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Corona Alert: ओमिक्रॉन नहीं अभी डेल्टा ही सबसे बड़ा खतरा, देश में ज्यादा मामले भी इसी वैरिएंट के, पढ़िए क्या कहते हैं विशेषज्ञ

सार

आईसीएमआर के मुख्य महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर समीरण पांडा ने अमर उजाला डॉट कॉम से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने बताया कि कैसे लोगों की लापरवाहियां ही देश को फिर से रिस्क जोन में ढकेल रहीं हैं।
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लापरवाही ने बढ़ाया ओमिक्रॉन विस्फोट का खतरा (फाइल) - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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पूरी दुनिया में सबसे पहले ओमिक्रॉन की दस्तक दक्षिण अफ्रीका में हुई थी। अब दक्षिण अफ्रीका में ओमिक्रॉन के मामले न सिर्फ कम होते जा रहे हैं बल्कि वायरस का यह बदला हुआ स्वरूप भी कमजोर होता जा रहा है। ऐसे में वायरस के इस बदले हुए स्वरूप को लेकर उतनी चिंता नहीं है जितनी अभी भी अपने देश में डेल्टा वैरिएंट को लेकर है। हमारे यहां अभी भी सबसे ज्यादा मामले डेल्टा के ही आ रहे हैं। अचानक बढ़ रहे मामलों से आने वाले दिनों के संकेत बहुत अच्छे तो नहीं दिख रहे हैं। यह कहना है इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के मुख्य महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर समीरन पांडा का। डॉ. पांडा ने अमर उजाला डॉट कॉम से ओमिक्रॉन और डेल्टा समेत देश में बढ़ रहे मामलों पर विस्तार से बात की।

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सवाल: अब तो ओमिक्रोन के मामले बहुत बढ़ने लगे हैं।
देखिए, एक बात बिल्कुल स्पष्ट तौर पर समझिए कि अभी भी अपने देश में ओमिक्रॉन से ज्यादा बड़ी समस्या डेल्टा वैरिएंट की है। पूरे देश में अभी ओमिक्रॉन के महज डेढ़ हजार मामले ही सामने आए हैं। जबकि बाकी सारे मामले डेल्टा वैरिएंट के ही है। इसलिए चिंता का विषय डेल्टा है ना कि ओमिक्रॉन। हमारे सारे संस्थान इस दिशा में न सिर्फ लगातार काम कर रहे हैं बल्कि बचाव संबंधित राज्यों को भी दिशा निर्देश भी दे रहे हैं।

सवाल: लेकिन अपने यहां तो डेल्टा के केसेज एकदम कम हो गए थे। जबसे वायरस का नया वैरिएंट सामने आया है तभी से केसेज बढ़ने शुरू हुए हैं। तो क्या इनका आपस में कोई कनेक्शन है?
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अभी तक मेडिकल साइंस की किसी रिसर्च में इस तरीके की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि दोनों वैरिएंट के आपस मे मिलने से कोई बड़ा खतरा है या दोनों वैरिएंट आपस मे मिलकर कोई कोई नया वैरिएंट बना रहे हैं। यह दोनों वैरिएंट पूरी तरीके से अलग है और हमारे देश में यह दोनों वैरिएंट इस वक्त मौजूद हैं। हमें अभी भी डेल्टा से ही सबसे ज्यादा बचने की आवश्यकता है।

सवाल: जब आपस में इनका कोई संबंध नहीं है तो अचानक डेल्टा वैरिएंट के मामले कैसे बढ़ने लगे?
यह सिर्फ लोगों की लापरवाही की वजह से हो रहा है। आप बाजारों से लेकर सड़कों और पब्लिक प्लेस पर पहुंच रही भीड़ को देखिए। एक तो लोग पूरी तरीके से वैक्सीनेटेड नहीं है। एक बड़े तबके ने तो सिंगल डोज भी नहीं लगवाई है। ऊपर से लोगों ने मास्क लगाने तो छोड़ ही दिए हैं। लोगों को एक बात बिल्कुल स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए कि भले ही आपको वैक्सीन की दोनों डोज़ लग चुकी हों, लेकिन जब तक आप मास्क नहीं लगाएंगे तब तक आप रिस्क जोन में रहेंगे। यही वजह है कि लगातार मामले बढ़ते जा रहे हैं।

सवाल: क्या म्युटेशन के साथ डेल्टा वैरिएंट और ओमिक्रॉन वैरिएंट के लक्षणों में भी परिवर्तन हो रहा है?
ओमिक्रॉन वैरिएंट से प्रभावित 70 से 80 फीसदी लोगों में लक्षण होते ही नहीं हैं। जबकि डेल्टा वैरिएंट में ऐसा नहीं है। हालांकि ज्यादातर डेल्टा वेरिएंट में अब पहली और दूसरी लहर के दौरान पाए जाने वाले लक्षणों की तुलना में कम लक्षण जरूर हैं लेकिन ओमिक्रोन की तरह एसिमटोमैटिक अभी भी नहीं है।

सवाल: साउथ अफ्रीका में जहां सबसे पहले ओमिक्रॉन के मामले रिपोर्ट हुए थे वहां पर तो मामले लगातार कम होते जा रहे हैं। तो यह कोविड संक्रमण फैलने के लिहाज से बेहतर माना जाए?
निश्चित तौर पर साउथ अफ्रीका में बदले हुए स्वरूप ओमिक्रॉन के मामले न सिर्फ कम हो रहे हैं बल्कि उसकी संक्रामक क्षमता भी कम हो रही है। यह निश्चित तौर पर दक्षिण अफ्रीका के लिहाज से एक सुखद जानकारी तो है ही।

सवाल: बात तीसरी लहर की की जा रही है और बच्चों को ज्यादा सावधान रहने के लिए कहा जा रहा है। आप इससे कितना इत्तेफाक रखते हैं?
देखिए अपने देश में किए गए चौथे नेशनल सेरोलॉजिकल सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ था कि बगैर स्कूल गए हुए ही 60 फीसदी बच्चों में एंटीबॉडी डेवलप हो गई थी। इसका मतलब बिल्कुल स्पष्ट है कि स्कूल जाने वाले बच्चों में 60 फ़ीसदी को तो कोरोना हो चुका है। तो बच्चों को लेकर बेवजह डरने की आवश्यकता नहीं है। हां, एहतियात जरूर लेना चाहिए वह चाहे बच्चे हों, किशोर हों या एडल्ट हो। रही बात तीसरी लहर की तो तो एक बात जान लीजिए, ज्यादा लापरवाहियां बहुत सारी लहरों को जन्म देती रहेंगी। इसलिए बेहतर है कि अभी भी मास्क लगाकर और शारीरिक दूरी बना कर रहा जाए। अगर जरूरी न हो तो बेवजह कहीं भी जाने से बचना चाहिए।

सवाल: कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ऐसी भी आई हैं जिसमें बड़े वैज्ञानिकों के आधार पर कहा गया है कि यह कोविड महामारी के खात्मे का दौर है। क्या हकीकत में ऐसा कोई साइंटिफिक एविडेंस है?
देखिए जो वायरस एक बार आ जाता है वह इतनी जल्दी नहीं खत्म होता। उसके लगातार बार-बार स्वरूप बदलते रहते हैं। वह म्यूटेशन के साथ कभी खतरनाक तो कभी बहुत माइल्ड हो सकता है। ओमिक्रॉन की दस्तक से कोविड महामारी खत्म हो जाएगी, ऐसा बिल्कुल नहीं है। हां, वक़्त के साथ महामारियों का असर हमेशा कम ही होता देखा गया है। 

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