इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड (आईसीपीएफ) की ओर से जारी शोध पत्र में कहा गया कि फास्ट ट्रैक स्पेशल अदालतों में 31 जनवरी तक देश में दो लाख से अधिक मामले लंबित है। साथ ही दावा किया गया कि इन मामलों के निपटारे में लगभग नौ वर्ष से अधिक समय लगेगा। अरुणाचल प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पॉक्सो के लंबित मामलों के निपटारे में 25 से ज्यादा वर्ष तक का समय लग सकता है। दावा किया गया कि 2022 में पॉक्सो के सिर्फ तीन फीसदी मामलों में सजा सुनाई गई है।
आईसीपीएफ की ओर से जारी शोध पत्र में कहा गया कि मौजूदा हालात के मद्देनजर जनवरी, 2023 तक के पॉक्सो के लंबित मामलों के निपटारे में अरुणाचल प्रदेश को 30 वर्ष लग जाएंगे, जबकि दिल्ली को 27, पश्चिम बंगाल को 25, मेघालय को 21, बिहार को 26 और उत्तर प्रदेश को 22 वर्ष लगेंगे।
विशेष अदालतें लक्ष्य को हासिल करने में विफल
शोध पत्र के मुताबिक, प्रत्येक फास्ट ट्रैक स्पेशल अदालत ने साल भर में औसतन सिर्फ 28 मामलों का निपटारा किया। प्रत्येक विशेष अदालत से हर तिमाही 41-42 और साल में कम से कम 165 मामलों के निपटारे की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन आंकड़ों से लगता है कि गठन के तीन साल बाद भी ये विशेष अदालतें अपने तय लक्ष्य को हासिल करने में विफल रही हैं।
बाल विवाह बच्चों के साथ एक तरह का दुष्कर्म
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए शोधपत्र के अनुसार, बाल विवाह बच्चों के साथ एक तरह का दुष्कर्म है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि देश में रोजाना 4,442 नाबालिग लड़कियों को शादी के बंधन में बांध दिया जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट कहती है कि देश में बाल विवाह के रोजाना सिर्फ तीन मामले दर्ज होते हैं।
बता दें फास्ट ट्रैक स्पेशल अदालतों की स्थापना 2019 में की गई थी। भारत सरकार ने हाल ही में केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में इसे 2026 तक जारी रखने के लिए 1900 करोड़ रुपए की बजटीय राशि के आंवटन को मंजूरी दी है। अदालतों में आए कुल 2,68,038 मुकदमों में से महज 8,909 मुकदमों में ही अपराधियों को सजा सुनाई जा सकी है।