश की मदद की। अब सूरज पर भी ऐसा ही करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, अगर इसरो अध्यक्ष की शुरुआती समय की बात करें तो एक पुरानी साइकिल और एक मामूली से आवास से हुई, जिनका इस्तेमाल वह कॉलेज में रहने के दौरान परिवहन और छात्रावास के खर्चों में कटौती के लिए करते थे।
इस भाषा में लिखी गई आत्मकथा
मलयालम में ‘निलावु कुदिचा सिम्हांगल’ शीर्षक से लिखी गई आत्मकथा प्रेरणा की एक कहानी है। यह कठिनाइयों का सामना करने में कड़ी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति पर केंद्रित है और सोमनाथ के नेतृत्व वाले चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3’ की भारी सफलता से प्रेरित है, जिसने भारत को राष्ट्रों की एक विशेष श्रेणी में ला खड़ा किया।
अगले महीने बाजार में होगी उपलब्ध
यह किताब एक गरीब गांव के युवा की घटनापूर्ण गाथा, इसरो के माध्यम से विकास, वर्तमान प्रतिष्ठित पद तक पहुंचने और चंद्रयान-3 प्रक्षेपण तक की उनकी यात्रा की कहानी है। सोमनाथ ने कहा, ‘मैं अपनी आत्मकथा को एक प्रेरक आत्मकथा के बजाय प्रेरक कहानी कहना चाहूंगा।’
उन्होंने कहा, ‘‘यह वास्तव में गांव के एक साधारण युवा की कहानी है, जो यह भी नहीं जानता था कि उसे इंजीनियरिंग में दाखिला लेना चाहिए या बीएससी में। यह उसकी दुविधाओं, जीवन में लिए गए सही फैसलों और भारत जैसे देश में उसे मिले अवसरों के बारे में है।’
इसरो अध्यक्ष ने कहा, ‘इस पुस्तक का उद्देश्य मेरी जीवन की कहानी को पढ़ाना नहीं है। इसका एकमात्र उद्देश्य लोगों को जीवन में प्रतिकूलताओं से जूझते हुए अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करना है।’
कई युवा प्रतिभाशाली होते तो हैं...
सोमनाथ ने अपनी साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि को याद किया, लेकिन कहा कि देश ने उनके सामने अपार अवसर खोले और आत्मकथा इसे उजागर करने का एक प्रयास है। उन्होंने कहा कि चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता थी, जिसने एक किताब लाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि कई युवा प्रतिभाशाली तो होते हैं, लेकिन उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है। उनके अनुसार, किताब का उद्देश्य यह बताना है कि जीवन में मिलने वाले अवसरों का उपयोग करना बेहद जरूरी है, चाहे हालात कुछ भी हों।