पणजी गोवा में करिश्माई नेता कहे जाने वाले मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद उनकी गैर-मौजूदगी में पहली बार हो रहा विधानसभा चुनाव दिलचस्प हो गया है। भाजपा के खिलाफ चल रही 10 साल की सत्ता विरोधी लहर की पतवार पर सभी विपक्षी पार्टियां सवार हैं। कांग्रेस गोवा की सत्ता में फिर से आने की जुगत में है। वहीं भाजपा के लिए विपरीत दिशा में भी नैया को पार लगाने की चुनौती है। भाजपा के सूरमा गोवा में तीसरी बार चमत्कार को उम्मीद में हैं।
गोवा में भाजपा ने कांग्रेस के बड़े नेताओं को अपने पाले में कर एकराज स्थापित करने का सपना देखा था। लेकिन भाजपा के ही विधायक और मंत्री रहे माइकल लोबो और कई अन्य पदाधिकारियों के पाला बदलने से पूरा चुनावी समीकरण बदल गया है। पूर्व सीएम मनोहर पर्रिकर के बेटे ने निर्दलीय ताल ठोकी है तो एक भाजपा प्रत्याशी बाबू कवड़ेकर की पत्नी सवित्ता कवड़ेकर उम्मीदवारी नहीं मिलने पर निर्दलीय मैदान में कूद पड़ी हैं।
गोवा की 40 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी) से गठबंधन किया है। कांग्रेस 37 तो जीएफपी 3 सीटों पर लड़ रही है। भाजपा ने पहली बार सभी 40 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। 12 सीटों पर अल्पसंख्यक ईसाई उम्मीदवारों पर दांव खेला है।
यह है सामाजिक समीकरण
गोवा में हिंदुओं की आबादी 66 फीसदी है जबकि इसाई मतदाताओं की 25 प्रतिशत, मुस्लिम आबादी 8 फीसदी के करीब बताई जाती है। प्रदेश के अल्पसंख्यक मतदाता कांग्रेस की ताकत रहे हैं। लेकिन दिवंगत भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर ने इस तानेबाने को तोड़कर भाजपा के लिए नई राह तैयार की थी। इसी समीकरण की बदौलत 2012 में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। उस समय भाजपा ने 6 इसाई उम्मीदवार उतारे थे और सभी ने जीत दर्ज की थी। इसी तरह साल 2017 में भाजपा के 7 इसाई उम्मीदवार जीते थे। यही वजह है कि पार्टी में नाराजगी के बावजूद इस बार भाजपा ने 12 इसाई उम्मीदवारों पर दांव लगाया है।
मौन मतदाताओं ने बढ़ाई धड़कन
अधिकांश सीटों पर मतदाताओं ने चुप्पी साथ रखी है। यहां साइलेंट वोटर नई सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे। पत्रकार एग्नेलो परेरा कहते हैं कि सूबे में कांग्रेस और भाजपा बीच इस बार भी सीधी लड़ाई दिख रही है। लेकिन हर सीट के समीकरण बदले हुए हैं। निःसंदेह भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है जिसे कांग्रेस भुनाने का भी प्रयास कर रही है।