पहले जानें- क्या है फॉर्म-6, जिससे वोटर लिस्ट में जुड़ते हैं मतदाताओं के नाम?
फॉर्म-6 भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा जारी किया गया एक आधिकारिक आवेदन पत्र है, जिसका इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। इसे मतदाता अंग्रेजी या अपने राज्य की भाषा के हिसाब से भर सकते हैं।
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फॉर्म-6 भरने वाले नागरिकों के लिए एक घोषणापत्र पर भी हस्ताक्षर करना होता है, जिसके तहत अगर वे इस फॉर्म में गलत जानकारी देते हैं तो जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 31 के तहत उन पर कार्रवाई हो सकती है।
अब जानें- फॉर्म-6 को लेकर क्या विवाद उठा है?
फॉर्म-6 को लेकर उठा ताजा विवाद मुख्य रूप से चुनाव आयोग की ओर से मतदाता पंजीकरण फॉर्म में किए गए बिना मंजूरी वाले बदलावों, कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी को लेकर किए गए दावों पर केंद्रित है।
फॉर्म-6 में जोड़ा गया नया घोषणा पत्र
- चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे एसआईआर के दौरान जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म-6 में एक नई घोषणा जोड़ी गई। इसमें आवेदकों से यह बताने को कहा गया कि क्या उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम 2000 के दशक के पिछले एसआईआर की मतदाता सूची में शामिल था या नहीं।
- इस घोषणा को अनिवार्य चिह्नित नहीं किया गया था, लेकिन कथित तौर पर इसे भरे बिना ऑनलाइन आवेदन सबमिट ही नहीं किया जा सकता था। अगर यूजर इस घोषणा में गलत जानकारी दे देता तो उस पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम तहत दंडात्मक कार्रवाई भी हो सकती थी, क्योंकि यह फॉर्म-6 का हिस्सा था।
नियमों और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के तहत चुनावी फॉर्म में किसी भी तरह का संशोधन करने का काम सिर्फ केंद्र सरकार राजपत्र (गजट) अधिसूचना जारी करके कर सकती है। इसके लिए उसे संसद की स्वीकृति लेना जरूरी है। आरोप है कि चुनाव आयोग ने कथित तौर पर बिना किसी सरकारी अधिसूचना या नियम संशोधन के ही यह बदलाव कर दिया।
- द इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। चुनाव आयुक्त संधू ने इसे अनाधिकृत और अवैध बताते हुए तुरंत हटाने की मांग की थी। हालांकि, इसे फॉर्म में लंबे समय तक बरकरार रखा गया।
फॉर्म-6 पर लेकर उठे इन विवादों पर विपक्ष क्यों भड़का?
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि फॉर्म-6 में आवेदकों से उनके माता-पिता या दादा-दादी के 2000 के दशक की शुरुआत के पिछले एसआईआर रिकॉर्ड से लिंक की जानकारी मांगने से पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाताओं के लिए मतदाता सूची में नाम जुड़वाना बेहद कठिन बना दिया गया।
उधर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर पद का दुरुपयोग करने और सत्ताधारी दल- भाजपा की मदद के लिए एकतरफा और अवैध रूप से फॉर्म-6 बदलने का सीधा आरोप लगाया। विपक्ष का मानना है कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सांविधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर बड़ा हमला है।
फॉर्म-6 पर नए विवाद पर विपक्ष।
- फोटो : अमर उजाला
फॉर्म-6 पर चुनाव आयोग के दावों पर सुप्रीम कोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
देश में कहां हो चुका और कहां चल रहा है एसआईआर?
चुनाव आयोग के चरण-3 के दस्तावेज के अनुसार, पहले दो चरणों में 13 राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर हो चुका है, जबकि तीसरे चरण में 16 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश यानी कुल 19 जगहों पर एसआईआर की प्रक्रिया है।
पहले दो चरणों में बिहार, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और लक्षद्वीप में एसआईआर हो चुका है।
तीसरे चरण में ओडिशा, मिजोरम, सिक्किम, मणिपुर, दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, तेलंगाना, पंजाब, कर्नाटक, मेघालय, महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली, नागालैंड और त्रिपुरा में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है। कई राज्यों में अंतिम मतदाता सूची जारी भी हो चुकी है और फॉर्म-6 के जरिए नामों को जोड़े जाने की प्रक्रिया भी जारी है।
इसके बाद एसआईआर कहां होगा?
हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में एसआईआर बाद में कराया जाना है। इन तीनों के लिए कार्यक्रम अभी घोषित नहीं किया गया है। चुनाव आयोग ने इसके पीछे जनगणना के दूसरे चरण के पूरा होने और ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम की स्थिति को ध्यान में रखने की बात कही है।