महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख और पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह के बीच चल रहे झगड़े ने पुलिस व्यवस्था को हिलाकर कर रख दिया है। सियासतदानों के बीच पुलिस भी सवालों के घेरे में है। आईबी में लंबे समय तक रहे पूर्व आईपीएस प्रदीप कुमार भारद्वाज ने सवाल के लहजे में कहा, पुलिस सुधारों को लेकर धर्मवीर कमीशन की रिपोर्ट अभी तक क्यों नहीं लागू की गई।
आयोग ने 1978 में रिपोर्ट दे दी थी, मगर सियासतदान उसे लागू करने से डरते रहे। वह रिपोर्ट आज भी फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई, आखिर क्यों? वजह, उस रिपोर्ट में पुलिस के टॉप पदों पर होने वाली नियुक्तियों और तबादलों में राजनेताओं का हस्तक्षेप खत्म करने की बात कही गई थी। पुलिस अफसरों की नियुक्ति एवं तबादला निष्पक्ष तरीके से हो, वह प्रक्रिया पूरी तरह गैर-राजनीतिक रहे और अवसरवादिता का भाव खत्म हो जाए, कमीशन की रिपोर्ट ऐसा ही कुछ कह रही थी।
दूसरा, 1861 में अंग्रेजी शासन के दौरान बने इंडियन पुलिस एक्ट में लिख दिया कि कोर्ट ऑफ लॉ में पुलिस का बयान स्वीकार्य नहीं होगा। उस वक्त खत्म किया गया पुलिस का भरोसा आज तक वापस नहीं लौट सका। जब अविश्वास है तो मुंबई पुलिस जैसे काम तो होंगे ही।
बतौर प्रदीप भारद्वाज, मुंबई पुलिस की घटना ठीक नहीं है। ये पूरे सिस्टम को खराब कर सकती है। दुख की बात ये है कि इसे कोई रोक नहीं रहा है। सियासतदान एवं पुलिस के बीच गठजोड़ जैसे अपवित्र शब्द सामने आने लगते हैं। इस व्यवस्था में आईपीएस लीडरशिप को भी अपनी प्रभावी भूमिका निभानी चाहिए।
भारद्वाज ने कहा, मेरा भी एक सवाल है। ये एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहां से आते हैं। ये क्यों पनपते हैं। इसके पीछे भी कारण है। मौजूदा सिस्टम में सामान्य आदमी को न्याय मिलने में देरी होती है। उसकी कहीं सुनवाई नहीं होती। बीस-पच्चीस साल तक केस लटकता रहता है। ऐसे ही वक्त में दया नायक, सचिन वाजे और राजबीर सिंह जैसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के नाम सामने आते हैं। वे बहुत जल्द चर्चित भी हो जाते हैं।
न्याय देरी से मिलने की इस व्यवस्था में पीड़ित खुद ऐसे स्पेशलिस्ट को ढूंढता है। उसका मकसद होता है कि मामला जल्द से जल्द सुलझ जाए। ऐसे में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का रोल समझा जा सकता है। बाद में यही रोल छोटे स्तर से उठकर सियासतदानों के दरबार तक चला जाता है। नतीजा, मुंबई पुलिस का केस आज सामने है। जब न्याय मिलने में देरी होती है तो ही ऐसा सिस्टम जन्म लेता है।
इंडियन पुलिस एक्ट में 160 साल पहले लिख दिया गया कि कोर्ट में पुलिस के बयान पर भरोसा नहीं करना है। वह आज तक यूं ही चला आ रहा है। उस समय तो अंग्रेज थे। उन्होंने अपने राजकाज को सुगम बनाने के लिए ऐसा एक्ट बनाया था। छोटे पुलिस कर्मियों की गवाही उनके लिए मुसीबत न बने, इसलिए वह एक्ट बना दिया गया। आज भी उस एक्ट में पुलिस अविश्वनीय है। जब इस तरह का अविश्वास है तो आप मुंबई जैसे केस नहीं रोक सकते। ये आगे भी आएंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं।
बतौर प्रदीप भारद्वाज, 'आर्ट ऑफ पुलिसिंग' का एक मतलब होता है। 'ए' का अर्थ है, कानून के प्रति उत्तरदायी होना। हमारे सिस्टम में इसका दूसरा पहलू देखने को मिलता है। जूनियर अपने सीनियर के प्रति उत्तरदायी होता है। सीनियर अपने बॉस के प्रति और बॉस अपने शीर्ष अधिकारी की तरफ देखकर काम करता है। टॉप बॉस, मंत्री या सरकार के प्रति उत्तरदायी रहता है। जब एनआईए और सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों में राज्य पुलिस से बड़े स्तर पर अधिकारी आते हैं तो उसके बावजूद राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं किया जाता।
मामले की जांच केंद्रीय एजेंसियों को सौंप दी जाती है। कोई ये कहने लगता है कि मेरे राज्य का केस है, इसलिए उसे बाहरी एजेंसी को क्यों सौंपा जाए। यहां भी भरोसे की बात आ जाती है। अगर एनआईए, सीबीआई, ईडी और राज्यों की पुलिस केवल एक बात का ध्यान रखे कि उन्हें कानून के प्रति उत्तरदायी रहना है तो वे सब बराबर हो जाएंगी। उसके बाद कोई यह नहीं कहेगा कि फलां केस की जांच केंद्रीय एजेंसी से कराओ।
दूसरा अक्षर होता है 'आर'। इसका मतलब है, केवल जनता के प्रति जिम्मेदार रहना। यहां भी सोच बदल गई। पुलिस महकमा अपनी 'सेवा' को भूलकर सत्ता में बैठे लोगों को मालिक समझने लगता है। सत्ता में बैठे लोग धर्मवीर आयोग की रिपोर्ट लागू करने से डरते हैं। उन्हें मालूम है कि इसके बाद उनका पुलिस व्यवस्था में हस्तक्षेप खत्म हो जाएगा। इस आयोग की सिफारिशों में साफतौर पर लिखा है कि टॉप पुलिस लीडरशिप का चयन राजनेताओं के द्वारा न हो। उनकी नियुक्ति निष्पक्ष एवं गैर-राजनीतिक तरीके से की जाए।
तीसरा अक्षर है 'टी' यानी ट्रांसपेरेंसी। जनता को पुलिस के कामकाज पर पूरा भरोसा होना चाहिए। कौन से केस की जांच कहां तक पहुंची है, पीड़ित को ये सब जानने का अधिकार है। उसे यह विश्वास होगा कि पुलिस केवल कानून के मुताबिक काम करेगी तो वह पुलिस का दोस्त बनकर मदद करेगा। सच्चाई ये है कि कई जगहों पर तो पुलिस अधिकारी से मिलना ही सामान्य लोगों के लिए मुश्किल भरा कार्य है। पुलिस में निचले स्तर से लेकर जब टॉप लेवल तक 'एआरटी' यानी उत्तरदायित्व, जिम्मेदारी और पारदर्शिता रहेगी तो लोगों का भरोसा जीतने में देर नहीं लगेगी।