अगर पित्ताशय कैंसर की पहली स्टेज में पहचान होती है तो मरीज इलाज के बाद ज्यादा लंबी आयु जी सकता है। हाल में देश के 10 बड़े अस्पतालों ने मिलकर किए शोध के बाद यह दावा किया है।
दिल्ली एम्स, चंडीगढ़ पीजीआई और लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञ भी शोध टीम का हिस्सा हैं। राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री में पंजीकृत कुल 2,262 मरीजों पर जब शोधकर्ताओं ने अध्ययन शुरू किया तो पता चला कि 91.2% मरीजों में एडेनोकार्सिनोमा सबसे आम हिस्टोलॉजिकल प्रकार है। यह तब होता है जब शरीर के अंदर म्यूकस बनाने वाली ग्रंथियों से कोशिकाएं बनने लगती हैं। इतना ही नहीं, पित्ताशय कैंसर के अगर सबसे आम माध्यमिक क्षेत्र की बात करें तो 76.80 फीसदी मरीजों में यह क्षेत्र लिवर पाया गया है। इससे पता चलता है कि लिवर से जुड़ी पित्ताशय कैंसर के मामले ही सबसे ज्यादा हैं।
ऑपरेशन और कीमोथेरेपी आम उपचार
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर पेट में दर्द या अन्य लक्षणों की समय पर जांच होती है तो कैंसर का पता समय पर लगाया जा सकता है जिसके आधार पर मरीज के ज्यादा जीवन की उम्मीद कर सकते हैं। इस अध्ययन में यह देखा गया कि चौथी स्टेज वाले रोगियों की तुलना में पहली स्टेज के मरीज इलाज के बाद दो वर्ष तक जीवित रहे। कैंसर की पहचान के बाद ऑपरेशन और कीमोथेरेपी सबसे आम उपचार विकल्प हैं।
महिलाएं कम उम्र में हो रहीं पित्ताशय कैंसर की शिकार
नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने जारी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में पित्ताशय का कैंसर पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कम उम्र में हो रहा है। एक तरफ पुरुषों में यह बीमारी 55 से 59 साल की आयु में हो रही है तो महिलाओं में यह औसतन 45 से 49 साल की उम्र में दिखाई दे रही है। आईसीएमआर ने यह भी बताया है कि इस अध्ययन को लेकर टास्क फोर्स की विशेषज्ञ समिति ने 10 जनवरी 2022 और 10 फरवरी 2023 को अलग अलग बैठक में सभी परिणामों की समीक्षा की है जिसके बाद देश में पित्ताशय कैंसर को लेकर यह स्थिति सामने आई है।
80% लोग तीसरी-चौथी स्टेज में पहुंचते हैं अस्पताल
शोधकर्ताओं को यह भी पता चला कि देश में पित्ताशय कैंसर के मामले स्टेज तीन या चार में ही पता चल रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? इसके बारे में जानकारी नहीं है लेकिन 2,262 मरीजों में से 56.8% स्टेज चार और 23.80% स्टेज तीन में अस्पताल पहुंचे हैं। इन दोनों को मिलाकर 80% यानी 10 में से आठ मरीज अस्पताल तब पहुंचे जब उनका कैंसर स्टेज तीन या चार में था। इस स्थिति में मरीजों की मृत्यु दर भी काफी अधिक है। स्टेज तीन के रोगियों में यह 26.5 और स्टेज चार के रोगियों में 40.3% तक पाई गई। इन दोनों को मिलाकर 10 में से सात की उपचार के दौरान ही मौत हुई।