कोविड-19 बीमारी से पूरी दुनिया लड़ रही है और इस बीमारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी जैसे दौर का माहौल बना दिया है, यानि अर्थव्यवस्था गिर रही है और ग्रोथ रुक गई है। कोरोना वायरस ने अमेरिका में करोड़ों लोगों को बेरोजगारी की सूची में डाल दिया है।
अप्रैल महीने में ही अमेरिका में बेरोजगारों की संख्या दो करोड़ से ज्यादा थी जिसकी और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। एक रिपोर्ट की माने तो 21 मार्च तक तीन करोड़ 60 लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हुए हैं जो कि अमेरिका की काम करने वाली जनसंख्या का एक तिहाई है।
इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विश्लेषण के मुताबिक कई देशों में मैन्यूफैक्चरिंग आउटपुट ठप्प हो गया है जिसकी वजह से बाहरी मांग में गिरावट आई है और घरेलू मांग में भी उम्मीद के मुताबिक गिरावट देखने को मिल सकती है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अनुमान लगाया है कि इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था की ग्रोथ नेगेटिव में होगी। अनुमान के मुताबिक अर्थव्यवस्था माइनस तीन परसेंट पर ग्रोथ करेगी और यह 2009 में आए वित्तीय संकट से भी ज्यादा खतरनाक होगी।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमान के मुताबिक इन देशों की अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान उठाना पड़ सकता है...
- अमेरिका - 5.9 फीसद
- जापान - 5.2 फीसद
- यूनाइटेड किंगडम - 6.5 फीसद
- जर्मनी - 7 फीसद
- फ्रांस - 7.2 फीसद
- इटली - 9.1 फीसद
- स्पेन - 8 फीसद
साल 2020 की पहली तिमाही में चीन की सकल घरेलू उत्पाद में 36.6 फीसद की गिरावट देखी गई है जबकि दक्षिण कोरिया का आउटपुट 5.5 फीसद गिरा है। हालांकि दक्षिण कोरिया ने अपने देश में लॉकडाउन नहीं लगाया था लेकिन ज्यादा टेस्टिंग, क्वारंटीन और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की योजना पर ज्यादा जोर दिया था। यूरोप की ओर देखें तो फ्रांस की सकल घरेलू उत्पाद 21.3 फीसद, स्पेन की 19.2 फीसद और इटली की 17.5 फीसद कतक गिरी है।
यात्राओं पर प्रतिबंध लगने से वैश्विक उद्योगिकी गतिविधियों पर गहरा असर पड़ा है। मार्च में तेल की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई। लॉकडाउन लगाने की वजह से यात्रा और परिवहन पर असर पड़ा जिसकी वजह से सिर्फ तेल ही नहीं नैचुरल गैस पर प्रभाव पड़ा।
कोविड-19 पर काबू पाने के लिए उठाए गए कदमों के कारण प्राकृतिक गैस की मांग में कमी आई, जिसका परिणाम यह हुआ कि चीन के कई एलएनजी खरीदारों ने आयात पर रोक लगा दी क्योंकि उनके भंडार खाली नहीं थे।
खाना और पेय पदार्थ
आईएमएफ के मुताबिक 2020 में खाने की कीमतों में 2.6 फीसद की कमी देखने को मिल सकती है। सप्लाई चेन में रुकावट, सीमाओं पर देरी और कोरोना संक्रमित इलाकों में खाने की सुरक्षा इसके कारण हो सकते हैं।
लॉकडाउन के दौरान सीरियल्स, संतरा, समुद्री खाना और अरब की कॉफी के दामों में तो बढ़ोतरी हुई लेकिन चाय, मांस, ऊन और रूई जैसे सामानों की कीमत में गिरावट देखने को मिली। तेल की कीमतें गिरने से पाम ऑयल, सोया तेल, चीनी और भुट्टा के दामों में तेजी की गिरावट दिखी।
भारत में वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने आत्मनिर्भर भारत अभियान पैकेज की घोषणा की और उसको विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि इस अभियान के तहत छोटे और मझौले व्यापारों को क्रेडिट गारंटी के तौर पर राहत दी जाएगी।
कई देशों ने कोरोना से लड़ने के लिए देश में अरबों रुपये के पैकजों का एलान किया। भारत ने अपनी सकल घरेलू उत्पादा का 10 फीसद, जापान ने 21.1 फीसद, अमेरिका ने 13 फीसद, स्वीडन ने 12 फीसद, जर्मनी ने 10.7 फीसद, फ्रांस ने 9.3 फीसद, स्पेन ने 7.3 फीसद और इटली ने 5.7 फीसद के आर्थिक राहत पैकेज का एलान किया।
दक्षिण कोरिया ने अपने देश में आर्थिक गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई थी इसलिए वहां की अर्थव्यवस्था पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है। चीन ने भी हाल ही में लॉकडाउन खोला है जिसके बाद से वहां अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे खोला जा रहा है।