दुन्या मिखाइल, मशहूर इराकी-अमेरिकी कवयित्री (फाइल फोटो)
जब मैं छोटी-सी बच्ची थी, तो एक दिन मेरे शिक्षक ने पूछा कि मैं क्या बनना चाहती हूं, तो मैंने जवाब दिया कि मैं नबी बनना चाहती हूं। मुझे लगा था कि एक बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक लिखकर मैं ऐसा कर सकती हूं। वैसे भी मैं कविताएं लिखने के प्रति दिवानी थी। मैंने एक कविता लिखकर अपने एक दोस्त को भी उसके जन्मदिन पर उपहार में दी। बाद में मैं नबी बनने के बारे में भूल ही गई।
जब मैंने बगदाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएट किया, तो मुझे बगदाद ऑब्जर्वर में पत्रकार के रूप में नौकरी मिल गई। मेरा यह नहीं कहना है कि हर कवि को पत्रकारिता करनी ही चाहिए, लेकिन पत्रकारिता के गुणों का बेहतर इस्तेमाल कविता में किया जा सकता है। पत्रकारों को पता होता है कि खबरों को कहां से शुरू करें और कहां खत्म करें। वे अपनी खबरों के पीछे चुपचाप खड़े रहते हैं और मुझे लगता है कि यह गुण साहित्य में भी अच्छी तरह से काम करेगा। मैंने जीवन में पहली कहानी अपनी दादी के मुंह से सुनी थी।
हमारे घर में किताबें नहीं थीं, लेकिन वह लोककथाएं सुनाया करती थीं, जो मुझे रोमांचित करती थीं। मैं उन कहानियों को अपनी नोटबुक में लिख लेती थी। मेरी दादी मुझे उन कहानियों के पीछे की नैतिक सीख के बारे में बताती थीं। इन चीजों ने साहित्य के प्रति मेरे मन में दिलचस्पी पैदा की। जब मैं बाईस वर्ष की थी, तब मेरी दादी और मेरे अब्बा, दोनों का देहांत हो गया। मैंने इराक में सिर्फ युद्ध ही नहीं देखा, बल्कि चाय के साथ कविता पर बातचीत का गवाह भी रही हूं। वहां बारूद और रजकी (एक प्रकार का फूल, जो सिर्फ इराक में ही होता है), की गंध घुली-मिली थी। मैं खुद को कवयित्री मानती हूं, क्योंकि कविता ने ही मेरी जान बचाई।
मशहूर इराकी-अमेरिकी कवयित्री