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Hijab Row: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- किसी धार्मिक पहलू को नहीं छुआ सिर्फ कक्षा में हिजाब पर प्रतिबंध, आज भी सुनवाई

Thu, 22 Sep 2022 06:19 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

Hijab Row : जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा, मैं लाहौर हाईकोर्ट के एक पूर्व जज को जानता हूं जो अपने परिवार के साथ कई बार भारत आते थे। उनकी दो बेटियां थीं और वे भी हिजाब नहीं पहनती थीं। उनकी मां भी कम से कम भारत में तो हिजाब नहीं पहनती थीं।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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Hijab Row : सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक सरकार ने दलील दी है कि हमने किसी धार्मिक पहलू को नहीं छुआ है, सिर्फ कक्षा के भीतर हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाया है। कक्षा के बाहर यहां तक कि संस्थान के परिसर में भी हिजाब पहनने पर कोई रोकटोक नहीं है। शीर्ष कोर्ट हिजाब पर प्रतिबंध के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।

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जस्टिस हेमंत गुप्ता व जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ से कर्नाटक के एडवोकेट जनरल प्रभुलिंग के नवदगी ने कहा, सरकार सिर्फ यह कह रही है कि शिक्षण संस्थान जो कि पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हैं, वे विद्यार्थियों का लिबास या यूनिफॉर्म तय कर सकते हैं। नवदगी ने तर्क दिया, संविधान के अनुच्छेद- 25 के तहत हर धार्मिक प्रथा संरक्षित नहीं है। 

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा, तीन तलाक व गोहत्या इस्लाम में आवश्यक धार्मिक प्रथाएं नहीं हैं। अनुच्छेद- 25 के तहत संरक्षण का दावा करने के लिए याचिकाकर्ताओं को दिखाना होगा कि हिजाब आवश्यक धार्मिक प्रथा है। उन्होंने कहा, यदि यह माना जाता है कि हिजाब पहनने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, तो कोर्ट के समक्ष जो कुछ भी है, वह स्कूल में यूनिफॉर्म के प्रतिबंध की तर्कसंगतता है। 
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राज्य सरकार सिर्फ यूनिफॉर्म को विनियमित कर छात्रों में अनुशासन पैदा करना चाहती है। अनुच्छेद-19 में अधिकारों पर कोई प्रतिबंधात्मक प्रभाव ‘आकस्मिक’ है और यह कानून को अमान्य करने का आधार नहीं हो सकता है। इस मामले में सुनवाई बृहस्पतिवार को भी होगी।

प्रतिबंध का सिर्फ शोर...मंशा भी नहीं
प्रतिबंध का सिर्फ शोर है, हंगामा खड़ा किया जा रहा है। हिजाब पर कोई प्रतिबंध नहीं है। ऐसा करने की राज्य सरकार की मंशा भी नहीं है। न किसी धार्मिक गतिविधि पर रोक लगाई है, न किसी को प्रोत्साहित किया है। सिर्फ कहने मात्र से अभिव्यक्ति की आजादी के हिस्से के तौर पर पोशाक पहनने का अधिकार हर जगह प्रयोग नहीं किया जा सकता है। -प्रभुलिंग के नवदगी, एडवोकेट जनरल, कर्नाटक

फ्रांस में भी हिजाब प्रतिबंधित, वहां महिलाएं कम इस्लामी नहीं हो गईं
नवदगी ने दलील दी, फ्रांस में भी हिजाब पर प्रतिबंध है। वहां की महिलाएं किसी तरह से भी कम इस्लामी नहीं हो गईं। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज ने कहा, याचिकाकर्ताओं का पूरा मामला सिर्फ एक आधार पर टिका है, जिसका वे दावा करते हैं कि एक पूर्ण अधिकार है। नवदगी ने कहा, याचिकाकर्ताओं का कहना है, वे इस्लाम के आदेश के अनुसार हिजाब पहनते हैं। यह कोई अभिव्यक्ति नहीं है।

पीठ ने पूछा, हिजाब पहनें, तो आप प्रवेश की अनुमति नहीं देंगे
पीठ ने पूछा, अगर वे हिजाब पहनें, तो आप उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं देंगे। इस पर नटराज ने कहा, सरकार का फैसला किसी धर्म पर आधारित नहीं है। वह सिर्फ यह कह रही कि शिक्षण संस्थान यूनिफार्म तय करेंगे। इस पर पीठ ने रोकते हुए पूछा, हां या ना में बताएं। इस पर नटराज ने कहा, यह फैसला संबंधित स्कूल को उसके यहां तय यूनिफार्म के लिहाज से लेना होगा।

हम किस हद तक जाएं...
पीठ ने पूछा, अब सवाल है कि अगर हम मान लेते हैं कि हिजाब अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है, फिर यह कैसी प्रथा है?  हम (कोर्ट) इसमें किस हद तक जा सकते हैं। पूर्व के फैसलों की दलील दे चुके नवदगी ने कहा, आवश्यक नहीं कि धर्म से जुड़ी हर गतिविधि को जरूरी धार्मिक प्रथा कहा जाए। आज बहुत सी हमारी बहनें और माताएं हैं, जो इस्लाम को मानती हैं, लेकिन हिजाब नहीं पहनती हैं। वे अपनी पसंद से हिजाब नहीं पहनती हैं।

क्लास में हिजाब पर रोक तो बच्चों को विविधता से भरे देश के लिए कैसे करेंगे तैयार : सुप्रीम कोर्ट  
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिजाब मामले में सुनवाई के दौरान पूछा कि अगर समानता और एकरूपता के नाम धार्मिक पोशाक को स्कूल में बैन कर दिया जाता है तो फिर बच्चों को विविधता से भरे देश के लिए कैसे तैयार किया जाएगा? उन्होंने कहा, इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि हिजाब विविध संस्कृतियों वाले देश को समझने और संजीदा होने में मदद कर सकती है।

जस्टिस धूलिया ने ये टिप्पणी शिक्षकों की ओर से पेश वकील आर वेंकटरमानी की दलील के दौरान की। वकील वेंकटरमानी का कहना था कि स्कूलों को  किसी भी धार्मिक प्रतीको से दूर रखा जाना चाहिए। ताकि बिना किसी धार्मिक भेद के बच्चों को पढ़ाया जा सके। बच्चों में पहले से ही भेदभाव आ जाएगा तो अच्छी शिक्षा देना मुश्किल हो जाएगा। 

इस पर पीठ ने पूछा, क्या हिजाब अलगाव की दीवार खड़ी करता है? हिजाब मामले को एक आंखे खोलने वाले अनुभव के तौर पर देखना चाहिए। यह एक मौका है, देश की विविधता को देखने का। हमारे विद्यार्थी सभी संस्कृतियों व धर्मों से आते हैं। उनके प्रति सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील बनें। यह मौका है उनमें कुछ मूल्यों को विकसित करने का।
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लाहौर हाईकोर्ट के पूर्व जज की बेटियां भी नहीं पहनती थीं हिजाब
जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा, मैं लाहौर हाईकोर्ट के एक पूर्व जज को जानता हूं जो अपने परिवार के साथ कई बार भारत आते थे। उनकी दो बेटियां थीं और वे भी हिजाब नहीं पहनती थीं। उनकी मां भी कम से कम भारत में तो हिजाब नहीं पहनती थीं।

राज्य सरकार किसी संप्रदाय के खिलाफ नहीं
नवदगी ने याचिकाकर्ताओं के वकील की उस दलील का सिरे से खंडन किया कि राज्य सरकार एक संप्रदाय के खिलाफ काम कर रही है। उन्होंने कहा, ऐसा हरगिज नहीं है और इसके ढेरो प्रमाण हैं। राज्य सरकार की बहुत सारी योजनाएं हैं जिनसे अल्पसंख्यकों के बच्चे लाभांवित होते हैं।
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