फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दलितों के बड़े नेता बनने की महत्वकांक्षा उदित राज पर पड़ गया भारी, जल्दी लेंगे बड़ा फैसला

Tue, 23 Apr 2019 11:05 PM IST
Abhishek Singh डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
उदित राज - फोटो : ANI
विज्ञापन

दिल्ली की उत्तर-पश्चिम सीट से वर्तमान सांसद उदित राज की बड़े दलित नेता के रुप में उभरने की महत्त्वाकांक्षा उन पर भारी पड़ी। कई बार दलित मुद्दों पर मुखर रहने के कारण भाजपा के लिए उन्होंने मुश्किल खड़ी की थी। संभवतः यही कारण रहा कि भाजपा ने आज नामांकन के अंतिम दिन उनका टिकट काटकर सूफी गायक हंसराज हंस को थमा दिया। टिकट कटने से नाराज उदित राज ने तुरंत ही अपने नाम के पहले से चौकीदार शब्द हटा दिया। लेकिन फिर बाद उन्होंने फिर चौकीदार उनके नाम से पहले लग गया।

विज्ञापन


उन्होंने पहले घोषणा की कि वे जल्द ही पार्टी में अपने बने रहने पर कोई फैसला ले सकते हैं। लेकिन अब इसके लिए उन्होंने पहले अपने समाज के लोगों से बातचीत करने की बात कही है। हालांकि वे इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। वहीं, भाजपा सूत्रों के मुताबिक, कल से ही उनके बागी तेवर देखकर पार्टी के शीर्ष नेताओं ने उन्हें धैर्य रखने की बात कही है। उन्हें जल्दी ही उनके कद के मुताबिक पार्टी में कोई बड़ा पद देने की बात भी कही गई है।

मायावती का जमकर करते थे विरोध

उदित राज खुद को एक बड़े दलित नेता के रुप में स्थापित करने का ख्वाब देख रहे हैं। इसके लिए उन्होंने हमेशा अपनी अलग लाइन रखी। दलित मुद्दों पर हमेशा बहुत मुखर रुख अपनाया। उन्होंने उत्तर भारत में दलितों की बड़ी नेता मायावती को हमेशा दलित विरोधी और दौलत की बेटी बताया। उदित राज का कहना था कि मायावती ने हमेशा दलितों के नाम पर  राजनीति की, लेकिन सत्ता में आने के बाद खुद के लिए पैसे इकट्ठे किए लेकिन समाज के हित के लिए कोई काम नहीं किया। अपना संगठन खड़ा कर उन्होंने दलितों को लामबंद करने की  भी कोशिश की। लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि उनके नाम इकलौती राजनैतिक सफलता मोदी लहर में सांसद बनना ही है। इसके पहले वे कभी चुनाव नहीं जीत पाए।   
विज्ञापन


ये बातें गईं खिलाफ

दरअसल, उदित राज ने सरकार बनने के बाद कई बार इस तरह का रुख अपनाया था जिससे पार्टी को परेशानी हुई थी। गत दो अप्रैल को हुए बड़े भारत बंद का भी उन्होंने समर्थन किया था जबकि यह बंद दलित संगठनों ने भाजपा के खिलाफ बुलाया था। इसी प्रकार रोस्टर सिस्टम पर भी उन्होंने भाजपा से अलग रुख अपनाया था। नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों को भी उन्होंने जनहित के खिलाफ बताया। यही कारण है कि वे कहीं न कहीं पार्टी की नकारात्मक सूची में आ गए थे।   

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें