किसान आंदोलन से निपटने में भी वही रणनीति
तीन नए कृषि कानूनों को लेकर किसान संगठनों में भारी नाराजगी है। किसान इन्हें पूरी तरह से वापस लेने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। यह आंदोलन पंजाब और हरियाणा के विभिन्न इलाकों में काफी समय से चल रहा था, लेकिन जब किसानों को लगा कि इससे बात नहीं बनेगी तो उन्होंने 26-27 नवंबर 2020 को दिल्ली कूच कर दिया। किसानों ने जगह-जगह दिल्ली बॉर्डर सील कर दिया और सड़कों पर ही धरना-प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। लगभग 10 महीने बीत जाने के बाद भी यह धरना अभी भी जारी है और लोगों को आवाजाही में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
इसी बीच किसान संगठनों के विरोध का तरीका समय के साथ और अधिक उग्र होता जा रहा है। किसानों ने अब केवल धरना-प्रदर्शन तक अपने-आपको सीमित नहीं रखा है। वे विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में भाजपा के बहिष्कार की भी अपील कर रहे हैं। किसानों का एलान है कि भाजपा नेताओं को उनके क्षेत्रों में प्रवेश का हर हाल में विरोध करेंगे और उन्हें चुनाव प्रचार नहीं करने देंगे।
03 अक्टूबर 2021 को लखीमपुर खीरी में जो घटना घटी, वह किसानों के इसी विरोध प्रदर्शन के तरीके का परिणाम बताया जा रहा है। अनेक लोगों का मानना है कि यदि सरकार ने किसानों की समस्याओं का सलाह-मशविरा से कोई हल निकालने की कोशिश की होती या किसानों को सड़कों से हटाने का कोई ठोस उपाय किया होता, तो लखीमपुर खीरी की घटना न घटती जिसमें आठ लोगों की जान चली गई।
कड़े कदम क्यों नहीं उठा रही सरकार
शाहीन बाग से लेकर किसानों के आंदोलन तक में केंद्र सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर कोई सीधी कार्रवाई न करने की अपनी नीति बरकरार रखी है। केंद्र सरकार ने आंदोलनों से निपटने की यह रणनीति क्यों अपनाई है? इस सवाल के जवाब में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम यह बात बखूबी जानते हैं कि इन आंदोलनों के पीछे विपक्ष खड़ा है। विपक्ष चाहता है कि केंद्र सरकार इन प्रदर्शनकारियों पर सख्त कार्रवाई करे, जिससे उन्हें जनता के बीच सरकार को बदनाम करने का अवसर मिले। लेकिन हम किसी भी कीमत पर देश के किसानों या किसी अन्य पर केवल विरोध प्रदर्शन के कारण बल प्रयोग नहीं करना चाहते।
उन्होंने कहा कि ये दोनों ही बड़े आंदोलन बिना ठोस कारणों के हुए। नागरिकता संशोधन कानून में किसी वर्ग के नागरिकता के जाने का कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन इसके बाद भी लोगों को भड़काया गया और वे सड़कों पर उतरे। इसी प्रकार नये कृषि कानून में कहीं भी किसानों की जमीन बंधक रखने का कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन किसान नेता-विपक्ष बार-बार यही आरोप लगा रहे हैं कि इस कानून से किसानों की जमीन चली जाएगी। ऐसे में अब जनता को ही समझना पड़ेगा कि वह किसी बहकावे में आकर झूठे मामलों का समर्थन बंद करे। उन्होंने कहा कि इस रणनीति से इन मुद्दों के प्रति जनता के बीच गंभीर बहस होती है। सरकार चाहती है कि लोग सच समझें।
नेता के मुताबिक़, यदि सर्वोच्च न्यायलय लोगों के प्रदर्शन करने के लोकतांत्रिक अधिकार को बनाये रखने की बात कह सकता है तो उसे सड़क पर चलने वाले लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए भी सोचना चाहिए और इस संदर्भ में स्पष्ट आदेश पारित करना चाहिए। सरकार कोर्ट के आदेशों का पालन करेगी।