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रणनीति: जन आंदोलनों से निपटने में केंद्र की गांधीगिरी कितनी सही, कठोर कदम उठाने से क्यों बच रही है सरकार

सार

लखीमपुर खीरी में जो घटना घटी, वह किसानों के विरोध प्रदर्शन के तरीके का परिणाम बताया जा रहा है। अनेक लोगों का मानना है कि यदि सरकार ने किसानों की समस्याओं का सलाह-मशविरा से कोई हल निकालने की कोशिश की होती या किसानों को सड़कों से हटाने का कोई ठोस उपाय किया होता, तो यह घटना न घटती...
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मोदी सरकार में जन आंदोलन - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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जन आंदोलनों से निपटने के मामले में केंद्र सरकार ने अब तक बेहद लचीला रुख अपनाया है। महीनों तक लंबे चले आंदोलनों में भी सरकार सीधे तौर पर कोई कार्रवाई करने से बचती रही है। इन आंदोलनों के कारण लंबे समय तक लोगों को परेशानी होने के बाद भी केंद्र ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इसके बाद की उपजी परिस्थितियों में कही दंगे भड़के तो कहीं टकराव हुआ और इनमें अनेक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। ऐसे में सवाल यह है कि सरकार कोई सख्त कदम उठाने से बच क्यों रही है?  

शाहीन बाग आंदोलन

सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस (NRC) के विरोध में शाहीन बाग का आंदोलन 15-16 दिसंबर 2019 को शुरू हुआ। यह आंदोलन 24 मार्च 2020 तक चला। इस दौरान आंदोलनकारियों ने दक्षिणी दिल्ली के जमिया नगर की एक मुख्य रोड को ब्लॉक कर दिया। इससे नोएडा-दिल्ली के संपर्क का मुख्य मार्ग अवरुद्ध हुआ और प्रतिदिन लाखों छात्रों, नौकरीपेशा लोगों और व्यवसायियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।

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स्थानीय लोगों में इस प्रदर्शन के विरुद्ध भारी प्रतिक्रिया हुई। रोड खाली कराने को लेकर कई बार प्रदर्शनकारियों और स्थानीय लोगों के बीच मामला हिंसक होते-होते बचा। ये मामला सर्वोच्च अदालत की चौखट तक जा पहुंचा। अदालत ने प्रदर्शन के अधिकार को बरकरार रखने के बाद भी यह स्पष्ट टिप्पणी की कि एक सार्वजनिक रोड को अनंतकाल तक के लिए बंद करके नहीं रखा जा सकता। लोगों की नाराजगी और सर्वोच्च न्यायालय की स्पष्ट टिप्पणी के बाद भी केंद्र सरकार ने शाहीनबाग से प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए किसी भी तरह की सख्त कार्रवाई नहीं की। इसी बीच ये आंदोलन शाहीन बाग से शुरू होकर दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में फैल गया।  

सामान्य तौर पर इस तरह की परिस्थितियों में सरकारें आरपीएफ, सीआरपीएफ जैसे अर्धसैनिक बलों के जरिए लाठीचार्ज, आंसूगैस छोड़ने जैसे हल्के बल प्रयोग के तरीकों से प्रदर्शनकारियों को हटाने का काम करती रही हैं। लेकिन भाजपा की अगुवाई वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने शाहीन बाग से आंदोलनकारियों को हटाने में कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की।
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माना जाता है कि आंदोलनकारियों पर सीधे कार्रवाई करने से बचने की सरकार की नीति का ही परिणाम हुआ कि पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद इलाके में, जहां प्रदर्शनकारी महीनों से मुख्य सड़क पर कब्जा करके धरना दे रहे थे, 23-24 फरवरी 2020 को आंदोलनकारियों और स्थानीय लोगों में टकराव बढ़ गया और दिल्ली में दंगे भड़क गए। इन दंगों में दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक 53 लोगों की जान चली गई। लगभग 550 लोग गंभीर रूप से घायल हुए और अरबों की संपत्ति दंगाइयों ने जलाकर राख कर दी।

माना जाता है कि यदि केंद्र सरकार ने इन प्रदर्शनकारियों को समय रहते सड़कों से हटाने का काम किया होता तो ये दंगे न भड़कते, और इनमें इतनी जानें न जातीं।

किसान आंदोलन से निपटने में भी वही रणनीति

तीन नए कृषि कानूनों को लेकर किसान संगठनों में भारी नाराजगी है। किसान इन्हें पूरी तरह से वापस लेने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। यह आंदोलन पंजाब और हरियाणा के विभिन्न इलाकों में काफी समय से चल रहा था, लेकिन जब किसानों को लगा कि इससे बात नहीं बनेगी तो उन्होंने 26-27 नवंबर 2020 को दिल्ली कूच कर दिया। किसानों ने जगह-जगह दिल्ली बॉर्डर सील कर दिया और सड़कों पर ही धरना-प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। लगभग 10 महीने बीत जाने के बाद भी यह धरना अभी भी जारी है और लोगों को आवाजाही में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

इसी बीच किसान संगठनों के विरोध का तरीका समय के साथ और अधिक उग्र होता जा रहा है। किसानों ने अब केवल धरना-प्रदर्शन तक अपने-आपको सीमित नहीं रखा है। वे विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में भाजपा के बहिष्कार की भी अपील कर रहे हैं। किसानों का एलान है कि भाजपा नेताओं को उनके क्षेत्रों में प्रवेश का हर हाल में विरोध करेंगे और उन्हें चुनाव प्रचार नहीं करने देंगे।

03 अक्टूबर 2021 को लखीमपुर खीरी में जो घटना घटी, वह किसानों के इसी विरोध प्रदर्शन के तरीके का परिणाम बताया जा रहा है। अनेक लोगों का मानना है कि यदि सरकार ने किसानों की समस्याओं का सलाह-मशविरा से कोई हल निकालने की कोशिश की होती या किसानों को सड़कों से हटाने का कोई ठोस उपाय किया होता, तो लखीमपुर खीरी की घटना न घटती जिसमें आठ लोगों की जान चली गई।
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कड़े कदम क्यों नहीं उठा रही सरकार

शाहीन बाग से लेकर किसानों के आंदोलन तक में केंद्र सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर कोई सीधी कार्रवाई न करने की अपनी नीति बरकरार रखी है। केंद्र सरकार ने आंदोलनों से निपटने की यह रणनीति क्यों अपनाई है? इस सवाल के जवाब में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम यह बात बखूबी जानते हैं कि इन आंदोलनों के पीछे विपक्ष खड़ा है। विपक्ष चाहता है कि केंद्र सरकार इन प्रदर्शनकारियों पर सख्त कार्रवाई करे, जिससे उन्हें जनता के बीच सरकार को बदनाम करने का अवसर मिले। लेकिन हम किसी भी कीमत पर देश के किसानों या किसी अन्य पर केवल विरोध प्रदर्शन के कारण बल प्रयोग नहीं करना चाहते।

उन्होंने कहा कि ये दोनों ही बड़े आंदोलन बिना ठोस कारणों के हुए। नागरिकता संशोधन कानून में किसी वर्ग के नागरिकता के जाने का कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन इसके बाद भी लोगों को भड़काया गया और वे सड़कों पर उतरे। इसी प्रकार नये कृषि कानून में कहीं भी किसानों की जमीन बंधक रखने का कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन किसान नेता-विपक्ष बार-बार यही आरोप लगा रहे हैं कि इस कानून से किसानों की जमीन चली जाएगी। ऐसे में अब जनता को ही समझना पड़ेगा कि वह किसी बहकावे में आकर झूठे मामलों का समर्थन बंद करे। उन्होंने कहा कि इस रणनीति से इन मुद्दों के प्रति जनता के बीच गंभीर बहस होती है। सरकार चाहती है कि लोग सच समझें।  

नेता के मुताबिक़, यदि सर्वोच्च न्यायलय लोगों के प्रदर्शन करने के लोकतांत्रिक अधिकार को बनाये रखने की बात कह सकता है तो उसे सड़क पर चलने वाले लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए भी सोचना चाहिए और इस संदर्भ में स्पष्ट आदेश पारित करना चाहिए। सरकार कोर्ट के आदेशों का पालन करेगी।
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