दरअसल इससे भी बड़ा सवाल यह है कि तालिबान आतंकी संगठन के तौर पर घोषित है। ऐसे में आतंकी संगठन का सत्ता में आना और फिर उसके साथ समझौता कर ठप हुईं योजनाओं को चलाना निश्चित तौर पर बहुत जटिल प्रक्रिया न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के उन सभी देशों के लिए है तालिबान को आतंकी संगठन की श्रेणी में रखते हैं।
विदेशी मामलों के जानकार प्रोफेसर शिरीन कुरील कहते हैं कि जब तक अफगानिस्तान में सत्ता संवैधानिक तरीकों से चुनाव के माध्यम से नहीं चुनकर आएगी तब तक दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले लिए मुल्कों के लिए बड़ी चुनौतियां आनी तय हैं। वह कहते हैं भारत के लिए पूरे अफगानिस्तान में तालिबानियों का कब्जा होना न सिर्फ व्यापारिक दृष्टिकोण से बल्कि रणनीतिक दृष्टिकोण से भी बेहद चिंताजनक है। प्रोफेसर कुरील कहते हैं कि संवैधानिक तरीके से बनी सरकार के साथ कोई भी व्यवसायिक डील या उस देश को स्थापित करने वाले समझौते करना किसी भी मुल्क के लिए दिक्कत भरा नहीं होता है।
ऐसे में अब भारत के पास अपने 23000 करोड़ों रुपये के फंसे हुए प्रोजेक्ट पर कोई भी बात आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले इस बात का इंतजार करना होगा कि अफगानिस्तान में चुनी हुई सरकार बने। अगर ऐसा संभव नहीं होता है तो भारत ने अभी तक जितना भी निवेश किया है उसका कोई भी रिटर्न फिलहाल मिलता हुआ नजर नहीं आ रहा है। प्रोफेसर कुरील कहते हैं यह रिटर्न जरूरी नहीं कि वित्तीय व्यवस्था के तहत ही हो। यह रिटर्न रणनीतिक मामलों में कई और तरीकों से भी मिलता है। अब जब सत्ता तालिबान के पास है तो एक तरीके से गेंद उनके पाले में ही है कि वह अपनी सत्ता को किस तरीके से लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलते हैं और पूरी दुनिया उनको किस तरीके से अपनाती है।
ये है भारत का अफगानिस्तान में निवेश
अफगानिस्तान के हेरात राज्य में सलमा बांध का निर्माण कराया जा रहा है। 42 मेगावाट की क्षमता वाला यह हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट है। अफगानिस्तान में ही बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन की ओर से 200 किलोमीटर से ज्यादा लंबा जरंज देलारम राजमार्ग का निर्माण भी कराया जा रहा है। विदेशी मामलों के जानकार बताते हैं यह प्रोजेक्ट ईरान बॉर्डर के करीब से गुजरता है। भारत इस प्रोजेक्ट को 147 मिलियन डॉलर से तैयार करवा रहा है। भारत ने तकरीबन 92 मिलियन डॉलर की लागत से अफगानिस्तान की संसद का निर्माण कराया था। यूपीए सरकार में भारत सरकार और आधार कार्ड डेवलपमेंट नेटवर्क के तहत एक समझौता हुआ, जिसमें अफगानिस्तान के अस्तित्व को बरकरार रखने वाले स्तोर पैलेस का जीर्णोद्धार कराया। इसके अलावा भारत ने अफगानिस्तान में पुल ए खुमरी में 220 केवीए का पावर इंफ्रा प्रोजेक्ट शुरू किया गया।
अफगानिस्तान में बेहतर टेलीकम्युनिकेशन व्यवस्था के लिए भारत ने निवेश किया। हेल्थ एंड स्ट्रक्चर के लिए भी भारत बीते कई दशकों से अफगानिस्तान में मदद करता आ रहा है। भारत ने अफगानिस्तान के बदरखाशान, कंधार, खोस्त, कुनार और नूरिस्तान जैसे बहुत से शहरों में अस्पतालों का निर्माण कराया। ट्रांसपोर्टेशन के लिए तकरीबन 600 से ज्यादा छोटी बड़ी बसें और 300 से ज्यादा सैन्य वाहन समेत सैकड़ों एम्बुलेंस भी अफगानिस्तान को मुहैया कराए। अफगानिस्तान को मजबूत करने के लिए भारत की ओर से ऐसे बहुत सारे प्रोजेक्ट न सिर्फ चल रहे हैं बल्कि आने वाले सालों में पाइप लाइन में भी थे।