मैं नवोदय विद्यालय भिंड में कक्षा 7 का छात्र था,उस समय हिंदी पाठ्य पुस्तक में एक कविता पढ़ाई गयी थी, "छुप छुप अश्रु बहाने वालो,जीवन व्यर्थ लुटाने वालो, कुछ सपनो के मर जाने से जीवन नही मरा करता है, कविता से पहले कवि परिचय भी लिखा था, गोपाल दास नीरज, जी हां, नीरज जी की जीवनी में जब ये लिखा पाया कि उनका जन्म इटावा में हुआ था, तो ये पढ़कर 13 वर्ष की आयु मे ही मेरे अंदर इटावा को लेकर गर्व की और स्वयं के अंदर एक आत्मविश्वास की अनुभूति हुई, उस समय कभी सोचा भी नही था कि हिंदी कविता के इस तपस्वी महामानव के साथ मंच पर मैं भी कविता पढ़ सकूंगा।
शायद ये नीरज जी की इन्ही पंक्तियों का असर था जिसने मेरे अंदर संघर्ष करने की प्रेरणा जगाई, कक्षा आठवीं से ही जब मैंने कविताएं लिखना शुरू किया तो नीरज जी और उनके नाम के साथ लिखा इटावा सदैव मेरे मन मस्तिष्क में रहा, सन 2005 में वो समय भी आया जब सैफई महोत्सव में पहली बार मंच पर नीरज जी के चरण छूने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके सम्मुख मंच पर नवोदित कवि के रूप में काव्यपाठ भी किया, उन्होंने अपने पास बुलाया और मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा "इटावे का नाम रोशन करोगे।"
तब से लेकर अब तक दर्जन भर मंचो पर नीरज जी का आशीष मिलता रहा, सूफियाना फितरत, अल्हण दृष्टिकोण और मदिर मंदिर गीतों की बरसात में स्नान करता रहा, नीरज जी के साथ मंच पर कविता पढ़ना हर बार किसी राष्ट्रीय सम्मान से कम नही लगा, नीरज जी से आखिरी मुलाकात आगरा के एक मंच पर 2 वर्ष पूर्व हुई। कहीं से उन्हें पता चला कि मैं सामायिक मुद्दों पर ठीक ठाक लिखने लगा हूं, तो इस बात पर पुनः आशीर्वाद दिया,बस तबसे जब जब नीरज जी का स्मरण होता था। मोबाइल के इंटरनेट ब्राउजर पर जाकर नीरज जी के फिल्मी गीत ढूंढना और पढ़कर-सुनकर कवि मन की तृप्ति करना एक चलन बन गया। नीरज जी ने सिर्फ शरीर त्यागा है, वो सदैव कविता जगत में जीवित है और रहेंगे।
मैं कतई नही मानता कि नीरज जी हमारे बीच नही रहे, वो तो हिंदी के माथे की बिंदी बनकर सदैव के लिये काव्य जगत का अमिट श्रृंगार बनकर अमर रहेंगे "मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य, नीरज जी के दोहे की ये पंक्ति हर कवि को अहसास कराती रहेगी कि यह सौभाग्य दैवीय होता है, जिसने पा लिया वो नीरज हो गया।
श्रद्धांजलि
कवि गौरव चौहान
इटावा उ.प्र.