साल 2017 में सीआरपीएफ और चुनावी प्रक्रिया पर बनी फिल्म 'न्यूटन' रिलीज हुई थी। नक्सल प्रभावित इलाके पर बनी उस फिल्म में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तार-तार होते दिखाया गया था। उस फिल्म के नायक 'राजकुमार राव' को अब भारतीय निर्वाचन आयोग ने 'नेशनल आइकन' बनाया है। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने कहा, अभिनेता राजकुमार के जुड़ने से पांच राज्यो में होने वाले चुनाव में वोटिंग प्रतिशत बढ़ेगा। हालांकि फिल्म में राव ने एक ऐसे पोलिंग अफसर का रोल किया था, जो निष्पक्ष चुनाव कराना चाहता था। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उसकी पूरी आस्था थी। दूसरी तरफ फिल्म में सीआरपीएफ अधिकारी को एक ऐसे रोल में दिखाया गया कि उसके लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया कोई मायने नहीं रखती। 'सीआरपीएफ' की छवि को दागदार होते देख बल के पूर्व उप निरीक्षक तमाल सान्याल के मन को काफी ठेस पहुंची। वे इस फिल्म के खिलाफ अदालत में पहुंच गए थे। सितंबर 2019 में दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने मानहानि के केस में न्यूटन फिल्म के निर्माता मनीष मुंद्रा और सेंसर बोर्ड (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) को नोटिस जारी किया था। वह केस अभी तक पेंडिंग है।
लोकतंत्र में वोट करने से बेहतर अनुभव कुछ नहीं
मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार का कहना था, हम राव को कोई फीस नहीं दे रहे हैं। इनका पैशन, केवल 'न्यूटन' फिल्म तक नहीं है। वह उससे कहीं आगे तक है। अभिनेता राजकुमार राव ने कहा, लोकतंत्र में वोट करने से बेहतर अनुभव कुछ नहीं हो सकता। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम लोकतंत्र के पर्व में अपना योगदान दें। बता दें कि इससे पहले, चुनाव आयोग ने अभिनेता पंकज त्रिपाठी, आमिर खान, पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, एमएस धोनी और बॉक्सर एमसी मैरी कॉम को 'राष्ट्रीय आइकन' के तौर पर मान्यता दी है। सीआरपीएफ के पूर्व अधिकारी तमाल सान्याल ने उस वक्त कहा था, अगर कहीं पर निष्पक्ष एवं शांतिपूर्वक चुनाव कराने की बात होती है, तो सबसे पहला नाम 'सीआरपीएफ' का आता है। दूसरे अर्धसैनिक बल भी इसी श्रेणी में आते हैं। विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा केंद्रीय बलों की तैनाती की मांग की जाती है। जब सीआरपीएफ जैसा केंद्रीय बल चुनावी ड्यूटी पर पहुंचता है, तो लोगों को यह भरोसा रहता है कि अब वे बिना किसी भय के अपना वोट डाल सकेंगे। आतंकी या नक्सलियों से मुठभेड़ हो, आपदा हो या कानून व्यवस्था की स्थिति बहाल करना, उसके लिए सीआरपीएफ ने खुद को साबित कर दिखाया है।
'न्यूटन' फिल्म में क्या दिखाया गया था
इस फिल्म में छत्तीसगढ़ के किसी दूरवर्ती इलाके में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दिखाया गया है। पोलिंग अधिकारी का रोल करने वाले राजकुमार राव, निष्पक्ष चुनाव कराना चाहते थे। वहां पर तैनात सीआरपीएफ अधिकारी को इस भूमिका में दिखाया गया कि चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराने में उसकी कोई रूचि नहीं है। सुरक्षा बल, चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालने का प्रयास कर रहे थे। सीआरपीएफ अफसर, पोलिंग अधिकारी से कहते हैं, यहां कोई वोटर नहीं आता। बतौर राव, आप लिखकर दें। मैं डीएम को जवाब भेजूंगा। अगर कोई वोटर नहीं आता तो भी आपका काम यहां बैठना है। पोलिंग अफसर अपनी बात पर अड़े तो वह अधिकारी उन्हें उस स्कूल में ले गया, जहां पर मतदान होना था। वह स्कूल जला हुआ था। बल के अफसर ने कहा, मैं आपको पहले ही कह रहा था, यहां कोई नहीं आता। अब चाय पियो और चलो। रास्ते में बल अधिकारी किसी बच्चे से फल तुड़वाने लगा। जब पोलिंग अधिकारी ने इस पर सवाल उठाया तो वह अधिकारी बोला, यह नक्सलियों की सूचना जुटाने का तरीका है। हम बेगार नहीं करा रहे हैं।
डीआईजी और विदेशी मीडिया आया तो
सीआरपीएफ अधिकारी, पोलिंग पार्टी से कहते हैं कि सब यहीं बैठे बिठाए हो जाएगा। कहीं बूथ पर जाने की जरूरत नहीं है। यहां के लोगों को चुनाव से कोई मतलब नहीं है। उनके वोट हम ही ले लेंगे। इतने में डीआईजी का फोन आता है कि विदेशी मीडिया प्रतिनिधि उस पोलिंग बूथ पर पहुंच रहे हैं। इसके बाद वहां का माहौल बदल जाता है। फिल्म में दिखाया गया है कि बल के जवान लोगों को भेड़-बकरियों की तरह पोलिंग बूथ पर ले आते हैं। उनके मुर्गे आदि भी सुरक्षा बल अपने साथ उठा लाते हैं। इतना ही नहीं, जब पोलिंग अधिकारी ने कहा कि वह चाहते हैं कि लोग बिना किसी डर के मतदान करें तो बल अधिकारी बोले, ईवीएम से सब कुछ यहीं पर हो जाएगा। फिल्म में दिखाया गया कि जैसे सीआरपीएफ को वोटिंग से कोई मतलब नहीं था। यह बल लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास नहीं रखता। जब मीडिया कर्मी वापस चले गए तो 12 बजे बल अधिकारी बोले, अब सब ठीक हो गया है, चलो निकलो। पोलिंग अफसर नहीं माना। वह बोला, तीन बजे तक मतदान होगा। सीआरपीएफ की छवि खराब करने के मकसद से फिल्म में दिखाया गया कि वहां बल के अधिकारी, फर्जी नक्सली हमला कराते हैं, ताकि पोलिंग अफसर वहां से चले जाएं। बाद में पोलिंग अफसर के सामने वह पोल भी खुल जाती है।
बल की लोकतांत्रिक विरोधी छवि दिखाई गई
फिल्म में सीआरपीएफ की लोकतांत्रिक विरोधी छवि दिखाई गई थी। पोलिंग अधिकारी राव, हर सूरत में निष्पक्ष मतदान कराने के पक्ष में थे तो बल अधिकारी, उस प्रक्रिया में बाधा डालते हुए दिखाए गए थे। इस वजह से पोलिंग अधिकारी के साथ मारपीट की गई। सान्याल ने तब बताया था, चुनाव में आज इसी बल पर सर्वाधिक भरोसा किया जाता है। कहीं पर दंगा हो रहा तो सीआरपीएफ बुलाई जाती है। विभिन्न इलाकों में इस बल ने सिविक एक्शन प्रोग्राम के तहत जो सराहनीय कार्य किया है, उसकी प्रशंसा सरकार में बड़े स्तर पर होती है। फिल्म निर्माता ने स्वीकार किया था कि अमेजन प्राइम ने डिस्क्लेमर नहीं लगाया था। सिनेमा हाल में भी डिस्क्लेमर नहीं लगा था। बाद में लगा दिया गया है कि यह फिल्म काल्पनिक घटना पर आधारित है। इस बाबत कोर्ट में शपथ पत्र देने की बात सामने आई। अमेजन प्राइम को भी इस मामले में पार्टी बनाने के लिए कोर्ट में एप्लीकेशन दी गई। फिल्म निर्माता को अदालत में शपथ पत्र देकर यह बताना था कि फिल्म में पहले डिस्क्लेमर नहीं लगा था, अब लगा दिया गया है। इस फिल्म की ऑस्कर अवॉर्ड के लिए आधिकारिक एंट्री हुई थी।
अदालत में कहा गया, बल की छवि खराब हुई
मामले की सुनवाई के दौरान सान्याल द्वारा कहा गया था कि इस फिल्म ने सीआरपीएफ की छवि पर दाग लगाया है। अदालत की तरफ से पूछा गया कि ऐसी तो कई दूसरी मूवी भी हैं, जिसमें पुलिस प्रशासन या बलों की छवि खराब होती दिखाई गई है। याचिकाकर्ता का कहना था कि इस फिल्म में डिस्क्लेमर नहीं लगा था। यानी उसमें यह नहीं बताया गया कि फिल्म की स्टोरी काल्पनिक घटना पर आधारित है। अमेजन प्राइम की तरफ से कहा गया कि वे वही दिखाते हैं, जो उन्हें दिया जाता है। फिल्म निर्माता ने कहा, हमने तो डिस्क्लेमर लगाया था। तब सान्याल का कहना था कि इस बल को जहां कहीं भी चुनावी ड्यूटी के लिए भेजा जाता है, वहां लोगों में आत्मविश्वास पनपता है। वे सोचते हैं कि अब असामाजिक तत्व चुनाव में गड़बड़ी नहीं कर सकेंगे। लोगों को भरोसा रहता है कि वे बिना किसी भय के मतदान कर सकते हैं। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने सीमावर्ती और दूरवर्ती इलाकों में लोगों तक विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं पहुंचाने के लिए सीआरपीएफ एवं दूसरे अर्धसैनिक बलों को एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी।