नेताओं का उदय तो हुआ, मगर किसान वहीं पर रहा
किसान एकता के फलस्वरूप नेताओं का उदय तो हुआ, मगर किसान की उपेक्षा जारी रही। फसलों के दामों को लेकर किसान के साथ वादाखिलाफी की गई। स्वामीनाथन रिपोर्ट, जब नेता विपक्ष में होते तो इसका रोज नाम लेते थे। जब सत्ता में आते तो इसे भूल जाते थे। आनंद कुमार के मुताबिक, इसमें कांग्रेस और भाजपा, दोनों एक जैसी हैं। इन पार्टियों ने इस रिपोर्ट को लागू करने की बात कही, मगर सत्ता मिलते ही इसे भूल गए। मतदान के वक्त किसान भी इन बातों को भूल जाता है।
पहले के किसान नेताओं में अगर आपसी टकराहट भी थी तो वह सार्वजनिक थी। शरद जोशी वैश्वीकरण के समर्थक थे, तो महेंद्र सिंह टिकैत इसके विरोध में रहे। केंद्र की सरकारों के साथ इन नेताओं को थोड़ा बहुत लगाव भी रहा। इससे उनकी एकता कमजोर हुई तो दूसरी ओर दलगत, जातिगत और वर्ग के अनुसार किसानों में भी दरार आती गई। विश्वास की कमी के चलते किसान एकता में बिखराव आ गया। किसानों के सवालों पर नेताओं को मुंह मोड़ना पड़ गया।
किसान का बेटा किसान नहीं बन पा रहा
नेता का बेटा नेता बनने की कोशिश करता है, अभिनेता के बच्चे भी उन्हीं के कदमों पर चलने का भरसक प्रयास करते हैं। लेकिन किसान का बेटा फैक्ट्री में नौकरी तलाशता है, मगर खेती की ओर नहीं देखता। वजह, किसानी में हताशा के अलावा उसे कुछ दिखता ही नहीं है। 85 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास ढाई एकड़ से भी कम भूमि बची है। इस पर फसल के मूल्य की कोई गारंटी भी नहीं है। कुल मिलाकर किसान के बेटे को खेती में एक पराजय का भाव नजर आता है।
उत्तर भारत के किसानों को हिंदू मुस्लिम के मुद्दे में उलझाया जा रहा है तो बिहार में अगड़े-पिछड़े का राग छेड़ दिया जाता है। यहां पर आनंद कुमार कहते हैं कि क्षेत्रीय दलों ने किसानों के संघर्ष में दरार डाली है। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के सदस्य सत्यवान बताते हैं कि पहले वाला समय अब कहां है। आज किसान नेता चाहता है कि उसे संसद या विधानसभा में बैठने का मौका मिल जाए। वह खेत में जाकर संघर्ष करने से बचता है। वहीं बहुत से नेता सोशल मीडिया को ही किसानों के संघर्ष का मंच समझ बैठे हैं। इन सब बातों से किसानों का भरोसा टूटा है। उसे सही बात नहीं बताई जाती। नतीजा, किसानों की परवाह किए बिना, उनसे पूछे बिना और पूर्णतया अपनी मनमर्जी से सरकार बिल का प्रारूप तैयार कर उसे संसद में पास करा लेती है।