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कभी कृषि मुद्दों पर सरकारों को हिला देते थे ये नेता, आज किसान आंदोलन को है उनकी जरूरत!

Fri, 25 Sep 2020 04:38 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

क्षेत्रीय दलों ने भी किसानों की आवाज को इधर-उधर कर दिया। शरद जोशी जैसे नेता अस्सी के दशक में प्याज को लेकर सरकार हिला देते हैं, लेकिन आज संबंध खराब होने के बावजूद पाकिस्तान से प्याज मंगा ली जाती है। विपक्ष ऐसे मौके पर कुछ नहीं बोलता। किसान नेता भी चुप्पी साध लेते हैं...
 
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Chaudhary Charan Singh - फोटो : Amar Ujala (File)
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विस्तार
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कृषि अध्यादेशों के विरोध में शुक्रवार को भारत 'बंद' का आह्वान किया गया। जैसा कि पहले से ही कहा जा रहा था यह बंद दो-तीन राज्यों तक ही रहेगा। बाकी जगहों पर इसका प्रतीकात्मक असर ही देखने को मिलेगा। किसान संगठन भी सोशल मीडिया पर इस बंद को 'सुपरहिट' बनाने में जुटे थे। लेकिन कभी किसानों के मुद्दे पर सरकारों को हिलाने वाले चौ. छोटूराम, चौ. चरण सिंह, चौ. देवीलाल, शरद जोशी, महेंद्र सिंह टिकैत, बलदेव राम मिर्धा, एनजी रंगा और एमडी नंजुंडास्वामी सरीखे नेताओं की कमी आज भी महसूस की जाती है। उस दौर के किसान नेताओं की हैसियत देखिये कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के मंच पर तत्कालीन पीएम चंद्रशेखर, डिप्टी पीएम चौ. देवीलाल और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव विराजमान रहते हैं। दिल्ली के बोट क्लब पर टिकैत पांच लाख किसानों को लेकर आ जाते हैं। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और राजनीति एवं सामाजिक व्यवस्था के जानकार आनंद कुमार आगे कहते हैं कि आज विश्वास का अभाव, दलगत राजनीति और वर्ग विभाजन ने किसानों को बांट कर रख दिया है। किसान नेता भी इन्हीं तीन बिंदुओं में फंस कर रह गए।

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प्रो. आनंद कुमार का कहना है कि मौजूदा दौर के किसान नेताओं में विचारधारा को लेकर कोई स्पष्ट राय नहीं बन पा रही है। इनके संगठन भी बहुत ज्यादा हो गए हैं। योगेंद्र यादव, वीएम सिंह और अविक साहा जैसे कार्यकर्ता किसानों की आवाज उठाते रहते हैं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के बैनर तले करीब दो सौ किसान संगठन आवाज बुलंद करते हैं। मुद्दों को लेकर किसानों और उनके नेताओं में अंदरुनी फासला देखा जा रहा है। इसके बाद जाति और भाषा पर किसानों को बांट दिया जाता है।

क्षेत्रीय दलों ने भी किसानों की आवाज को इधर-उधर कर दिया। शरद जोशी जैसे नेता अस्सी के दशक में प्याज को लेकर सरकार हिला देते हैं, लेकिन आज संबंध खराब होने के बावजूद पाकिस्तान से प्याज मंगा ली जाती है। विपक्ष ऐसे मौके पर कुछ नहीं बोलता। किसान नेता भी चुप्पी साध लेते हैं। एक वो किसान एकता थी, जिसके बलबूते चरण सिंह प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच गए और देवीलाल उपप्रधानमंत्री बन बैठे। आनंद कुमार बताते हैं कि उन नेताओं की एक आवाज पर किसान अपना खेत छोड़कर आ जाता था। यह अलग बात है कि बहुत से नेता जो दिल्ली या लखनऊ पहुंचते थे, वे कुछ बदल भी जाते थे।

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नेताओं का उदय तो हुआ, मगर किसान वहीं पर रहा

किसान एकता के फलस्वरूप नेताओं का उदय तो हुआ, मगर किसान की उपेक्षा जारी रही। फसलों के दामों को लेकर किसान के साथ वादाखिलाफी की गई। स्वामीनाथन रिपोर्ट, जब नेता विपक्ष में होते तो इसका रोज नाम लेते थे। जब सत्ता में आते तो इसे भूल जाते थे। आनंद कुमार के मुताबिक, इसमें कांग्रेस और भाजपा, दोनों एक जैसी हैं। इन पार्टियों ने इस रिपोर्ट को लागू करने की बात कही, मगर सत्ता मिलते ही इसे भूल गए। मतदान के वक्त किसान भी इन बातों को भूल जाता है।

पहले के किसान नेताओं में अगर आपसी टकराहट भी थी तो वह सार्वजनिक थी। शरद जोशी वैश्वीकरण के समर्थक थे, तो महेंद्र सिंह टिकैत इसके विरोध में रहे। केंद्र की सरकारों के साथ इन नेताओं को थोड़ा बहुत लगाव भी रहा। इससे उनकी एकता कमजोर हुई तो दूसरी ओर दलगत, जातिगत और वर्ग के अनुसार किसानों में भी दरार आती गई। विश्वास की कमी के चलते किसान एकता में बिखराव आ गया। किसानों के सवालों पर नेताओं को मुंह मोड़ना पड़ गया।
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किसान का बेटा किसान नहीं बन पा  रहा

नेता का बेटा नेता बनने की कोशिश करता है, अभिनेता के बच्चे भी उन्हीं के कदमों पर चलने का भरसक प्रयास करते हैं। लेकिन किसान का बेटा फैक्ट्री में नौकरी तलाशता है, मगर खेती की ओर नहीं देखता। वजह, किसानी में हताशा के अलावा उसे कुछ दिखता ही नहीं है। 85 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास ढाई एकड़ से भी कम भूमि बची है। इस पर फसल के मूल्य की कोई गारंटी भी नहीं है। कुल मिलाकर किसान के बेटे को खेती में एक पराजय का भाव नजर आता है।

उत्तर भारत के किसानों को हिंदू मुस्लिम के मुद्दे में उलझाया जा रहा है तो बिहार में अगड़े-पिछड़े का राग छेड़ दिया जाता है। यहां पर आनंद कुमार कहते हैं कि क्षेत्रीय दलों ने किसानों के संघर्ष में दरार डाली है। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के सदस्य सत्यवान बताते हैं कि पहले वाला समय अब कहां है। आज किसान नेता चाहता है कि उसे संसद या विधानसभा में बैठने का मौका मिल जाए। वह खेत में जाकर संघर्ष करने से बचता है। वहीं बहुत से नेता सोशल मीडिया को ही किसानों के संघर्ष का मंच समझ बैठे हैं। इन सब बातों से किसानों का भरोसा टूटा है। उसे सही बात नहीं बताई जाती। नतीजा, किसानों की परवाह किए बिना, उनसे पूछे बिना और पूर्णतया अपनी मनमर्जी से सरकार बिल का प्रारूप तैयार कर उसे संसद में पास करा लेती है।
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