हिमाचल प्रदेश में सरकार गिरेगी या बचेगी यह बहुत हद तक बुधवार को पेश होने वाले बजट से स्पष्ट हो जाएगा। क्योंकि बजट के दौरान हिमाचल प्रदेश में सभी विधायकों का रहना बेहद जरूरी है। लेकिन हिमाचल की सियासत में इस वक्त नौ विधायकों के पंचकूला में होने की बात सामने आ रही है। सियासी जानकारों का मानना है अगर यह विधायक सदन में नहीं पहुंचते हैं तो हिमाचल प्रदेश की सरकार के अगले सात दिन बेहद कठिन हो सकते हैं। कहा यही जा रहा है कि अगर सियासी हालात बिगड़े तो इन्हीं सात दिनों में हिमाचल प्रदेश में सरकार भी गिर सकती है। वहीं हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी हो रही है कि महाराष्ट्र में जो परिस्थितियां एमएलसी चुनाव के बाद हुई थी। ठीक वही स्थिति हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा के चुनाव के बाद बनी है। इसी वजह से भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र की तरह हिमाचल में भी सरकार के अल्पमत में होने का शोर मचाना शुरू कर दिया है।
सियासी जानकारों की माने तो अगले सात दिन हिमाचल प्रदेश में राजनीतिक तौर पर बड़े महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। दरअसल हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी पार्टी के कुछ विधायकों को सीआरपीएफ की अगुवाई में पंचकूला ले जाया गया है। जबकि हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचकूला गए 6 सत्ता पक्ष के और तीन निर्दलीय विधायक ही हिमाचल प्रदेश की सरकार में बड़ी सेंधमारी कर सकते हैं। बताया जा रहा है कि इन छह विधायकों में ऐसे नेता भी हैं जो कि हिमाचल प्रदेश की सियासत में मजबूत पैठ भी रहते हैं। सियासी जानकार बताते हैं कि हिमाचल प्रदेश में बुधवार को बजट आना है। बजट तभी लाया जा सकेगा जब सभी विधायक मौजूद होंगे। ऐसे में अगर बुधवार को पंचकूला गए विधायक वापस नहीं आते हैं तो माना जाएगा कि हिमाचल की सरकार के लिए अगले सात दिन बेहद कठिन है।
राजनीतिक विश्लेषक नरेंद्र पठानिया कहते हैं कि अभी चर्चा इसी बात की हो रही है कि जो विधायक पंचकूला पहुंचे हैं उनके साथ कुछ अन्य विधायक भी जुड़ सकते हैं। ऐसे में अगर यह संख्या ज्यादा होती है तो निश्चित तौर पर हिमाचल प्रदेश की सरकार के लिए सबसे बड़ा संकट आ सकता है। पठानिया कहते हैं कि इसीलिए बुधवार का दिन हिमाचल प्रदेश हिमाचल प्रदेश की सियासत में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक विधानसभा में विधायकों की संख्या कम रहने पर इस बात की संभावनाएं और मजबूत हो जाएगी की आने वाले दिनों में हिमाचल प्रदेश की सरकार गिर भी सकती है। इसके लिए संभव है कांग्रेस के ही बीच का कोई नेता महाराष्ट्र की तरह ही बतौर मुख्यमंत्री पेश हो। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि जिस तरीके से राज्यसभा चुनाव के परिणाम आए हैं उससे हिमाचल प्रदेश की सियासत में अचानक बड़ी तेजी से तब्दीलियां देखने को मिल सकती हैं।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु शितोले कहते हैं कि जिस तरीके से हिमाचल में सियासी शोर मचा है ठीक इसी तरह जून 2022 में महाराष्ट्र में भी हंगामा हुआ था। उनका कहना है एमएलसी के चुनाव में ऐसे ही परिस्थितियों बनी थी जो इस वक्त हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा के चुनाव में बनी है। हिमांशु कहते हैं कि उसके बाद महाराष्ट्र में जो सियासी ड्रामा हुआ और महाविकास अगाडी की सरकार चली गई। राजनैतिक जानकार उपेंद्र ठाकुर कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र की तर्ज पर हिमाचल में भी माहौल बनाना तो शुरू ही कर दिया है। उनका कहना है कि यह बात तो सच है कि तय नंबरों के बाद भी कांग्रेस अपने उम्मीदवार को नहीं जितवा सकी। ठाकुर कहते हैं कि अब इन्हीं नंबरों का आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस को घेरना शुरू किया है और मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगा है। वह कहते हैं कि कांग्रेस के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग तो की ही है। ऐसी परिस्थितियों में सत्ता में सेंधमारी की संभावनाएं बढ़ जाती है।
सियासी जानकार बताते हैं कि अभी यह कहना मुश्किल है कि सरकार बचेगी या गिरेगी। लेकिन सरकार फिलहाल संकट में फंसती हुई दिख रही है। सियासी जानकार बताते हैं कि जिस तरह महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे विधायकों को अपने साथ जोड़कर नई सरकार बनाने में आगे रहे थे। इसी तर्ज पर हिमाचल में भी ऐसे ही किसी "एकनाथ शिंदे" को आगे किया जा सकता है। राजनीतिक जानकार और पत्रकार राजेश शर्मा कहते हैं कि सियासत में कुछ भी संभव है। अगर सरकार बदलने की नौबत आती है तो संभव है कांग्रेस का ही कोई नेता उसकी अगुवाई कर महाराष्ट्र की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन कर सकता है। शर्मा भी मानते हैं कि अगले एक सप्ताह में महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। उनका मानना है कि लोकसभा चुनावों के लिहाज से अगर भारतीय जनता पार्टी ऐसे परिवर्तन में कांग्रेस के ही नेता पर महाराष्ट्र की तरह दांव लगती है तो उसका सियासी फायदा भी हो सकता है।
इसके अलावा हिमाचल प्रदेश के सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की भी सबसे ज्यादा है कि जो हर्ष महाजन भारतीय जनता पार्टी के सिंबल पर राज्यसभा पहुंचे हैं। वह कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में हुआ करते थे। राजनैतिक विश्लेषण नरेंद्र पठानिया कहते हैं कि हर्ष महाजन भारतीय जनता पार्टी में भले चले गए हो लेकिन वह कांग्रेस के नेताओं में भी अपनी एक मजबूत पकड़ रखते हैं। पठानिया बताते हैं कि हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के समय हर्ष महाजन सियासी रणनीतिकार भी हुआ करते थे। यही वजह है कि लंबे समय तक सत्ता में रहे वीरभद्र के साथ वह कांग्रेस के प्रत्येक नेता को न सिर्फ करीब से जानते हैं। बल्कि सरकार को बनाने और बिगाड़ने के पैतरें में भी महाजन माहिर माने जाते हैं। सियासी जानकारों का कहना है कि महाजन कांग्रेस से भले भारतीय जनता पार्टी में चले गए हो लेकिन उनके कई करीबी और नजदीकी अभी भी हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार में हैं। ऐसे में इस इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश में सरकार बदलने जैसा बड़ा खेल नहीं हो सकता है।