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पत्नी की लाश या समाज की बेहिसी का बोझ?

Mon, 29 Aug 2016 01:00 PM IST
शकील अख्तर/ बीबीसी
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दाना मांझी अपने कंधे पर अपनी पत्नी की लाश उठाए हुए - फोटो : otv
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पिछले दिनों भारतीय अखबारों ने ओडिशा के एक गरीब आदिवासी दाना मांझी की एक ऐसी तस्वीर छापी जो काफी समय तक मन और विवेक को झकझोरती रहेगी। दाना मांझी अपने कंधे पर अपनी पत्नी की लाश उठाए हुए लगभग बारह किलो मीटर तक पैदल चले। मांझी की पत्नी का टीबी से देहान्त हो गया था और उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह शव घर ले जाने के लिए एक एंबुलेंस का प्रबंध कर पाते।
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मांझी ने कहा कि अस्पताल ने उनकी मदद करने से इंकार कर दिया था और उनके पास बस यही एक चारा था कि वह अपनी पत्नी की लाश को खुद ही उठा कर अपने गांव लेकर जाएं जो काफी दूरी पर था। टीवी चैनलों पर दाना मांझी को एक चादर में लिपटी हुई लाश को अपने कंधों पर लेकर चलते हुए दिखाए जाने का दृश्य बेहद दर्दनाक था।

यह भारतीय समाज की उदासीनता को दिखाता है जो काफी चिंताजनक है। भारत की कम से कम एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन गुजार रही है। इनमें अधिकांश आबादी दलित और आदिवासियों की है जो देश की आबादी का एक चौथाई हिस्सा हैं।
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उनका जीवन मात्र कुछ सौ रुपये में बचाया जा सकता है

पत्नी की लाश उठाते दाना मांझी - फोटो : otv
भारत की सामाजिक व्यवस्था का सबसे मजबूत पहलू यह है कि यह एक लोकतंत्र है और इसका सबसे कमजोर पहलू यह है कि आजादी के इतने सालों बाद भी देश की राजनीति और संसाधन एक विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग की गिरफ्त में हैं। भारत के विशेषाधिकार प्राप्त राजनीतिक वर्ग ने एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है जिसका देश का गरीब और कमजोर वर्ग हिस्सा नहीं बन सका है। गरीब वर्ग जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर अपना मालिकाना हक पहले ही खो चुका है।

देश की न्याय प्रणाली ऐसी बनाई गई है कि देश की बहुमत न्याय तक पहुँच नहीं सकती। चिकित्सा सुविधाएं इतनी महंगी हैं और संसाधन इतने कम है कि देश की एक बड़ी आबादी इलाज न हो पाने के कारण छोटी बीमारियों से मौत का शिकार हो जाती है। जबकि उनका जीवन मात्र कुछ सौ रुपये में बचाया जा सकता है।

भारत के विशेषाधिकार प्राप्त राजनीतिक वर्ग ने एक ऐसा समाज बनाया है जिसमें गरीब और कमजोर के लिए सोचने की जगह सीमित होती जा रही है। यह एक ऐसा समाज है जहाँ अधिकांश लोगों की सोच सिर्फ खुद तक सीमित है। दूसरों के बारे में सोचने और उनकी फिक्र करने की प्रवृति यहां कम मिलती है।
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मौत के बाद भी इज्जत से महरूम रखा

दाना मांझी की कहानी दुनिया के सामने लाने वाले ओटीवी के पत्रकार अजीत सिंह। - फोटो : AJIT SINGH
इंसानी रिश्तों का निर्धारण आपसी हित, जाति और धार्मिक आधार पर होता है। भारत का विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग सबसे उदासीन है। दाना मांझी की तस्वीर देखकर किसी ने टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ऐसा लगता है कि जैसे भारतीय गणराज्य ने गरीबो के खिलाफ जंग छेड़ रखी हो।

मांझी अपनी पत्नी की लाश नहीं भारतीय लोकतंत्र और समाज की बेहिसी का बोझ अपने कमजोर कंधों पर उठाए हुए थे। मांझी की पत्नी को चंद रुपयों में बचाया जा सकता था। समाज ने जीवन से ही नहीं, इस गरीब को मौत के बाद भी इज्जत से महरूम रखा।

यह तस्वीर बहुत लंबे समय तक मानवता की अंतरात्मा को झकझोरती रहेगी। भारतीय समाज में भले ही कोई फर्क न पड़े लेकिन दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र दाना मांझी के सामने हमेशा शर्मसार रहेगा।

 
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