मुंबई पुलिस के पूर्व आयुक्त परमबीर सिंह के प्रदेश के गृह मंत्री अनिल देशमुख पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर राजनीति गर्मा गई है। इस मुद्दे पर भाजपा, शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बीच घमासान मचा है। आईबी के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर एवं कैबिनेट सचिवालय में सेक्रेटरी 'सिक्योरिटी' के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद का कहना है, अगर इस केस की सच्चाई तक पहुंचना है तो उसके लिए परमबीर सिंह के तबादले के बाद गृह मंत्री अनिल देशमुख को इस्तीफा दे देना चाहिए। जब ये दोनों अपने पद से दूर रहेंगे तो ही केस की निष्पक्ष जांच संभव है। बेहतर होगा कि यह जांच न्यायपालिका की निगरानी में हो। इस केस में 'हत्या-निलंबन-सियासी' गठजोड़ को समझ कर आगे कदम रखना होगा।
पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद कहते हैं, मुंबई पुलिस को साथ लेकर गलत काम कराने जैसे आरोप राजनेताओं पर बहुत पहले से आरोप लगते आ रहे हैं। टॉप लीडरशिप, वह चाहे आईपीएस की हो या सियासी दलों की, दोनों के व्यवस्थापकों के बीच एक अपवित्र गठजोड़ बना रहता है। यही वजह है कि मुंबई पुलिस के इस केस की जांच न्यायपालिका की निगरानी में होना जरूरी है। पूर्व सीपी परमबीर सिंह ने आखिर पद से हटने के बाद ही जुबान क्यों खोली, इस सवाल के जवाब में यशोवर्धन आजाद ने कहा, ये बहुत से मामलों में होता है।
किसी विभाग में कोई अधिकारी रिटायर होने के बाद कुछ खुलासा करता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। उस समय तक केस से जुड़े अनेक सबूत खत्म हो जाते हैं। हालांकि इस केस में ऐसा नहीं है। सारी बातें एक माह पहले की हैं। पूर्व सीपी परमबीर सिंह ने सभी तथ्यों के साथ सबूत पेश किए हैं। परमबीर सिंह ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट सचिन वाजे और गृह मंत्री अनिल देशमुख के बीच हुई मुलाकात का समय और तिथि भी बताई है। सरकार के पास ठोस तथ्य मौजूद हैं।
बतौर आजाद, अगर केस की जांच या आरोपों का लगाया जाना, ये सब कुछ माह बाद सामने आता तो कह सकते थे कि तथ्यों का वजन कम हो जाता। जांच का तरीका बदल सकता था। सबूत नष्ट करने का प्रयास, ये सामान्य सी बात है।
सवाल ये भी उठता है कि सचिव वाजे को वापस कौन लाया था। उसकी वापसी की वजह क्या रही है, यह भी जांच का विषय है। पुलिसकर्मी पर मर्डर का आरोप है, वह निलंबित है और उसका सियासी गठजोड़ भी है, ये बातें सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर रही हैं। इसमें आईएएस अधिकारी भी रहेंगे होंगे, जिनके यहां से सचिन वाजे को बहाल करने वाली फाइल गुजरी होगी। उसमें आईपीएस का भी हाथ रहा होगा। उसके बाद वाजे की फाइल को राजनीतिक स्तर पर अनुमोदन मिला होगा। सचिन वाजे केस में मर्डर, निलंबन और सियासी गठजोड़, ऐसे कई आरोप हैं। इन सभी ने पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुंबई में लंबे समय से पुलिस का इस्तेमाल कर गलत काम हो रहे हैं। कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बतौर आजाद, ऐसा क्यों होता है कि मुंबई के कुछ ‘बार’ तो सुबह चार बजे तक चलते हैं, बाकी आधी रात को बंद हो जाते हैं। कई ऐसी भी होंगे, जिन्हें तय समय पर खुलने में भी परेशानी आ रही होगी। इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
म्युनिसिपल कमेटी, एक्साइज विभाग और पुलिस, इन तीनों ने मिलकर मुंबई में एक नई परिभाषा तैयार कर दी है। अभी तक हम 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को सुनते आ रहे हैं। इसमें कारोबार सुगमता के साथ हो सके, इसके लिए कई तरह के पैमाने बनाए गए हैं। इनमें लेबर रेगुलेशन, ऑनलाइन सिंगल विंडो, सूचनाओं तक पहुंच और पारदर्शिता इत्यादि शामिल है।
दूसरी तरफ मुंबई में ईज ऑफ डूइंग लूट, चालू है। इसके लिए सरकार को आगे आना होगा। अफसरों को भी समय रहते अपनी बात रखनी पड़ेगी, नहीं तो परमबीर सिंह, अनिल देशमुख और सौ करोड़, ये आरोप आगे भी लगते रहेंगे।