भारत ने लागू कर दी है अपनी स्पेस पॉलिसी
बकौल डॉ. किरण कुमार, चंद्रयान 3 की कामयाबी महज विज्ञान, तकनीकी या दूसरे क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आर्थिक तौर पर भी देश को नए आयामों तक ले जाएगी। 'स्पेस इकॉनोमी' के 400 बिलियन डॉलर के कारोबार में भारत का कंट्रीब्यूशन 20 प्रतिशत तक ले जाना होगा। संभव है कि भारत, अंतरिक्ष के क्षेत्र में अमेरिका, रूस और इजरायल जैसे देशों के साथ नए समझौते करे। इसरो के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर डॉ. एस वैंक्टेशवर शर्मा ने बताया कि भारत ने अपनी स्पेस पॉलिसी लागू कर दी है। उसमें लचीलापन रखा गया है। इसका यही मकसद है कि निजी क्षेत्र, इसरो के लंबी अवधि के प्रोजेक्ट में शामिल हो। मौजूदा समय में कई प्रोजेक्ट निजी क्षेत्र से ही पूरे कराए जा रहे हैं। काम का तर्क संगत विभाजन किया गया है। निजी कंपनियों के अलावा कुछ संस्थान भी इसरो के साथ आगे आ रहे हैं। चूंकि अब अंतरिक्ष विज्ञान को केवल सरकार के बलबूते आगे ले जाना संभव नहीं है, इसलिए इसमें कई संस्थान शामिल किए जा रहे हैं। अंतरिक्ष कार्यक्रम का कमर्शियलाइजेशन हो रहा है। भले ही वैज्ञानिक गतिविधियां और खोज इसरो ही करेगा, लेकिन बाकी तैयारी में प्राइवेट क्षेत्र की मदद ली जा सकती है। पब्लिक सर्विस के लिए सेटेलाइट जैसे मौसम की जानकारी, भूकंप का अलर्ट आदि को लेकर निजी क्षेत्र भी उत्साहित है। ऐसे में वह निवेश के लिए आगे आ सकता है।
भारत को होगा बड़ा आर्थिक फायदा
वैज्ञानिक डॉ. एसके ढाका के अनुसार, चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग से भारत को कई आर्थिक फायदे होंगे। भारत के पास हैवी मिसाइल दागने का एक विश्वसनीय प्लेटफार्म उपलब्ध हो जाएगा। जब पे लोड की क्षमता बढ़ेगी तो दुनिया के कई देश अपने उपग्रहों की लांचिंग के लिए भारत से संपर्क करेंगे। 'चंद्रयान-3' की कामयाबी भारत को पृथ्वी से बाहर यानी चंद्रमा पर एक सर्विस स्टेशन तैयार करने का अवसर प्रदान करेगी। यहां से दूसरे ग्रहों पर जाना आसान हो जाएगा। लाइट के पोलेराइलेशन को स्टडी किया जा सकेगा। सर्विस स्टेशन का इस्तेमाल, आगे की रिसर्च के लिए होगा। तीन साल पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को लेकर परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा था, भारत ने इस क्षेत्र में कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। अब निजी क्षेत्र को भी अंतरिक्ष यात्रा में भागीदार बनाया जाएगा। 'इसरो' द्वारा अपनी कई सुविधाएं, प्राइवेट क्षेत्र को मुहैया कराई जा सकती हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा था, संभवत: स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब अंतरिक्ष से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं में निजी क्षेत्र को शामिल किया जा रहा है। निजी क्षेत्र के शामिल होने के बाद अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में 'आपूर्ति आधारित मॉडल' को 'मांग आधारित मॉडल' के रूप में विकसित करने का प्रयास होगा।
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में प्राइवेट पार्टनरशिप
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के प्रसार को बढ़ाने और देश के भीतर अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए इसरो, अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी कंपनियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए तैयार है। यह कदम इसरो के लिए अपने उद्देश्य से अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी उद्योगों में खोलने का पूरक होगा। इसमें 'आपूर्ति आधारित मॉडल' से 'डिमांड आधारित मॉडल' तक दृष्टिकोण को बदलने का प्रस्ताव है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) उपयोगकर्ता, आवश्यकताओं के एकत्रकर्ता के रूप में कार्य करेगा। एनएसआईएल परिचालन प्रक्षेपण वाहनों के लिए 'डीओएस' से स्वामित्व लेने के लिए, प्रक्षेपण, उपग्रहों और सेवाओं का व्यावसायिकीकरण किया जाएगा। भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र के माध्यम से अंतरिक्ष गतिविधियों को पूरा करने के लिए एक प्लेटफार्म संचालित होगा। इसरो अपनी नई प्रौद्योगिकियों और क्षमताओं के विकास के माध्यम से अंतरिक्ष डोमेन में क्षमता निर्माण करने और एनएसआईएल व एनजीपीई की सुविधाओं को साझा करने में सक्षम बनाने के लिए काम करेगा। अब सेटेलाइट से लेकर लॉन्चर व ग्राउंड स्टेशन तैयार करने जैसे काम प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को दिए जा रहे हैं।
सुरक्षा के मोर्चे पर बढ़ेगी भारत की ताकत
पूर्व वैज्ञानिक एवं प्रमुख रेडियो कार्बन डेटिंग लैब, बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान, लखनऊ, डॉ. सीएम नौटियाल बताते हैं कि चंद्रयान 3 मिशन की सफलता से 'स्पिन ऑफ' यानी कई तरह की दूसरी तकनीक विकसित होंगी। उद्योगों में उन वस्तुओं और तकनीक का भरपूर इस्तेमाल होता है। नए पदार्थ, यूनिट और सॉफ्टवेयर आदि विकसित होते हैं। नासा ने भी इस तरह की सफल लॉंचिंग के बाद विभिन्न उपकरणों और तकनीक का उपयोग उद्योगों में किया है। इसकी सफलता पर हर कोई गर्व करेगा। लांचिंग क्षमता, पे लोड उपलब्धि और सुरक्षा के मोर्चे पर, भारत की ताकत बढ़ जाएगी। भारत की मिसाइल तकनीक में एक बड़ी मदद मिलेगी। उपग्रह भेजने के लिए भारत की क्षमता बढ़ेगी। मौसम की सटीक भविष्यवाणी करना आसान होगा। भारी उपग्रह भेजने की क्षमता में अपेक्षित सुधार आएगा। इसके अलावा अंतरिक्ष की मैंपिंग के क्षेत्र में भी बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगे। प्राकृतिक संसाधनों की मैपिंग भी आसान हो जाएगी। इन सबके लिए प्राइवेट क्षेत्र की मदद लेनी होगी। मौजूदा समय में भी कुछ काम आउटसोर्स किया जा रहा है। हालांकि अभी तक इसरो द्वारा केवल पार्ट तैयार कराए जाते हैं। उनका इस्तेमाल कहां पर होगा, कैसे होगा, यह जानकारी केवल इसरो के पास रहती है।
नजर में रहेंगी बॉर्डर पर चीन की हरकतें
चीन ने कई देशों के विरोध के बावजूद एंटी-सैटेलाइट (एएसएटी) मिसाइल का परीक्षण किया था। एक रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं, यह भारत के लिए सावधान रहने का अलर्ट था। चीन ने यह परीक्षण करने से पहले इसकी घोषणा नहीं की थी। बाद में इस तरह के परीक्षणों पर अनौपचारिक रोक लगी, लेकिन गुप्त तौर पर ऐसे परीक्षण होते रहे। साल 2008 में अमेरिका ने भी एएसएटी मिसाइल का परीक्षण किया था। इस परीक्षण से पहले अमेरिका ने उसकी सार्वजनिक घोषणा की थी। अब भारत को भी इस दिशा में सोचना होगा। बॉर्डर पर निगरानी के लिए एक मजबूत खुफिया तंत्र और टोही क्षमता विकसित करनी होगी। चीन को जवाब देने के लिए ज्यादा से ज्यादा समर्पित सैन्य उपग्रह तैयार करने होंगे। समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भारत को दूसरे मुल्कों से तकनीक हासिल करनी पड़ी है। इस मामले में भारत को इजराइल से अच्छा खासा सहयोग मिल सकता है। वजह, भारत और इजराइल ने मिलकर इमेजिंग और टोही उपग्रहों पर काम किया है। इनमें आरआईएसएटी 1 और आरआईएसएटी 2 शामिल हैं। रडार-इमेजिंग उपग्रह आरआईएसएटी 2 को अपडेट करने का काम चल रहा है। इसके द्वारा किसी भी तरह के मौसम में भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी हो सकती है। समुद्र में भी इसके जरिए निगरानी की जाती है। चंद्रयान 3 की सफलता से अब भारत ऐसी तकनीक हासिल कर सकता है, जो बॉर्डर पर चीन के मिलिट्री सेटेलाइट को जवाब देगा।