सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि कोई भी कर्मचारी उस तारीख से पूर्व प्रभावी वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकता, जिस तारीख को वह सेवा (नौकरी) में शामिल भी नहीं हुआ था।
शीर्ष अदालत ने यह फैसला पटना हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती देने वाली बिहार सरकार की याचिका पर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने एक कर्मचारी को नियुक्ति तिथि से दस साल पहले से पूर्व प्रभावी वरिष्ठता देने का निर्देश सरकार को दिया था।
जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी व जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने कहा, यह यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि जब तक अदालत की तरफ से निर्देशित या लागू नियमों द्वारा पूर्वव्यापी वरिष्ठता स्पष्ट रूप से प्रदान नहीं की जाती है, तब तक इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से पहले ही नौकरी हासिल कर चुके लोग प्रभावित होंगे।
पीठ ने गौर किया कि इस मामले में प्रतिवादी को मिली राहत नियुक्ति पर सवाल नहीं है बल्कि उसकी तरफ से नियुक्ति से पहले के दस साल की वरिष्ठता का दावा किया जाना है अहम है, जबकि इन दस साल में उसने नौकरी पर नियुक्ति ही नहीं होने के चलते एक भी दिन काम नहीं किया है।
दरअसल एक होमगार्ड के निधन के बाद उसके बेटे ने मृतक आश्रित कोटे में नौकरी मांगी थी। संबंधित कमेटी ने 1985 में उसे मृतक आश्रित कोटे में नौकरी देने की मंजूरी दे दी। लेकिन शारीरिक मानकों पर अनफिट पाए जाने के बाद नौकरी से इनकार पर उसने हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी। पटना हाईकोर्ट ने युवक को अधिनायक लिपिक के बजाय चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी वर्ग में नौकरी देने का आदेश दिया, लेकिन उसने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बिहार होमगार्ड के कमांडेंट ने युवक को 27 फरवरी, 1996 को नियुक्ति दे दी। लेकिन नौकरी के छह साल बाद उक्त युवक ने 2002 में अपना वरिष्ठता क्रम 5 दिसंबर, 1985 के आधार पर तय करने का आवेदन राज्य सरकार को दिया, जिसे खारिज कर दिया गया। युवक ने इसे पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पटना हाईकोर्ट ने सरकार को युवक का वरिष्ठता क्रम 5 दिसंबर, 1985 से ही तय करने का आदेश दिया, लेकिन बिहार सरकार ने इस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल कर दी थी।