फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Coronavirus Vaccine: भारत की पहली कोविड-19 वैक्सीन 'कोवाक्सिन' का मानव परीक्षण जल्द, जानें कितने चरणों में होता है ट्रायल

Tue, 07 Jul 2020 12:22 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
कोरोना वायरस वैक्सीन - कोवाक्सिन वैक्सीन - फोटो : ट्विटर
विज्ञापन

कोविड-19 के खिलाफ लड़ने वाली भारत की पहली वैक्सीन 'कोवाक्सिन वैक्सीन' का मानव परीक्षण बहुत जल्द शुरू होने वाला है। ये वैक्सीन भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिडेट के साझा प्रयासों से विकसित की गई है। आईसीएमआर ने उन 12 संस्थानों को पत्र लिख दिया है जहां इस वैक्सीन का मानव परीक्षण होना है। 

विज्ञापन



आईसीएमआर ने अपने पत्र में सात जुलाई तक मरीजों को इकट्ठा करने और आंतरिक कमिटी से आवश्यक मंजूरी लेने के निर्देश दिए हैं। इसी के साथ एक चेतावनी भी दी गई है कि निर्देशों का पालन ना करने वालों पर कार्रवाई हो सकती है। भारत बायोटेक उन सात कंपनियों में से एक है जो कोरोना की वैक्सीन के लिए काम कर रही है, ये हैदराबाद में स्थित है। 


ये पहली कंपनी है जिसे सरकार की ओर से वैक्सीन के फेज-1 और फेज-2 को रेगुलेट करने की मंजूरी मिली थी। इसके अलावा जायडस काडिला को भी ह्यूमन ट्रायल के लिए ड्रग कंटोलर जनरल की ओर से स्वीकृति मिल गई है। जायडस काडिला ने ZyCov-D नाम की वैक्सीन तैयार की है, जो कोविड-19 या सार्स-कोव 2 वायरस के खिलाफ लड़ने में मदद करेगी।

इन दोनों भारतीयों वैक्सीन के अलावा विश्व में 18 कोरोना की वैक्सीन हैं जो मानव परीक्षण वाले चरण में हैं। इनमें से सबसे आगे AZD1222 वैक्सीन है जिसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीट्यूट और एस्ट्राजेनेका ने मिलकर बनाया है। AZD1222 के बाद MRNA-1273 वैक्सीन है जिसे कैसर परमानेंट वाशिंगटन हेल्थ रिसर्च ने विकसित किया है और इसे मॉडर्ना फार्मास्यूटिकल कंपनी बना रही है।

विज्ञापन


एस्ट्राजेनेका और मॉडर्ना फार्मास्यूटिकल पहले ही कोविड-19 वैक्सीन बनाने के लिए भारतीय कंपनियों के साथ करार कर चुकी हैं।

क्या है क्लिनिकल ट्रायल?
क्लिनिकल ट्रायल का मतलब है किसी मरीज पर प्रयोगात्मक वैक्सीन का टेस्ट किया जाता है, ताकि वैक्सीन के सुरक्षित और असरदार होने का पता लगाया जा सके। इस तरह की प्रक्रिया में औसतन दस साल लग जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक लोग स्वैच्छिक तरीके से क्लिनिकल ट्रायल के लिए आते हैं।

इसमें ड्रग, कोशिकाएं और दूसके जैविक पदार्थ, सर्जिकल प्रक्रिया, रेडियोलॉजिकल प्रक्रिया, डिवाइसेज, व्यावहारिक इलाज और रोगनिरोधक इलाज शामिल होते हैं। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि क्लिनिकल ट्रायल सतर्कता के साथ डिजाइन और पूरे किए जाते हैं ताकि ट्रायल को शुरू करने से पहले मंजूरी मिल जाए। क्लिनिकल ट्रायल में किसी भी उम्र के व्यक्ति को शामिल किया जा सकता है।

क्लिनिकल ट्रायल के चार चरण कौन से हैं?

  • पहले चरण के तहत शोध में सामान्य तौर पर इंसानों के छोटे समूह पर टेस्ट किया जाता है ताकि सुरक्षित खुराक और साइड इफेक्ट के बारे में पता चल सके।
  • दूसरे चरण के तहत जिन लोगों पर पहले चरण में सुरक्षित टेस्ट हो जाता है तो इसके बाद इंसानो के बड़े समूह पर वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल किया जाता है।
  • तीसरे चरण में अलग-अलग क्षेत्र और देशों में इंसानों के बड़े समूहों पर टेस्ट किया जाता है, नए इलाज की मंजूरी से पहले सही कदम उठाया जाता है।
  • चौथे चरण में सरकार की ओर से मंजूरी मिलने के बाद देश की जनसंख्या में संक्रमित मरीजों पर इस वैक्सीन की मदद से टेस्ट किया जाता है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें