ग्राउंड जीरो पहुंची अमर उजाला की टीम को स्थानीय निवासी अतुल मिले। अतुल कहते हैं कि वह इसी मोगलगढ़ी गांव के रहने वाले हैं। वह कहते हैं कि क्योंकि यहां पर इतना बड़ा कार्यक्रम हो रहा था, इसलिए कौतूहलवश वह यहां आए हुए थे। लेकिन डेढ़ से 2 बजे के बीच जिस तरीके से यहां पर भगदड़ मचनी शुरू हुई, उससे उनके रोंगटे खड़े हो गए। अतुल कहते हैं कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने लोगों को मरते देखा है। वह चीख रहे थे चिल्ला रहे थे और रो रहे थे। लेकिन घायलों को अस्पताल पहुंचने के लिए कोई बंदोबस्त नहीं थे। अतुल कहते हैं उन्होंने अपने दोस्तों को फोन किया और जो भी वाहन थे घटनास्थल पर लाने के लिए कहा। कुछ लोग तो स्थानीय टेंपो-टैक्सी और मैक्स जैसे वाहनों में घायलों को लेकर जाने लगे। अतुल कहते हैं कि उन्होंने खुद दर्जनों मृतकों को टेंपो-टैक्सी और ऑटो से अस्पताल पहुंचाया।
यहीं के रहने वाले पुष्पेंद्र यादव कहते हैं कि जब वह यहां पर आए थे तो बहुत भीड़ थी। उनका कहना है कि भीड़ की संख्या तो वह नहीं बता सकते, लेकिन उन्होंने अपने जीवन में इतनी भीड़ से पहले कभी देखी नहीं थी। पुष्पेंद्र कहते हैं कि जब यहां पर चीख पुकार मचनी शुरू हुई, तो लगा कि शायद यह लोग बाबा के जयकारे लगा रहे हैं। लेकिन ऐसा था नहीं। लोग भीड़ में दब रहे थे और कुचले जा रहे थे। पुष्पेंद्र कहते हैं, मेरी आंखों के सामने लोग लाश में तब्दील होते जा रहे थे और मैं चीख रहा था चिल्ला रहा था। लोगों से मदद की गुहार लगा रहा था कि कोई तो सामने आए और वह इन्हें बचाए। वह कहते हैं कि मैंने अपनी जिंदगी में इससे ज्यादा खौफनाक मंजर कभी देखा ही नहीं। लोग कार्यक्रम स्थल से जीटी रोड और जीटी रोड से बचकर भागते हुए सामने के खेतों में दौड़ने लगे। लेकिन संख्या इतनी ज्यादा थी कि लोग खेतों में एक दूसरे के ऊपर चढ़ चुके थे। न जाने कितने लोग इस भीड़ में मारे गए, जिन्हें बचाया जा सकता था।
घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने बताया कि जिस तरीके से जीटी रोड पर कल लाशें बिछी हुई थीं, वह वीभत्स मंजर अब उनकी आंखों के सामने से कभी नहीं जाने वाला। सिकंदराराव में दुकान चलाने वाले ओमवीर अमर उजाला डॉट कॉम से घटना स्थल पर मिले। वह कहते हैं कि 54 साल उनकी उम्र हो गई है। जो खौफनाक मंजर उन्होंने कल देखा वह अब बची हुई जिंदगी में उनकी आंखों के सामने से कभी नहीं जाने वाला। उनका कहना है कि रात को ढंग से सो भी नहीं पाए। उनकी आंखों के सामने जीटी रोड से लेकर खेतों में बिखरी हुई लाशें घूम रही थीं। वह कहते हैं कि महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे तड़प-तड़प कर मर गए। ओमवीर ने अपने भतीजे को मेरा स्थल के बाहर लोगों को पानी पिलाने के लिए एक छोटा सा स्टॉल लगाया था। कहते हैं उनका भतीजा तो भीड़ देखकर के ही दोपहर में यहां से वापस सिकंदराराव चला गया। जब उसने घर पर आकर भीड़ की हालत बताए तो वह खुद मौके पर आए। वह कहते हैं कि जैसे ही वह यहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि किस तरह से यहां पर लाशें सड़कों से लेकर खेतों में पड़ी हुईं हैं।
घटनास्थल पर बुधवार को अपने बच्चों के साथ पहुंची कांति देवी कहती हैं कि उनका कोई रिश्तेदार तो इस कार्यक्रम में नहीं था, लेकिन वह खुद जरूर यहां पर आने वाली थीं। बातचीत में उन्होंने बताया कि उनकी बेटी की शादी के बाद दूसरी विदाई की रस्म कल होनी थी। इसलिए वह यहां पर नहीं आईं। उनका कहना है कि भगवान ने उन्हें बचा लिया। कांति देवी कहती हैं कि उनके गांव के बहुत सारे लोग यहां पर आए थे। हालांकि उनके किसी जानने वाले के साथ तो कोई बड़ी घटना नहीं हुई, लेकिन कुछ घायल जरूर हाथरस के अस्पताल में दाखिल हैं। अपने गांव में प्रधान का चुनाव लड़ चुकीं कांति देवी कहती हैं कि जब इतनी बड़ी घटना हुई, तब भी पुलिस और प्रशासन के कोई जिम्मेदार अधिकारी तत्काल मौके पर नहीं पहुंचे। अब जब सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं, तो सब लोग लगातार पहुंच रहे हैं।