विधानसभा चुनाव की वोटिंग से 48 घंटे पहले हरियाणा की सियासत में बड़ा उलटफेर हो गया है। इस साल जनवरी में भाजपा का दामन थामने वाले अशोक तंवर ने गुरुवार को कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली है। तंवर ने 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस छोड़ दी थी। इसके बाद वे 'आप' में शामिल हो गए थे। तंवर की एंट्री को प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का 'बगलडूब' दांव बताया जा रहा है। यह भारतीय कुश्ती का एक प्रसिद्ध दांव है। इस दांव में एक पहलवान सामने वाले पहलवान की बगल से निकल जाता है। यानी उसकी पकड़ से बाहर निकलकर वह उसे परास्त कर देता है। कई बार यह दांव, किसी दूसरे दांव को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। राजनीतिक जानकारों का कहना है, तंवर की एंट्री से कुमारी शैलजा जोखिम में आ गई हैं। दूसरा, इससे भाजपा का दलित कार्ड भी पस्त होने की संभावना है। कांग्रेस पार्टी को भाजपा के दलित दांव से नुकसान हो रहा था। चूंकि तंवर भी दलित समुदाय से आते हैं, ऐसे में मतदान की दहलीज पर कांग्रेस ने भाजपा के इस दांव को काटने का प्रयास किया है।
चुनाव प्रचार में 'शैलजा और दलित' कार्ड
सिरसा के पूर्व सांसद अशोक तंवर ने महेंद्रगढ़ जिले के गांव बवानिया में राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस की सदस्यता हासिल की है। खुद राहुल राहुल गांधी ने पटका पहनाकर तंवर का स्वागत किया। कांग्रेस पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रहे अशोक तंवर और भूपेंद्र हुड्डा के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा था। पार्टी पर हुड्डा के वर्चस्व से तंवर के पांव जम नहीं पा रहे थे। नतीजा, उन्होंने पांच अक्टूबर 2019 को कांग्रेस छोड़ने का ऐलान कर दिया था। गुरुवार को राहुल की मौजूदगी में जब तंवर ने कांग्रेस ज्वाइन की तो उस वक्त पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी मंच पर उपस्थित रहे। बता दें कि कई दिनों ने भाजपा, चुनाव प्रचार में 'शैलजा और दलित' कार्ड खेल रही थी। सिरसा से लोकसभा सांसद कुमारी शैलजा दलित समुदाय से आती हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव में सिरसा सीट पर अशोक तंवर को हराया था। सोशल इंजीनियरिंग में नित्य नए प्रयोग करने वाली भाजपा ने इस बार शैलजा कार्ड के जरिए दलित वोटरों को साधने की रणनीति बनाई थी।
तंवर की एंट्री से भाजपा को तगड़ी चोट
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला होता जा रहा है। अगर दो सप्ताह पहले की बात करें तो कांग्रेस पार्टी का ग्राफ हाई बताया जा रहा था। इस बीच भाजपा ने शैलजा फैक्टर और दलित वोट बैंक को जोड़कर कांग्रेस को फंसाने की कोशिश की। भाजपा ने यह मैसेज भी आगे बढ़ा दिया कि कांग्रेस सत्ता में आती है तो एक समुदाय विशेष का व्यक्ति ही मुख्यमंत्री बनेगा। इतना ही नहीं, भाजपा नेताओं ने चुनावी रैलियों में यह भी कहना शुरु कर दिया कि कांग्रेस के सत्ता आने पर 'चौधर' दोबारा से 'रोहतक' में चली जाएगी। कांग्रेस पार्टी, भाजपा के 'आखिरी दिन की खिलाड़ी' दांव से अच्छी तरह परिचित है। ये बात कांग्रेस नेतृत्व को भी मालूम है कि भाजपा, आसानी से हार नहीं मानती, लेकिन अब मतदान से दो दिन पहले कांग्रेस ने तंवर की एंट्री कराकर भाजपा को तगड़ी चोट पहुंचाई है। भाजपा ने गैर जाटों को मिलाकर जो सोशल इंजीनियरिंग तैयार की थी, अब उसके कमजोर पड़ने के आसार बन गए हैं।
भाजपा के चुनावी प्रचार को मिली नई धार
हरियाणा की राजनीति के जानकार, रविंद्र कुमार बताते हैं, चुनाव प्रचार में मुद्दे हर पल बदल रहे हैं। एक पार्टी कोई मुद्दा उठाती है तो दूसरी उसका काउंटर करती है। दोनों दलों के स्टार प्रचारकों ने चुनाव में गर्माहट ला दी है। अब कांग्रेस में तंवर की एंट्री, चुनावी नतीजों पर असर डाल सकती है। पिछले दिनों भाजपा ने कुमारी शैलजा के मुद्दे को भुनाने का खूब प्रयास किया था। पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सबसे पहले इस मुद्दे को हवा दी थी। खट्टर ने शैलजा की भाजपा में शामिल होने की संभावनाओं बाबत बयान दे दिया था। खुद शैलजा ने भी प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने को लेकर अपनी इच्छा जताई थी। उन्होंने कहा था, कोई दलित चेहरा प्रदेश का सीएम क्यों नहीं बन सकता। इसके बाद भाजपा ने अपने चुनावी प्रचार को एक नई धार दे दी। पार्टी ने इसे दलित वोट बैंक से जोड़ दिया। खुद पीएम मोदी ने अपनी चुनावी रैली में कह दिया कि भाजपा ने वंचित और पिछड़े समाज को हरियाणा में आगे बढ़ाया है। ओबीसी वर्ग से आने वाले नायब सैनी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया है। बतौर मोदी, कांग्रेस ने दलितों, पिछड़ों, शोषितों के साथ धोखा किया है। अब कांग्रेस, इन जातियों का आरक्षण खत्म करना चाहती है। 2014 में जब हुड्डा, प्रदेश के सीएम हुआ करते थे, तब ऐसा कोई साल नहीं था, जब दलितों के साथ अन्याय नहीं हुआ। हर कोई जानता था कि दलितों के खिलाफ कांग्रेस पार्टी, खाद-पानी देती है।
शैलजा बोली, वे मुझे प्रचार में नहीं बुलाएंगे
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार में शैलजा का मुद्दा उठा दिया। प्रदेश भाजपा के दूसरे नेताओं ने भी कहना शुरु कर दिया कि कांग्रेस पार्टी एक ही परिवार के व्यक्ति को सीएम बनाना चाहती है। अगर कांग्रेस की सत्ता आती है तो कमजोर वर्ग के व्यक्ति को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाएगा। मौजूदा समय में हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में यह मैसेज दिया गया कि ये चुनाव हुड्डा और भाजपा के बीच है। कांग्रेस का मतलब हुड्डा है। भाजपा के इस प्रचार से कांग्रेस को कुछ नुकसान हुआ। एक तरफ भाजपा, गैर जाटों को अपनी ओर साधने में लगी थी तो दूसरी ओर 'हुड्डा बनाम भाजपा' के जरिए कांग्रेस को पीछे छोड़ने का फार्मूला तैयार कर दिया। शैलजा से जब एक साक्षात्कार में पूछा गया कि क्या आप हुड्डा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार करेंगी। शैलजा ने इस सवाल के जवाब में कहा था कि वे मुझे बुलाएंगे ही नहीं। चुनाव प्रचार के बीच उनका यह बयान एक बार फिर भाजपा के लिए फायदे का सौदा बन गया। पार्टी ने इसे खूब भुनाया। एक अन्य साक्षात्कार में शैलजा ने स्पष्ट तौर से यह कह दिया कि वे विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती थीं। पार्टी के प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया से उनकी कोई बातचीत नहीं होती।
शैलजा फैक्टर के नुकसान की तंवर फैक्टर से भरपाई
प्रदेश में जातीय समीकरण की बात करें तो करीब 25 फीसदी जाट वोटर हैं। जाट समुदाय का रूख कांग्रेस की तरफ बताया गया है। इसके बाद दलित समुदाय की आबादी भी लगभग 20 प्रतिशत है। कांग्रेस ने जाट और दलित वोटरों पर फोकस किया है। लोकसभा चुनाव में पार्टी को इन दोनों वर्गों का समर्थन मिला था। नतीजा, कांग्रेस पार्टी ने दस में से पांच लोकसभा सीटें जीत ली थीं। अब विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने इसी रणनीति पर काम किया है। भाजपा, इस समीकरण का नतीजा जानती थी, लिहाजा उसने कुमारी शैलजा को आगे कर दलित वोटों में सेंध लगाने की योजना बनाई। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, भाजपा को इस रणनीति में कामयाबी भी मिल गई। अब एकाएक वोटिंग की दहलीज पर कांग्रेस ने तंवर को शामिल कर भाजपा की रणनीति पर पानी फेर दिया। कांग्रेस ने भाजपा को उसी की सोशल इंजीनियरिंग से घेर लिया। अब भाजपा को यह कहने का मौका नहीं मिलेगा कि कांग्रेस में दलितों की नहीं सुनी जाती। कांग्रेस ने एक तरीके से शैलजा फैक्टर के नुकसान की तंवर फैक्टर से भरपाई कर दी है।
चुनाव के नतीजे आने के बाद असल खेल
यह बात कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को मालूम चल चुकी थी कि हुड्डा की अथक मेहनत और पार्टी के पक्ष में आए सर्वे के बाद भी चुनाव फंस सकता है। यही वजह रही है कि अशोक तंवर को राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कराई गई। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अब असली खेल चुनाव के नतीजे आने के बाद शुरु होगा। संभव है कि उसमें कुमारी शैलजा के लिए कोई राजनीतिक जोखिम दिखाई पड़े। अभी उन्होंने सोनिया गांधी से भी मुलाकात की है। इसके मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं।
किसी के लिए तो जोखिम होगा ही
अशोक तंवर की एंट्री से कांग्रेस को उम्मीद है कि अब दलित वोटर नाराज नहीं होगा। वह कांग्रेस के पक्ष में मतदान करेगा। कांग्रेस पार्टी अपने बेहतर प्रदर्शन को लेकर इस बार कुछ ज्यादा ही आशान्वित है। पार्टी के इंटरनल सर्वे की रिपोर्ट और टिकटों का सटीक बंटवारा, ये सब पहले से ही कांग्रेस पार्टी की मजूबत स्थिति की तरफ इशारा कर रहा था। अब शैलजा एवं दलित फैक्टर का तोड़ भी निकाल लिया गया है। इन सबके बीच सियासतदानों और कार्यकर्ताओं में ऐसी चर्चा भी चल रही है कि क्या हरियाणा में 'हुड्डा', 2005 की तरह 'भजनलाल' तो नहीं बन जाएंगे। 2005 के विधानसभा चुनाव में चौ. भजनलाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। कांग्रेस ने 67 सीट हासिल कर प्रचंड बहुमत हासिल किया, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने अचानक एक ऐसा फैसला किया, जिसने सबको हैरान कर दिया। भूपेंद्र हुड्डा, चुनाव में जिनका कहीं नाम नहीं था, उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया गया। इस बार भी कांग्रेस पार्टी हरियाणा में मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, इस बाबत पत्ते नहीं खोल रही है। अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो संभव है कि डिप्टी सीएम के एक या दो पद दिखाई पड़ें।