सिंधु जल समझौता (सांकेतिक तस्वीर)
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सिंधु जल समझौता पर दोबारा विचार-विमर्श किए जाने की जरूरत है क्योंकि यह समझौता तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार हुई थी। संसदीय समिति ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान, पर्यावरणीय प्रभाव जैसे विषय इसमें शामिल नहीं हैं। लोकसभा में पेश डॉक्टर संजय जायसवाल की अध्यक्षता वाली जल संसाधन समिति की स्थायी समिति की रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार समिति ने अपने आकलन में पाया है कि सिंधु जल संधि समय की कसौटी पर खरी उतरी, फिर भी उसका यह आकलन है कि संधि को वर्ष 1960 के समझौते के समय तत्कालीन जानकारी और प्रौद्योगिकी के अनुसार बनाया गया था। इसलिए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हो रहे बदलावों के चलते इस पर पुनर्विचार होना चाहिए।
इसमें कहा गया है कि उस समय दोनों देशों का जोर बांधों, नहरों के निर्माण, विद्युत ऊर्जा के उत्पादन के माध्यम से नदी प्रबंधन तथा पानी के उपयोग तक ही सीमित था। वर्तमान समय में प्रासंगिकता बदल गई है। समिति ने यह भी कहा कि भारत को सिंधु जल संधि के अनुसार पश्चिम की नदियों पर 36 लाख एकड़ फीट तक पानी का भंडारण करने का अधिकार है, लेकिन भारत सरकार द्वारा अब तो कोई भंडारण क्षमता विकसित नहीं की गई है।
इसमें कहा गया पश्चिम नदी विद्युत परियोजनाओं से लगभग 20, हजार मेगावाट के अनुमानित विद्युत उत्पादन क्षमता हासिल की जा सकती है, लेकिन अभी तक केवल 3,482 मेगावाट क्षमता का निर्माण ही हो सका है।