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अगर बच्चों में हैं ये लक्षण... तो ‘ड्राइंग’ से पता चलेगा उनके भीतर का दर्द

Sat, 22 Sep 2018 02:10 PM IST
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
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child abuse
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राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने यौन हिंसा से पीड़ित बच्चों का पता लगाने के लिए नई पहल की है। बाल आयोग का मानना है कि बाल यौन शोषण का पता लगाने के लिए चित्रकारी या आर्ट सबसे बेहतरीन जरिया है। इसके माध्यम से बच्चों के दर्द को समझा जा सकता है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन लोकुर ने यौन हिंसा के शिकार बच्चों को ‘साइलेंट विक्टम’ बताया था।
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एम्स के साथ तैयार की रिपोर्ट

आयोग ने ‘ड्राइंग की मदद से बाल यौन हिंसा का आकलन’ करने के लिए ड्राफ्ट रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मनोचिकित्सा विभाग के सहयोग से तैयार किया है। आयोग ने ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा है कि चित्रकारी के माध्यम से बच्चों से संवाद की शुरूआत की जा सकती है। आयोग के सूत्रों के मुताबिक यौन हिंसा से पीड़ित बच्चों का व्यवहार बदल जाता है। वे बातचीत करने से कतराने लगते हैं। यहां तक कि वे दूसरे लोगों पर आसानी से भरोसा नहीं करते।

यौन हिंसा के बाद पीड़ित बच्चे जब मनोचिकित्सक या थेरेपिस्ट के पास जाते हैं, तो उनसे एक ही सवाल बार-बार पूछा जाता है। इससे उनमें घबराहट और डर बढ़ जाता है। वह भी खासकर तब, जब सब बच्चे को घेर कर खड़े हो जाते हैं और बच्चे के बोलने का इंतजार करते हैं। यह परिस्थितियां बच्चे को भीतर से डरा देती हैं।
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पुल का काम करती है आर्ट

आयोग के विशेषज्ञों के मुताबिक इन परिस्थितियों में ड्राइंग या चित्रकारी बेहतरीन मौका साबित हो सकती है। पीड़ित बच्चे से संवाद के लिए एक भावनात्मक समर्थन की जरूरत होती है। चित्रकला के माध्यम से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से बच्चे से संवाद का मौका मिल जाता है।

इस प्रक्रिया में चित्रकला थेरेपिस्ट और पीड़ित बच्चे के बीच एक पुल की तरह काम करती है और असहज सवालों के बिना ही आप संवाद करना शुरू कर सकते हैं। थेरेपिस्ट बच्चे के साथ अपने सेशंस को भी व्यवस्थित किया जा सकता है । यह बच्चे के साथ सकारात्मक वातावरण बनाने में सहायक होता है।

मनस्थिति जानने का अप्रत्यक्ष तरीका

child sexual assault
दिल्ली के प्रतिष्ठित सर गंगा राम अस्पताल में मनोचिकित्सक डॉक्टर राजीव मेहता के मुताबिक प्रोजेक्शन मेथड्स के जरिए बच्चों में यौन हिंसा का पता लगाया जाता है। ये बच्चों की मनोस्थिति जानने के अप्रत्यक्ष तरीके होते हैं। इसमें सेंटेंस पूरा करने का टेस्ट होता है, इसमें बच्चे से सेंटेंस पूरा करने के लिए कहा जाता है।

वहीं एक थ्री विशेज टेस्ट भी होता, जिसमें बच्चों से कहा जाता है कि अगर सामने भगवान आ गए, तो वे क्या विश मांगेगे। एक चाइल्ड ट्रूमैटिक टेस्ट भी होता है, जिसे सीटीएटी कहा जाता है, इसमें बच्चों को फोटो दिखा कर स्टोरीज बनाने के लिए कहा जाता है। इस सबके अलावा एक ड्रॉ पिक्चर टेस्ट होता है, जिसमें बच्चों से कुछ भी ड्रा करने के लिए कहा जाता है। वह बताते हैं कि इन टेस्ट के जरिए पता लगाया जा सकता है कि बच्चे किस मनस्थिति से गुजर रहे हैं। वह बताते हैं कि इन टेस्ट से काफी कुछ पता चल सकता है।

पेशेवर ही कर सकते हैं टेस्ट

बाल आयोग की ड्राफ्ट रिपोर्ट के मुताबिक इन टेस्ट को केवल चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, साइकेट्रिस्ट और अन्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर ही कर सकते है। बच्चों को ड्रांइग पसंद होती है और वे अपनी भावनाएं ड्राइंग के जरिए प्रकट करने में सहज महसूस करते हैं। साथ ही आयोग ने इस मेथड के साथ कुछ गाइडलाइंस भी जारी की हैं।

 
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चार में से तीन बच्चों के साथ यौन हिंसा

बच्चों के खिलाफ यौन अपराध बढ़े
इससे पहले रिपोर्ट आई थी कि देश में हर चार में से तीन बच्चे यौन हिंसा का शिकार हो रहे हैं। रोजाना तकरीबन 11 बच्चियों के साथ यौन शोषण के मामले सामने आते हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन मामलों से निबटने के लिए हमारे पास कोई कारगर उपाय नहीं है।

एनसीआरबी के डाटा के मुताबिक 2014 से 2016 के बीच बच्चों के खिलाफ हिंसा में 23 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। उन्होंने कहा कि बच्चों के खिलाफ हिंसा तभी शुरू हो जाती है जब घर में मां घरेलु हिंसा की शिकार होती है, जिसका बच्चों पर नकारात्मक मानसिक प्रभाव पड़ता है।
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