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ग्रामीण भारत में तीन में से दो डॉक्टरों के पास नहीं है कोई मेडिकल डिग्री: शोध

Sat, 27 Jun 2020 08:52 AM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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आपस में चर्चा करते डॉक्टर (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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ग्रामीण भारत में कम से कम तीन में से दो डॉक्टरों के पास कोई औपचारिक डिग्री नहीं है। उनके पास चिकित्सा की आधुनिक प्रणाली में भी कोई योग्यता नहीं है। यह जानकारी सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य देखभाल उपलब्धता और गुणवत्ता को लेकर हुए भारत के पहले व्यापक आकलन के अनुसार मिली है।

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हालांकि 75 प्रतिशत गांवों में कम से कम एक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता है और एक गांव में औसतन तीन प्राथमिक स्वास्थ्य प्रदाता हैं। इनमें से 86 प्रतिशत निजी डॉक्टर हैं और 68 प्रतिशत के पास कोई औपचारिक चिकित्सा प्रशिक्षण नहीं है। यह बात नई दिल्ली में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) के शोधकर्ताओं द्वारा 2009 में 19 राज्यों में 1,519 गांवों के सर्वेक्षण से पता चली है।


यह शोध सामाजिक विज्ञान और चिकित्सा पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। यह शोध 'भारत में स्वास्थ्य कार्यबल' पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2016 की रिपोर्ट का समर्थन करता है। जिसमें कहा गया था कि भारत में एलोपैथिक दवाओं की प्रैक्टिस कर रहे 57.3 प्रतिशत लोगों के पास कोई मेडिकल योग्यता नहीं है और 31.4 प्रतिशत केवल माध्यमिक विद्यालय स्तर तक शिक्षित हैं।
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सीपीआर के शोध में पाया गया कि औपचारिक योग्यता गुणवत्ता की भविष्यवाणी नहीं करते हैं। शोध में पाया गया कि तमिलनाडु और कर्नाटक में अनौपचारिक प्रदाताओं का चिकित्सा ज्ञान बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रशिक्षित डॉक्टरों की तुलना में अधिक है।

शोध के मुख्य लेखक जिश्नु दास जो वाशिंगटन के जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में मैककोर्ट स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर और वॉल्श स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस में प्रोफेसर हैं, उन्होंने कहा, 'ग्रामीण परिवारों की विशाल जनसंख्या में अनौपचारिक प्रदाताओं जिन्हें आमतौर पर क्वैक्स (नीम-हकीम) कहा जाता है, वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध एकमात्र विकल्प हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य क्लीनिक या एमबीबीएस डॉक्टर इतने कम हैं या बहुत दूर हैं इसलिए ज्यादातर ग्रामीणों के लिए वे विकल्प नहीं होते हैं।' 
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उन्होंने आगे कहा, 'मैंने जिन राज्यों (मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल) में काम किया वहां ये सच है लेकिन मुझे इसका अहसास नहीं था कि केरल को छोड़कर हर राज्य में यही स्थिति है। इसलिए स्वास्थ्य नीति के दायरे में यह विचार है कि जैसे-जैसे राज्य समृद्ध होते हैं, अनौपचारिक प्रदाता स्वतः ही गायब हो जाएंगे, यह सच नहीं है।' 

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