शीर्ष अदालत ने कहा, वास्तव में सरकार के वकील का कर्तव्य और दायित्व था कि वह अदालत के एक अधिकारी के रूप में कार्य करे और सही निष्कर्ष पर पहुंचने में अदालत की मदद करे।
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार के वकील के मुस्लिम महिला, बेटी की भरण-पोषण याचिका का विरोध करने पर हैरानी जताते हुए कहा, यह अजीब बात है। महिला ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अपने व नाबालिग बेटी के लिए पति से भरण-पोषण की मांग की थी। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा, हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि राज्य के वकील ने पति का मामला उठाया है।
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पीठ ने कहा, वास्तव में सरकार के वकील का कर्तव्य और दायित्व था कि वह अदालत के एक अधिकारी के रूप में कार्य करे और सही निष्कर्ष पर पहुंचने में अदालत की मदद करे। पीठ ने निर्देश दिया कि यह आदेश उत्तर प्रदेश के गृह और कानून विभाग के सचिवों को भेजा जाएगा। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार उन वकीलों को दोषी नहीं ठहराएगी या दंडित नहीं करेगी जिन्होंने इस अदालत के समक्ष इसका प्रतिनिधित्व किया।
फैमिली कोर्ट ने 20 मार्च, 2021 के आदेश से अपीलकर्ताओं के आवेदन को स्वीकार किया और प्रति माह 12,000 रुपये का रखरखाव प्रदान किया। अपीलकर्ता और उसके पति ने पुनरीक्षण आवेदन दाखिल किया। हाईकोर्ट ने 26 अगस्त, 2021 को अपीलकर्ता महिला को सुने बिना ही गुजारा भत्ता में 2,000 रुपये प्रति माह की कटौती कर दी।