पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण कार्य और भारी बारिश से पहाड़ों से चट्टानों की घटनाएं हर साल बढ़ती जा रही हैं। रेल सेवाएं, हाईवे समेत कई सड़क मार्ग बंद हो जाते हैं और कई बार नदियां अपना रास्ता बदल लेती हैं। भूस्खलन के कारण भारत को हर साल 150-200 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
इस पर आगे बढ़ने से पहले पिछले कुछ सालों में होने वाली इन घटनाओं पर एक नजर डालते हैं।
- 25 जुलाई 2021: हिमाचल में भूस्खलन से नौ पर्यटकों की मौत
- 25 जुलाई 2021: महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण हुई भूस्खलन की घटनाओं में 89 लोगों की मौत
- 6 अगस्त 2020-केरल के इडुक्की जिले में अन्नामलाई की पहाड़ियों (जो चाय और कॉफी के बागान) पर मूसलाधार बारिश के बाद भूस्खलन से 70 लोगों की मौत
- 29 जुलाई उत्तराखंड: पिथौरागढ़ में भूस्खलन, ऋषिकेश-गंगोत्री मार्ग पर बड़े चट्टानों के गिरने से कांवड़ियों को लेकर जा रही गाड़ी भूस्खलन की चपेट में आने से चार कावड़ियों की मौत
- 10 मार्च 2018: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में आए भूस्खलन में 106 घरों में रहने वाले 400 लोग हुए थे प्रभावित
भारत के 12.6 फीसदी क्षेत्र में भूस्खलन होने का खतरा बना हुआ
भूस्खलन से सबसे अधिक नुकसान विकासशील देशों में हो रहा है। पिछले कुछ समय से दुनिया भर में इसके कारण होने वाले नुकसान के संबंध में चर्चा की जा रही है और आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में चट्टानों के खिसकने से 264 भारतीयों की आकस्मिक मौत हो गई। इनमें से 65 फीसदी से अधिक मौतें हिमालय और पश्चिमी घाट में हुईं। 2018 में भी देश के कई राज्यों में भी ऐसी ही घटनाएं हुई थी। जिसमें जानमाल और संपत्ति का भारी नुकसान हुआ था। पत्थरों के गिरने के कारण मौत की 80 फीसदी घटनाएं विकासशील देशों में घटी हैं।
भूस्खलन के लिए संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के अनुसार, भारत में, 420,000 वर्ग किमी, या कुल भूमि के 12.6 फीसदी क्षेत्र में चट्टानों के गिरने का खतरा हमेशा बना हुआ है। इसमें बर्फ वाले इलाके को शामिल नहीं किया गया है। भूस्खलन के खतरे वाले क्षेत्र में उत्तर पूर्व हिमालय (दार्जिलिंग और सिक्किम हिमालय क्षेत्र), उत्तर पश्चिम हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर), पश्चिमी घाट और कोंकण की पहाड़ियां (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र) और आंध्रप्रदेश में अरुकु क्षेत्र का पूर्वी घाट शामिल है। इन क्षेत्रों में पहाड़ों से चट्टानों के गिरने की संभावना इसलिए है क्योंकि जलवायु परिवर्तन से जोखिम बढ़ रहा है।
जीएसआई ने देश में पूरे 420,000 वर्ग किलोमीटर के चट्टानों के लिए संवेदनशील माने जाने वाले क्षेत्र के 85 फीसदी हिस्से के लिए 1:50,000 पैमाने पर एक राष्ट्रीय भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र बनाया है और बाकी को पूरा करने पर काम चल रहा है। आपदा की प्रवृत्ति के अनुसार क्षेत्रों को अलग-अलग जोन में बांटा गया है।
भारत को हर साल 150-200 करोड़ रुपये का नुकसान
विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली गिरने जैसी अन्य प्राकृतिक आपदाओं के विपरीत भूस्खलन से विस्थापन, संपत्ति का नुकसान, वनों की कटाई, खेतों और सड़कों पर पानी की आपूर्ति पर असर पड़ता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है।
2011 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) के एक अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया कि भारत को हर साल इससे 150-200 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। एक अनुमान के मुताबिक इस वजह से कई विकासशील देशों में आर्थिक नुकसान सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 1-2 फीसदी के बीच पहुंच सकता है।
इसके लिए जिम्मेदार कौन?
भूस्खलन भूकंप या भारी वर्षा जैसे प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न होते हैं और मानसून में खास तौर पर हर साल ऐसी घटनाएं होती है। अप्रत्याशित मौसम, जलवायु संकट, भारी और तीव्र वर्षा से देश में भूस्खलन की घटनाएं और बढ़ रही हैं। जलवायु संकट जोखिम को और बढ़ा रहे हैं, खासकर हिमालय और पश्चिमी घाट में।
उदाहरण के लिए, 1-19 अगस्त, 2018 के दौरान केरल में सामान्य से 164 फीसदी अधिक वर्षा हुई। जिसकी वजह से बाढ़ की गंभीर स्थिति पैदा हो गई और पहाड़ों से बड़े चट्टानों के गिरने से 498 लोग मारे गए। 10 जिलों से लगभग 341 ऐसी घटनाओं की सूचना मिली थी। केरल के इडुक्की जिले में अकेले 143 घटना हुई। इसे सदी की बड़ी घटनाओं में एक माना गया।
पहाड़ के वर्चस्व वाले इलाकों में इंसानों की दखलदांजी से समस्या गंभीर हुई है। सड़कों, इमारतों और रेलवे का निर्माण, खनन और उत्खनन, और जल विद्युत परियोजनाएं भी पहाड़ी ढलानों को नुकसान पहुंचाती हैं। निर्माण कार्य की वजह से मिट्टी और वनस्पतियों को हटाया जाता है जिससे प्राकृतिक जल निकासी प्रभावित होती है, और पहाड़ियों को भूस्खलन के लिए अधिक संवेदनशील बना देती है।
ताबड़तोड़ अनियमित विकास, 28 फीसदी मामलों में निर्माण कार्य जिम्मेदार
वहीं एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 28 फीसदी मामलों में निर्माण कार्य की वजह से पत्थर गिरने की घटनाएं होती हैं। निर्माण कार्य की वजह से ही चीन में 9 फीसदी और पाकिस्तान 6 फीसदी ऐसी घटनाएं होती हैं खनन से होने वाले भूस्खलन की घटनाओं में भारत का 12 फीसदी, 11.7फीसदी मामलों के साथ इंडोनेशिया का दूसरा और 10 फीसदी फीसदी मामलों के साथ चीन का तीसरा स्थान है।
अमेरिका के शेफील्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में पाया कि 2004-16 की अवधि में इंसानों की वजह से घातक भूस्खलन होने के मामले में भारत सबसे बुरी तरह प्रभावित देशों में से एक था। अध्ययन में दुनिया भर के 5,031 घातक भूस्खलन का विश्लेषण किया गया। जिसमें भारत की 829 घटनाएं शामिल थी। इन 829 घटनाओं में 10,900 मौतें हुई थी, जो दुनिया भर में भूस्खलन से हुई मौत का 18 फीसदी था।
पर्यावरण और वन मंत्रालय के पर्यावरण सूचना केंद्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पहाड़ी इलाकों का सड़कों से संपर्क बढ़ने और गाड़ियों की संख्या बढ़ने के कारण भी चट्टानों के गिरने से होने वाली मौतों की संख्या में इजाफा देखा जा रहा है।
नियमों की उड़ रही धज्जियां
हिमालयी क्षेत्र के आठ शहरों में भवन नियमों का विश्लेषण करने वाले एक अध्ययन में पाया गया कि ये भवन स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। सितंबर 2019 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की ओर से प्रकाशित राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम प्रबंधन रणनीति में भी इस विसंगति की ओर इशारा किया गया। इस रिपोर्ट में कहा गया कि हिमालयी क्षेत्र में ज्यादातर भवन निर्माण दिल्ली मास्टर प्लान से प्रेरित हैं, जो पहाड़ी शहरों के संदर्भ में उपयुक्त नहीं हैं।
लोगों की जान कैसे बचाई जाए
हालांकि वर्षा होने या वर्षा के रुकने के बाद पत्थरों के गिरने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। लेकिन कई बार ऐसा होने से पहले स्थानीय भौगोलिक चेतावनी संकेत देते हैं। जैसे जमीन में नई या असामान्य दरार, असामान्य उभार या गड्ढा, झुके हुए पेड़ या टेलीफोन या बिजली के खंभे और अधिक कीचड़ वाली पानी के प्रवाह में अचानक वृद्धि ये सभी इसका संकेत हो सकते हैं।
भूस्खलन की स्थिति मुख्य रूप से स्थानीय कारणों से उत्पन्न होती हैं। इसलिए इसकी संभावना का अनुमान लगाना न सिर्फ मुश्किल बल्कि काफी कठिन है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक तकनीक की मदद से भूस्खलन की पूर्व चेतावनी देकर जान-माल के नुकसान पहुंचने की बड़ी घटनाओं को रोका जा सकता है। तकनीक का प्रयोग अब अलग-अलग राज्यों में शुरू हो चुका है।
जीएसआई ने जुलाई में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और तमिलनाडु के नीलगिरी जिलों में भूस्खलन पूर्व चेतावनी प्रणाली (एलईडब्ल्यूएस) का एक प्रयोग शुरू किया था, जिसमें सफल साबित होने पर अन्य भूस्खलन के लिए संवेदनशील माने जाने वाले राज्यों में इसका विस्तार किया जा सकता है।
दूसरी तरफ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मंडी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा यंत्र तैयार किया है जिससे इसकी भविष्यवाणी पहले ही की जा सकती है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 16 स्थानों पर सतह-स्तरीय मोशन-सेंसर आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई। प्रयोग के दौरान यह तकनीक बहुत हद तक सफल रही और सरकार से इस उपकरण को इनोवेशन पुरस्कार भी हासिल हुआ। यह उपकरण मौसम के मापदंडों, मिट्टी की नमी, मिट्टी की आवाजाही और वर्षा की तीव्रता को एकत्र करता है। 2018 में, सेंसर ने अधिकारियों को मंडी-जोगिंदर नगर राजमार्ग पर होने वाले भूस्खलन के बारे में सचेत कर दिया था। इससे पुलिस को सड़क से वाहनों को पहले ही दूर करने में मदद मिली।